रूस-यूक्रेन युद्ध का एक साल - दुनिया के लिए इसके मायने

रूस-यूक्रेन युद्ध दूसरे वर्ष में प्रवेश कर गया है। एक वर्ष पूरा होने के समय अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने यूक्रेन और पोलैण्ड की यात्रा के दौरान यूक्रेन को और ज्यादा आधुनिक हथियार देने की बात की और यूक्रेन की तब तक मदद करने का वायदा किया जब तक वह युद्ध क्षेत्र से, अपनी भूमि से रूसियों को खदेड़ नहीं देता। यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेन्स्की ने भी अमरीका और नाटो से और आधुनिक हथियारों, गोला-बारूद, मिसाइलों और लड़ाकू हवाई जहाजों की मांग की व क्रीमिया सहित सभी कब्जा किये गये क्षेत्रों से रूसियों को खदेड़ देने का संकल्प दोहराया। जेलेन्स्की ने चीन से यह मांग की कि वह रूस का समर्थन न करे। दूसरी तरफ, रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने अपनी संघीय संसद को संबोधित करते हुए कहा कि उनका ‘‘विशेष सैन्य अभियान’’ तब तक चलता रहेगा जब तक उसका उद्देश्य पूरा नहीं हो जाता। इसी संबोधन के दौरान उन्होंने कहा कि अमरीका और नाटो देशों द्वारा यूक्रेन को दिये जाने वाले आधुनिक हथियार युद्ध की दिशा नहीं बदल सकते और कि वे सिर्फ यूक्रेन की तबाही-बर्बादी को ही बढ़ा सकते हैं। रूसी राष्ट्रपति ने अमरीका के साथ न्यू स्टार्ट सम्बन्धी चलने वाली वार्ताओं से अपने देश को अलग करने की घोषणा कर दी। यह न्यू स्टार्ट रणनीतिक हथियारों के परिसीमन सम्बन्धी वार्ता है। इसके तहत अमरीका को रूसी आणविक हथियारों और मिसाइलों को जांच करने का अधिकार मिल जाता है। रूसी राष्ट्रपति का यह तर्क था कि एक तरफ अमरीका रूस के विरुद्ध हमला करने के लिए यूक्रेन को अत्याधुनिक हथियारों से मदद कर रहा है और उसके विनाश की तैयारी कर रहा है, दूसरी तरफ न्यू स्टार्ट की बात कर रहा है। यह साथ-साथ नहीं चल सकता।

अमरीकी साम्राज्यवादी लगातार यह राग अलापते रहे हैं कि रूस ने बिना किसी उकसावे के यूक्रेन पर हमला किया है। वे इसे जनतंत्र, क्षेत्रीय अखण्डता और प्रभुसत्ता के विरुद्ध हमला घोषित करते हैं। वे रूस को सर्वसत्तावादी घोषित करते हैं। वे अपने को जनतंत्र का पक्षपोषक बताते हैं। यही राग जो बाइडेन ने अपने कीव तथा वारसा दौरे के दौरान अलापा है।

अमरीकी साम्राज्यवादी दुनिया भर में अपनी नापसंद सत्ताओं को हटाते रहे हैं, तख्तापलट कराते रहे हैं, हुकूमत परिवर्तन कराते रहे हैं, ‘‘रंगीन क्रांतियों’’ को अंजाम देते रहे हैं, यह जगजाहिर है। इसके बावजूद वे बेहयाई से क्षेत्रीय अखण्डता और प्रभुसत्ता की पाखण्डभरी बातें करते हैं। वे पश्चिमी एशिया के शेखों और शेखशाहियों तथा लातिन अमरीका के तानाशाहों की मदद करते रहे हैं उनकी जनतंत्र की हिमायत पाखण्डपूर्ण है।

जहां तक रूस द्वारा यूक्रेन पर बगैर उकसावे के आक्रमण का प्रश्न है, यह सर्वविदित है कि अमरीकी साम्राज्यवादी लगातार रूस के पड़ोस तक नाटो का विस्तार करके रूसी शासकों को उकसाने की कार्यवाही कर रहे थे। यूक्रेन में 2014 में तख्तापलट की कार्रवाई भी रूस के विरुद्ध एक उकसावे भरी कार्रवाई थी। दोनवास क्षेत्र के रूसी भाषा-भाषी नागरिकों की हत्यायें यूक्रेनी सत्ता द्वारा एक उकसावे भरी कार्रवाई थी। 2015 के मिंस्क समझौते को न लागू करना भी एक उकसावे भरी कार्रवाई थी। जर्मनी के पूर्व चांसलर एंजेला मर्केल ने यह साफ तौर पर स्वीकार कर लिया है कि मिंस्क समझौता तो सिर्फ रूस को धोखा देने के लिए किया गया था जिससे कि यूक्रेन को अपनी सैनिक तैयारी करने के लिए समय मिल सके। इस समझौते को लागू करना ही नहीं था। ये सारी उकसावे भरी कार्रवाई करने के बाद भी जो बाइडेन यह कहते हैं कि रूस ने बिना उकसावे के यह आक्रमण किया था।

