‘समान नागरिक संहिता’ : कहीं पे निगाह कहीं पे निशाना

एक जर्मन कहावत है, ‘‘बदलाव और बेहतरी के लिए बदलाव; दो अलग बातें हैं’’। जर्मनी के ही उदाहरण से हम जानते हैं कि अपने दौर में हिटलर ने भी जर्मनी के सामाजिक-राजनैतिक ढांचे में बहुत-बहुत बदलाव किये थे। हिटलर ने जो बदलाव किये थे वे बेहतरी के लिए नहीं थे। हिटलर के बदलाव से जर्मनी एक फासीवादी-नाजीवादी राज्य में बदल गया था और फिर उसने एक-एक करके यूरोप के देशों को फासीवादी-नाजीवादी शिकंजे में कस डाला था। दूसरे विश्व युद्ध में पांच करोड़ लोगों के मारे जाने के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार हिटलर ही था। 
    
हिटलर की तर्ज पर ही बदलाव की बयार भारत में पिछले दस सालों से बह रही है। उत्तराखण्ड विधानसभा में हालिया पास की गई ‘समान नागरिक संहिता’ हिटलरी तर्ज पर होने वाले बदलाव का ही हिस्सा है। यह संहिता निजी और धार्मिक स्वतंत्रता का अपहरण कर उत्तराखण्ड के नागरिकों को राज्य के फासीवादी शिकंजे में जकड़ने की कोशिश है। धार्मिक अल्पसंख्यकों और महिला-युवाओं की स्वतंत्रता, जनवादी अधिकारों पर राज्य का शिकंजा कसना है। एक ओर धार्मिक अल्पसंख्यकों व महिला-युवाओं पर राज्य और उसकी पुलिस की निगरानी बढ़ाना है और दूसरी ओर विवाह व ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ के रजिस्ट्रेशन सम्बन्धी प्रस्तावों के जरिये एलजीबीटीक्यू उत्पीड़ित समुदायों के जीवन को घोर संकट में डालना है। 
    
उत्तराखण्ड राज्य की ‘समान नागरिक संहिता’ में समान शब्द सबसे ज्यादा बेतुका है। एक ओर यह भारत के संविधान द्वारा दिये गये धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का अपहरण कर लेती है और दूसरी ओर निजता के अधिकार को खत्म कर देती है। विवाह के परम्परागत तरीकों को (हर विवाह के लिए पंजीकरण आवश्यक कर) अमान्य व अपर्याप्त घोषित कर देती है। विवाह तभी माना जायेगा जब उसका पंजीकरण हो जायेगा। यह लोगों के सामाजिक जीवन व धार्मिक रीति-रिवाजों का माखौल उड़ाना है। यह एक तरह से विवाह के परम्परागत तौर-तरीकों को अमान्य घोषित करने के साथ उसको एक अपराधिक कृत्य का जामा पहनाने की कोशिश भी है। 
    
‘लिव-इन रिलेशनशिप’ के साथ तो यह संहिता ऐसे व्यवहार करती है मानो यह कोई सामाजिक अपराध हो। ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ में रहने वाले युवाओं को ऐन-केन प्रकारेण सुधारने अथवा कानूनी व सामाजिक दण्ड देने का प्रावधान करती है। यह संहिता मनमाने ढंग से युवाओं को अठारह वर्ष के बाद भी नाबालिग घोषित कर देती है। मताधिकार हासिल कर चुके युवाओं को इस बात के लिए अयोग्य घोषित कर देती है कि वे अपने निजी जीवन का फैसला लेने के योग्य हैं। ‘‘गार्जियनशिप’’ की अवधारणा को गैर संवैधानिक ढंग से घुसेड़ देती है। 
    
‘लिव-इन रिलेशनशिप’ की पंजीकरण की अनिवार्यता हर उस जोड़े को सामाजिक व कानूनी दृष्टि से खतरनाक स्थिति में धकेल देती है जो कि अंतर-धार्मिक व अंतर-जातीय हो। खासकर अगर कोई हिन्दू स्त्री यदि किसी मुस्लिम के साथ प्रेम संबंध में हो अथवा सह जीवन जी रही हो तो उसका जीवन न केवल नरक बन जायेगा बल्कि ऐसा सम्बन्ध उसका और उसके पार्टनर का जीवन भी छीन सकता है। किसी बहशी, मूर्ख पार्टनर द्वारा किसी महिला पार्टनर की हत्या को आधार बनाकर यह संहिता हर महिला व युवा के निजता के अधिकार का अपहरण कर लेती है। 
    
हद तो यह है कि यह संहिता हर उस नागरिक के जीवन को संचालित करने की कोशिश करती है जिसका संबंध किसी न किसी रूप से उत्तराखण्ड से हो। या तो वह आकर उत्तराखण्ड में बस गया हो या फिर किसी दूसरे राज्य में रहने वाले जोड़ों में से कोई एक उत्तराखण्ड का वासी हो। इस तरह से यह संहिता उत्तराखण्ड राज्य के दायरे को लांघने की बचकाना कोशिश करती है।
    
