तुम्हारा डर, हमारी जीत -वंदना
ऐ शोषक!
तुम्हारे लिए आसान होगा
हमें कैद कर देना
पर हमें इससे डर नहीं लगता
बल्कि आती है
तुम्हारी इस धूर्तता पर हंसी।
कितना डरते हो तुम हमसे
ऐ शोषक!
तुम्हारे लिए आसान होगा
हमें कैद कर देना
पर हमें इससे डर नहीं लगता
बल्कि आती है
तुम्हारी इस धूर्तता पर हंसी।
कितना डरते हो तुम हमसे
जीवन के इस पल में...
हमने महसूस किया है, कल को
जब बात उठी है, पुरखों की...
हमने याद किया है, भगत सिंह को।
लाख पैदा हुए, लाख मुर्दा हुए
वही तो अब तक जिंदा है...
कौन जात हो भाई?
‘‘दलित हैं साब!’’
नहीं मतलब किसमें आते हो?
आपकी गाली में आते हैं
गंदी नाली में आते हैं
और अलग की हुई थाली में आते हैं साब!
पहले खेत बिके
फिर घर फिर जेवर
फिर बर्तन
और वो सब किया जो गरीब और अभागे
तब से करते आ रहे हैं जब से यह दुनिया बनी
पत्नी ने जूठा धोया
ये जगह जो अभी
योजनाओं और नीतियों में
ले रही आकार
जिस पर झूम रही सरकार
घात लगाए हैं विश्व-व्यापी व्यापार
और तुम हो कितने गंवार
तुम जैसों के कारण ही
काश ये बेटियां बिगड़ जाएं
इतना बिगड़ें के ये बिफर जाएं
उन पे बिफरें जो तीर-ओ-तेशा लिए
राह में बुन रहे हैं दार ओ रसन
और हर आजमाइश द- ए -दार -ओ द- रसन
बात करते हैं और सपने बहुत देखते हैं लोग
बेहतर भविष्य के लिए,
सुखी स्वर्णिम लक्ष्य के लिए,
देखा जाता है उन्हें दौड़ते हुए और पीछा करते हुए,
हम अत्याचारी से पूछते हैं-
हमें यातना देना कब बंद करोगे तुम
वह हमसे पूछता है-
सांप कब खड़ा होगा अपने पैरों के बल
चूहा कब शादी करेगा बिल्ली के बच्चों से
बादलों और परिंदों की खातिर अब कोई जगह नहीं है
अब काले चिरायंध धुंए से भरे आसमान में
बारूद की चिरंतन गंध ने अगवा कर लिया है
फूलों की खुशबू...वनस्पतियों का हरापन
युद्ध सेनायें नहीं करतीं
युद्ध शासक करते हैं
युद्ध में शासक नहीं मरते
सैनिक मरते हैं
जनता मरती है..
वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?
अमेरिकी साम्राज्यवादी अब ऐसी स्थिति में नहीं रह गये हैं कि वे नाटो देशों को सीधे आदेश जारी करें। इसे ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन जैसे क्षेत्रीय गठबंधनों का सामना करना पड़ रहा है। ये सारे गठबंधन अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया को एक हद तक चुनौती दे रहे हैं।
अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।
अमेरिकी साम्राज्यवादी पश्चिम एशिया में और सारी दुनिया में अपनी साम्राज्यवादी जकड़न को खत्म नहीं होने देना चाहेंगे। वे इसके खिलाफ हर संभव प्रयास करेंगे। एक हमले में मुंह की खाने के बाद वे सबक लेकर आगे हमला करने से तौबा नहीं करेंगे। यह उनकी साम्राज्यवादी फितरत के खिलाफ होगा। यानी वे ईरान पर काबू पाने के लिए दूसरे तरीकों की खोज में लग जायेंगे।
पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।