इसके बावजूद, रूस द्वारा यूक्रेन पर आक्रमण एक आक्रामक कार्रवाई थी, गलत थी। यह दो साम्राज्यवादी शक्तियों के बीच की टकराहट है। जेलेन्स्की की हुकूमत अमरीकी साम्राज्यवादियों के हाथ की कठपुतली है। जेलेन्स्की की हुकूमत भी उतनी ही तानाशाह है जितनी कि रूस के पुतिन की हुकूमत। इस युद्ध में यूक्रेन की मजदूर-मेहनतकश आबादी पिस रही है। उसके बेटे-बेटियां मारे जा रहे हैं। लाखों की तादाद में विस्थापित होकर देश छोड़ने के लिए मजबूर हुए हैं। वे एक देश से दूसरे देश में शरणार्थी होने के लिए विवश हो रहे हैं। इस युद्ध से जेलेन्स्की और उनका धनिक तंत्र मुनाफा लूट रहा है। इस अंतर-साम्राज्यवादी युद्ध से जहां यूक्रेन के अंदर जेलेन्स्की गुट मालामाल हो रहा है, वहीं रूस में भी धनिक तंत्र की लूट बढ़ी हुई है। हालांकि, अमरीकी साम्राज्यवादियों व पश्चिमी देशों द्वारा लगाये गये व्यापक प्रतिबंधों के चलते यहां के धनिक तंत्र की लूट के रास्ते में कुछ दिक्कतें हैं। लेकिन रूस की मजदूर-मेहनतकश आबादी की जिंदगी की हालत ज्यादा खराब हो रही है। रूसी शासक रूसी अंधराष्ट्रवाद को भड़का कर व्यापक आबादी को अपने पीछे खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं।

युद्ध का जब एक वर्ष पूरा हो चुका है तब यह अधिकाधिक स्पष्ट होता जा रहा है कि इस युद्ध के लिए कौन जिम्मेदार है। युद्ध के लिए जिम्मेदार शक्ति या शक्तियों की शिनाख्त करने के लिए यह जरूरी है कि यह समझा जाय कि इस युद्ध से किसे सर्वाधिक लाभ होगा? यह एक गलत धारणा प्रचलित है कि युद्ध में प्रथम गोली दागने वाली सेना युद्ध के लिए मूल रूप से जिम्मेदार होती है। इस युद्ध के दौरान सबसे अधिक लाभ अमरीकी हथियार निर्माता कम्पनियों को हुआ है। अमरीकी सैनिक-औद्योगिक तंत्र का मुनाफा इस दौरान बेतहाशा बढ़ा है। अमरीकी साम्राज्यवादी नाटो देशों और यूरोपीय संघ के देशों को अपने पीछे लामबंद करने में तात्कालिक तौर पर सफल हो गये हैं। इससे भी अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी गिरती आर्थिक स्थिति को सैनिक बल पर एकजुटता दिखाकर छिपाने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी तरफ, रूसी साम्राज्यवादी भी अपने को पीड़ित दिखाकर पश्चिमी साम्राज्यवादियों की संयुक्त ताकत का सामना करने में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लामबंदी करने में लगे हुए हैं। इस लामबंदी में रूसी साम्राज्यवादियों के साथ चीनी साम्राज्यवादी खड़े हैं। अमरीकी साम्राज्यवादियों ने पूरी कोशिश की कि चीनी शासक रूस के साथ न खड़े हों। लेकिन ताइवान और दक्षिण चीन सागर के मसले में वे चीन को घेरने की कोशिश में लगे थे। चीनी शासक अमरीकी साम्राज्यवादियों के मंसूबों को समझते थे। अमरीकी शासक पहले ही चीन को अपना दूरगामी प्रतिस्पर्धी घोषित कर चुके थे। वे चीन को रूस से अलग करके पहले रूस को पराजित करना चाहते थे, बाद में वे चीन से निपटने की कोशिश करते। लेकिन नेन्सी पलोसी की ताइवान यात्रा और अभी हाल में चीन के गुब्बारों को अमरीका द्वारा गिराये जाने के बाद, अमरीकी साम्राज्यवादियों के साथ चीन के सम्बन्ध खराब होते गये। ये तो महज तात्कालिक कारण हैं। दूरगामी तौर पर अमरीकी साम्राज्यवादियों और चीनी साम्राज्यवादियों का व्यापार युद्ध चल रहा था। यह दोनों विश्व शक्तियों के बीच प्रतिद्वन्द्विता का कारण है। चीनी साम्राज्यवादी वैश्विक पैमाने पर अपने विस्तार को लगातार आगे बढ़ा रहे हैं। मध्य एशिया, यूरोप, अफ्रीका और लातिन अमरीका तक चीनी साम्राज्यवादी अपने व्यापार-कारोबार का विस्तार कर रहे हैं। अमरीकी साम्राज्यवादी उधर यूरोप में रूस के विरुद्ध लामबंदी किये हुए हैं और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चीन को घेरने की कोशिश में लगे हुए हैं। इस स्थिति में रूसी साम्राज्यवादियों और चीनी साम्राज्यवादियों का मुश्तरका प्रतिद्वन्द्वी अमरीकी साम्राज्यवादी हैं। इसने अमरीकी साम्राज्यवादियों के नेतृत्व वाली दुनिया के विरुद्व दुनिया के अलग-अलग देशों को अलग-अलग क्षेत्रीय संगठनों के इर्द-गिर्द खड़ा करके अमरीकी प्रभुत्व को चुनौती देने में भूमिका निभायी है। शंघाई सहकार संगठन, ब्रिक्स और यूरेशिया आर्थिक संघ जैसे संगठनों के जरिये अमरीकी प्रभुत्व को चुनौती देने की कोशिशें तेज हुई हैं।

