उत्पीड़न के विरुद्ध भोजनमाताओं का विरोध-प्रदर्शन

रामनगर (नैनीताल) में 22 मार्च को प्रगतिशील भोजनमाता संगठन के बैनर तले बहुत सी भोजनमातायें उप जिलाधिकारी कार्यालय के समक्ष एकत्रित हुईं और स्कूलों में किये जा रहे उनके उत्पीड़न के विरुद्ध जोरदार विरोध-प्रदर्शन किया। तदुपरांत उपजिलाधिकारी की अनुपस्थिति में एक ज्ञापन तहसीलदार को प्रेषित किया।

अपने ज्ञापन में भोजनमाताओं ने आरोप लगाया कि स्कूलों में उनके लिये तय काम-खाना बनाना और बांटना तथा बर्तन धोना- के अतिरिक्त अन्य बहुत सा काम उनसे कराया जाता है और इससे इंकार करने पर उन्हें परेशान किया जाता है और किसी मामले में फंसा देने अथवा निकालने की धमकी दी जाती है।

भोजनमाताओं ने इसकी जांच कराने व दोषियों के विरुद्ध कार्यवाही की मांग की। गौरतलब है कि विभिन्न स्कीम वर्कर्स- भोजनमाताओं एवं आशा व आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को सरकार न्यूनतम वेतन भी देने को तैयार नहीं है और मामूली मानदेय पर उनसे बेगारी कराई जा रही है जिसके विरुद्ध सभी स्कीम वर्कर्स को अपने संगठनों को मजबूत बनाने एवं व्यापक एकजुटता कायम करने की जरूरत है। भोजनमाताओं समेत सभी स्कीम वर्कर्स को चतुर्थ श्रेणी के सरकारी कर्मचारी का दर्जा हासिल करने एवं उसी अनुरूप वेतन पाने का पूरा हक़ है और इसके लिये उन्हें अपने आंदोलन को तेज करना होगा। -एक पाठक, रामनगर

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अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

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भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

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उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

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तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

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वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?