सांप कहो, या श्रीमान सांप कहो, वह तुम्हें काट डालेगा

कुछ लोग ऐसा सोचते हैं कि वह अगर सांप को श्रीमान सांप कहेंगे तो वह काटेगा नहीं। भला सांप कब से ऐसा करने लगे कि कोई अगर उसके प्रति सम्मान दिखाये या भद्रता-नम्रता का प्रदर्शन करे तो वह उसे अभय दान दे दे।

कुछ धार्मिक अंधविश्वासी तो सांप को इसलिए ही दूध पिलाने लगते हैं ताकि वह सांप तो क्या सांप परिवार का कोई सदस्य उन्हें कभी भी न काटे। ‘सांप को दूध पिलाना’ मुहावरा अपनी सीख अपने आप कह देता है पर कई लोग सांप को दूध पिलाते ही रहते हैं। उन्हें इस वैज्ञानिक ज्ञान से कोई लेना-देना नहीं है कि सांप दूध नहीं पीते वे तो सीधे अपने जहरीले दांतों से मौत बांटते हैं। 
    
सांप तो फिर भी प्राणी जगत का हिस्सा है जो अपने ‘‘धर्म’’ के अनुसार चलता है। इस सांप से तो मनुष्य निपटने की क्षमता विकसित कर चुका है। काटे गये मनुष्य को इलाज तुरन्त मिल जाये तो उसकी जान भी बच सकती है। परन्तु उन मनुष्य रूप धारी सांपों का क्या करेंगे जिनकी पैदावार भारत में काफी बढ़ गयी है। गजब तो ये है कि इन सांपों का एक मुंह नहीं बल्कि कई-कई मुंह हैं। ये मनुष्य रूप धारी सांप एक ऐसा राष्ट्र बनाना चाहते हैं जहां सांपों का राज चलता हो। कुछ भोले या सांपों के ‘‘धर्म’’ से अनजान मनुष्य सोचते हैं कि वे इन्हें ‘‘श्रीमान सांप!’’ कहेंगे तो उन्हें ये काटेंगे नहीं!

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शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त यह मत प्रस्तावित करता है कि लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए जरूरी है कि कार्यपालिका-विधायिका व न्यायपालिका परस्पर स्वतंत्र हों। अगर कार्यपालिका किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करना चाहे तो न्यायपालिका उसे रोक दे। फ्रांसीसी दार्शनिक मांतेस्क्यू को इस शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त का मूल प्रस्तावक माना जाता है।

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पूंजीवादी जनतंत्रों में चुनाव ‘सेफ्टी बाल्व’ का काम करता है। बदहाल और दुःखी परेशान लोग नयी सरकार को चुन उम्मीद करते हैं कि उनकी जिन्दगी में शायद बेहतरी हो जाये। अमरीका जैसे देश में तो इसी वजह से दोनों प्रमुख पार्टियां बारी-बारी से सत्ता में आती रहती हैं। चुनाव के जरिये सरकारें बदलती रहती हैं और पूंजीवादी व्यवस्था बदस्तूर चलती रहती है। मजदूर-मेहनतकश जनता बेहतरी की मृग मरीचिका में जीती रहती है। 

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मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

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अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

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एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।