इस तरह, रूस-यूक्रेन युद्ध ने जहां अमरीकी साम्राज्यवादियों की अगुवायी में नाटो/यूरोपीय संघ और उनके समर्थक देशों को एक गुट के बतौर खड़ा किया है, वहीं रूस, चीन के साथ ईरान, उत्तरी कोरिया, क्यूबा, वेनेजुएला इत्यादि देशों को तथा कई क्षेत्रीय संगठनों के तहत देशों को दूसरे गुट के बतौर खड़ा किया है। पहला गुट अमरीकी प्रभुत्व वाली दुनिया बनाये रखना चाहता है। जबकि दूसरा गठबंधन अमरीकी प्रभुत्व वाली दुनिया में बदलाव चाहता है। इन दोनों गठबंधनों के बीच संघर्ष की अभिव्यक्ति रूस-यूक्रेन युद्ध में दिख रही है। दुनिया के अलग-अलग देशों के शासक अपने लाभ को देखते हुए इस या उस गुट में या दोनों से सौदेबाजी करके अपना हित साधने की कोशिश कर रहे हैं।

जैसे-जैसे युद्ध लम्बा खिंचता जा रहा है, वैसे-वैसे अमरीकी साम्राज्यवादियों के नेतृत्व में चलने वाले गुट के बीच दरारें भी पड़ना शुरू हो चुकी हैं। इस युद्ध से नुकसान यूरोपीय देशों को हो रहा है। यूरोपीय देश रूसी गैस और तेल पर निर्भर थे। रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगने के बाद उन्हें तेल और गैस को ऊंची कीमत पर खरीदना पड़ रहा है। उनके उद्योग ठप हो रहे हैं। महंगाई बढ़ रही है। यूरोप के मजदूरों-मेहनतकशों की जिंदगी दूभर होती जा रही है। फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय देशों में मजदूरों-मेहनतकशों के युद्ध के कारण बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी और सुविधाओं में कटौती के विरुद्ध बड़े-बड़े प्रदर्शन हुए हैं। ये प्रदर्शन इन सरकारों द्वारा यूक्रेन में सैनिक मदद झोंकने के विरुद्ध रहे हैं। फ्रांस व जर्मनी जहां रूस के विरुद्ध युद्ध में यूक्रेन की मदद कर रहे हैं, वहीं फ्रांस के राष्ट्रपति यह भी कह रहे हैं कि अमरीका अपने यहां से चौगुनी कीमत पर यूरोप को गैस और तेल बेच कर मनमाना मुनाफा कमा रहा है। फ्रांस और जर्मनी किसी तरह से रूस के साथ कोई समझौता यूक्रेन द्वारा कराना चाहते हैं। जहां तक अमरीकी साम्राज्यवादियों की बात है वे युद्ध को ज्यादा से ज्यादा लम्बा खींचना चाहते हैं। हालांकि वे भी समझते हैं कि युद्ध के मैदान में रूस को पराजित करना यूक्रेन के लिए संभव नहीं है। अभी कुछ दिनों पहले अमरीकी सेना के सबसे बड़े अधिकारी ने कहा कि यूक्रेन युद्ध के जरिये रूस से क्रीमिया सहित दूसरे इलाके को जीत लेगा, इसकी संभावना बहुत कम है।

