तीन मुहल्ले

Published
Thu, 07/16/2026 - 15:50
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इसी शहर के तीन मुहल्ले 
आपस में बातें करते हैं 
अपने सुख-दुख अपनी खुशियां
मिलकर बांटा करते हैं 

एक मुहल्ला सूना सा है 
लेकिन लक-दक करता है 
चिकनी-चुपडी सड़कें हैं 
लाइट मारा करता है  
लेकिन इसकी एक समस्या
ज्यादातर मकान खाली हैं 
किसी-किसी में बूढ़ा-बुढ़िया 
एक नौकर और एक माली है 
बच्चे ज्यादातर विदेश में  
बड़ा-बड़ा सा घर खाली है 

एक मुहल्ला मिडिल क्लास का 
इसमें कुछ जीवन रहता है 
छोटे से मकान का मालिक 
थोड़ा तना तना रहता है 
जात धरम के सारे लफड़े 
इसी मुहल्ले में रहते हैं 
हिन्दू-मुस्लिम एक दूजे से 
थोड़े बचे-बचे रहते हैं  
यही मुहल्ला सबसे ज्यादा 
इज्जत की चिंता करता है 
किसी तरह से चिंतित मुख पर 
शान भी ओढे रहता है 

सड़क किनारे नाले के 
पास जमीन पार हैं मकान 
इसमें रहते हैं मजूर सब 
जो कुछ पहले थे किसान 
इसी मुहल्ले में सारे  
मेहनत वाले रहते हैं  
मक्खी मच्छर और अंधेरा  
सभी दुखों को सहते हैं 
इस बस्ती की बहोत औरतें 
सुबह काम पर जाती हैं 
शाम थकी होने के कारण 
बच्चों को डांट लगाती हैं  
इस बस्ती की शाम मगर 
जीवन में ड़ूबी होती हैं 
कहीं पकेगी दाल और रोटी 
मच्छी करी कहीं पकती है 
इंसानों का भाईचारा 
इसी मुहल्ले में रहता है  
राहुल को रहमान सा भाई इसी मुहल्ले में मिलता है 
इसी मुहल्ले को लेकिन गिरने का डर सताता है 
सरकारी बुल्डोजर जब भी अपनी गश्त लगाता है 
इसी मुहल्ले का एक रास्ता 
नई सुबह को जाता है 

कुछ दिन से यह सभी मुहल्ले 
खिंचे खिंचे से रहते हैं 
बड़े मुहल्ले छोटे को  
कुछ ना कुछ कहते रहते हैं 
हालांकि सारे काम भी उनके 
इनके बल पर ही चलते हैं.....
    -आशुतोष सिंह

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