आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, मिनी कार्यकर्ता और सहायिका
सरकार ने आंगनबाड़ी योजना 1975 में लागू की थी। आंगनबाड़ी योजना को एकीकृत बाल विकास सेवा कहा गया। सरकार के अनुसार आंगनबाड़ी योजना शुरू करने का मुख्य कारण कुपोषण से लड़ना है। 6
सरकार ने आंगनबाड़ी योजना 1975 में लागू की थी। आंगनबाड़ी योजना को एकीकृत बाल विकास सेवा कहा गया। सरकार के अनुसार आंगनबाड़ी योजना शुरू करने का मुख्य कारण कुपोषण से लड़ना है। 6
वेतन बढ़ोत्तरी की मांग को लेकर पैदा हुआ भारत के मजदूरों का उभार लगातार जारी है। हरियाणा, उ.प्र., राजस्थान, उत्तराखण्ड, पंजाब आदि राज्यों में फैलते हुए यह लगभग समूचे उत्तर
अप्रैल माह की शुरूआत से मानेसर-नोएडा-फरीदाबाद-भिवानी में एक के बाद एक फैक्टरी में मजदूरों का आक्रोश दावानल बनकर फूट पड़ा। सालों से अपने मालिकों-प्रबंधन के शोषण-उत्पीड़न को
मजदूर-कर्मचारी की परिभाषा में विभ्रम पैदा करने एवं प्रशिक्षुओं व कम आय वाले सुपरवाइजरों को मजदूर न माने जाने; साथ ही, फिक्स्ड टर्म एम्प्लायमेंट (FTE) के तहत नये अधिकार विहीन मजदूरों की भर्ती का सीधा असर ट्रेड यूनियनों के आधार पर पड़ेगा, जो कि अब बेहद सीमित हो जायेगा। इस तरह यह संहिता सचेतन ट्रेड यूनियनों के आधार पर हमला करती है।
सरकार रोजगार को बढ़ावा देने के लिये तरह-तरह की योजनायें लाती रहती है। खासकर ऐसी योजनायें जिससे पूंजीपतियों को भी लाभ मिल सके। जैसे स्प्री स्कीम (SPREE SCHEME), प्रधानमंत्र
पूरी दुनिया में जापान के मजदूरों के अत्यन्त परिश्रमी होने की बातें कही सुनी जाती है। भारत में तो इससे आगे यह भी कहानी सुनने को मिल जाती है कि जापान के मजदूर अपनी मांगें म
अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।
भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और
उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।
तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है।
वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?