युद्ध के दूसरे वर्ष में प्रवेश करने के बाद रूसी सेना के हमले और तेज हो गये हैं। अमरीका और दूर तक मार करने वाले हथियार, मिसाइलें और लड़ाकू जेट जहाज यूक्रेन को देता है और यूक्रेन रूस के भीतर हमले करता है या यदि रसायनिक हथियारों का इस्तेमाल करता है तो हो सकता है कि यह युद्ध और विकराल रूप धारण कर ले। आणविक हथियारों के इस्तेमाल की संभावना से भी पूरी तरह इंकार नहीं किया जा सकता है। रूसी शासकों ने यह स्पष्ट तौर पर घोषित किया है कि वे आणविक हथियारों का इस्तेमाल तभी करेंगे जब उनके लिए अस्तित्व का संकट आ जायेगा।

पिछले एक वर्ष के दौरान और उसके पहले भी अमरीकी साम्राज्यवादियों ने नार्ड स्ट्रीम पाइप लाइन I और II में विस्फोट कराने में भूमिका निभाई है। इसकी स्पष्ट जानकारी अमरीकी खोजी पत्रकार सैम्युअल हर्श ने दी है। उनका कहना है कि नार्वे के साथ मिलकर अमरीका ने इन पाइपलाइनों में विस्फोट कराया था। इसी प्रकार, यूक्रेन के भीतर बायोलैब के जरिये अमरीकी ऐसे जीवाणु निर्मित करने का कार्य कर रहे थे, जिससे कि बड़ी आबादी में प्राणघातक बीमारियां फैलायी जा सकें।

रूस-यूक्रेन युद्ध के एक साल ने दुनिया भर में विशेष तौर पर गरीब मुल्कों में खाद्यान्न संकट पैदा किया है। अफ्रीका के 23 देश यूक्रेनी और रूसी गेहूं, खाने के तेल आदि पर निर्भर रहे हैं। इस युद्ध के चलते खाद्यान्न की आपूर्ति ठप हो गयी है। वहां भुखमरी की स्थिति आ गयी है। इसी प्रकार दुनिया भर में उद्योगों के मालों की वितरण प्रणाली बाधित हुई है। इससे दुनिया भर में अभाव की स्थिति निर्मित हुई है। इसके सर्वाधिक शिकार गरीब देश हुए हैं।

इस युद्ध ने और इसके चलते रूस पर आर्थिक प्रतिबंधों ने अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा के लेन-देन की वैकल्पिक प्रणाली खड़ी करने की ओर रूस और चीन जैसे देशों को धकेला है। डॉलर पहले ही कमजोर हो रहा था अब अंतर्राष्ट्रीय लेन-देन में डॉलर पर निर्भरता कम होती जा रही है। इससे भी अमरीकी प्रभुत्व को धक्का लगेगा।

रूस-यूक्रेन युद्ध के दूसरे साल के दौरान यह स्पष्ट होता जा रहा है कि अमरीकी प्रभुत्व वाली दुनिया अब नहीं रहने वाली है। इस युद्ध का चाहे जो भी परिणाम हो, अब कई साम्राज्यवादी ताकतों के बीच प्रतिद्वन्द्विता और तेज होगी। साम्राज्यवादियों के बीच के अंतरविरोध और टकराहटें तेज होंगी। विशेष तौर पर अमरीकी और चीनी साम्राज्यवादियों के बीच संघर्ष, टकराहटें और प्रभाव क्षेत्रों के लिए संघर्ष तीव्र होंगे। इस युद्ध के दौरान, रूसी साम्राज्यवादी कमजोर होंगे, वे चीन के साथ मिलकर ही अमरीकी साम्राज्यवादियों से प्रतिद्वन्द्विता में आ सकते हैं।

जिस प्रकार, मजदूर-मेहनतकश आबादी इस युद्ध में तबाह-बर्बाद हो रही है, और वह अलग-अलग देशों में अपनी गिरती हुई हालत के विरुद्ध उठ खड़ी हो रही है, उसके संघर्ष आने वाले दिनों में और तेज होंगे। वे तात्कालिक तौर पर अपनी गिरती हुई हालत के विरुद्ध संघर्ष करते हुए देर-सबेर इस नतीजे पर पहुंचेंगे कि उनकी बुरी अवस्था का कारण यह पूंजीवादी-साम्राज्यवादी व्यवस्था है जो युद्धों को जन्म देती है और मजदूरों-मेहनतकशों के बेटे-बेटियों को एक-दूसरे के विरुद्ध गला काटने के लिए उकसाती है। अतः जब तक यह आदमखोर व्यवस्था कायम है, उनकी बुरी अवस्था नहीं खत्म होगी।

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