यह संहिता हिन्दू फासीवादी परियोजना का हिस्सा है। यह संहिता खासकर मुस्लिम धर्मावलम्बियों को निशाने पर लेती है। यह पहले मुस्लिम धर्म को मानने वालों के धार्मिक रीति-रिवाजों व धार्मिक अनुष्ठानों को सामाजिक रूप से गलत बताती है और फिर मुस्लिम पुरुषों का दानवीकरण करती है। मुस्लिम पुरुषों को ऐसे पेश करती है मानो उनमें से हर कोई चार विवाह करके बैठा है और हर कोई हर समय बस तलाक देने की जुगत में लगा रहता है। सच्चाई यह है कि बहु विवाह समाज में नाम मात्र को भी प्रचलित नहीं है। वह जितना प्रचलित है उसमें हिन्दू-मुसलमानों में खास फर्क नहीं है। जनगणना के पुराने आंकड़ों के अनुसार वह महज चार-पांच फीसदी है। बहुविवाह का प्रचलन कई जनजातीय समुदायों में सदियों से है। यह संहिता हर मामले में उत्तराखंड की जनजातियों को इससे अलग रख देती है। इस संदर्भ में भी यह ‘‘समान’’ नहीं है। 
    
जनजातियों को ‘समान नागरिक संहिता’ से बाहर रखना और धार्मिक अल्पसंख्यकों को लक्षित करना अपनी कहानी आप कह देता है। जनजातियों को इससे पहले केन्द्र सरकार द्वारा पारित ‘नागरिकता (संशोधन) अधिनियम (सीएए) से भी बाहर रखा गया था। इन्हें भय है कि यदि जनजातियों को छेड़ा गया तो वे आपे से बाहर हो जायेंगी। और इनकी हिन्दू फासीवादी परियोजना को पलीता लगा देंगी। संघ-भाजपा के जनजातियों-आदिवासियों के ‘हिन्दूकरण’ की योजना मिट्टी में मिल जायेगी। ये मंसूबा अपने जन्म के समय से पालते हैं कि भारत की जनजातियों-आदिवासियों को हिन्दू बनाया जा सकता है। परन्तु इन्हें ठीक से पता है कि मुस्लिम व अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों को बहुत चाहने व प्रयास करने के बावजूद हिन्दू नहीं बनाया जा सकता है। उनका तो दमन करके सिर्फ दूसरा नागरिक बनाया जा सकता है। उनके नागरिक-जनवादी अधिकारों को छीना या कम किया जा सकता है। इस रूप में यह संहिता धार्मिक अल्पसंख्यकों को दूसरा नागरिक बनाने की दिशा में धकेलने का एक घृणित प्रयास है। 
    
‘समान नागरिक संहिता’ के संदर्भ में समानता तथा एकरूपता की बातें चाहे जितनी की जायें यह असल में इनकी आड़ में राज्य के दखल को जीवन के उस क्षेत्र में संस्थागत रूप से बढ़ा देती है जहां किसी भी राज्य को सबसे कम हस्तक्षेप करना चाहिए। दो वयस्कों के निजी जीवन, प्रेम विवाह आदि सवालों पर राज्य का हस्तक्षेप न्यून से न्यून होना चाहिए। 
    
महिलाओं के अधिकारों व उनकी सुरक्षा के नाम पर यह उन्हें उनके परिवार के पुरुषों के मातहत रख देती है। एक स्त्री के साथ भेदभाव को सुनिश्चित करने के लिए यह राज्य की ताकत का बेजा इस्तेमाल करती है। धार्मिक अल्पसंख्यकों की तरह उन्हें भी दूसरे स्तर का नागरिक बना देती है। ऐसा न केवल ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ संबंधी प्रावधानों में बल्कि बच्चों की देखरेख संबंधी ‘गार्जियन शिप’ संबंधी प्रावधानों में भी स्पष्ट रूप से झलकता है। पारिवारिक सम्पत्ति सम्बन्धी समान अधिकार का थोड़ा बहुत महत्व उन परिवारों के लिए हो सकता है जिनके पास किसी किस्म की भू-सम्पत्ति अथवा आभूषण या जमा पूंजी है। उस मजदूर-मेहनतकश आबादी जो कि राज्य की बहुसंख्या है; के लिए यह प्रावधान सिर्फ औपचारिक कानूनी महत्व भर रखता है। जहां हर मजदूर परिवार दो जून की रोटी के लिए रात-दिन एक कर दे रहा हो वहां बांटने-बूटने के लिए कुछ अगर होता है तो वह गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी व अभाव होता है। हर समय इस आतंक में जीना होता है कि कब उनकी बस्ती या घर को अवैध या अतिक्रमण कहकर उजाड़ दिया जायेगा। ऐसा घर या जमीन क्या लड़के व क्या लड़की को मिलेगी। इसलिए महिलाओं को विरासत के रूप में समान अधिकार उनके हाथ में झुनझुना पकड़ाना भर है। 
    
‘समान नागरिक संहिता’ एक ऐसा हिन्दू फासीवादी दस्तावेज है जिसके ऊपर समानता का झूठा नाम चिपका हुआ है। इसकी जगह कूड़ेदान के अलावा भला कहां और हो सकती है।   

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