युद्ध और कूटनीति: उथल-पुथल से भरी दुनिया

Published
Wed, 09/16/2026 - 15:50
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अमरीकी साम्राज्यवाद पराभव की ओर है। अभी वह दुनिया की सबसे बड़ी ताकत है लेकिन उसको चुनौती देने वाली और भी ताकतें उभर कर आयी हैं। यूक्रेन में रूस की विजय आसन्न है। यूक्रेन अब यूरोपीय साम्राज्यवादियों की मदद पर टिका हुआ है। अमरीकी साम्राज्यवादी पीछे हट रहे हैं। वे कूटनीति के जरिये रूसी साम्राज्यवादियों के साथ तालमेल बैठाने की कोशिशें कर रहे हैं। ट्रम्प ने अपने दामाद जेरेज कुशनर और अपने विशेष प्रतिनिधि विकटाफ को पुतिन के पास भेज कर यूक्रेन सम्बन्धी समझौते कराने की फिर से पहल की है। यूक्रेन के मसले पर अमरीकी साम्राज्यवादी पीछे हट रहे हैं। वे यूक्रेन पर रूस की शर्तों पर समझौता करने के लिए दबाव डाल रहे हैं। लेकिन ईरान पर ट्रम्प बार-बार अपनी विजय की घोषणा कर रहे हैं। ट्रम्प अब यह घोषित कर रहे हैं कि नवम्बर में होने वाले मध्यावधि चुनाव के बाद ईरान पर उसकी अंतिम विजय हो जायेगी। वे होरमुज जलडमरूमध्य को ट्रम्प जलडमरूमध्य घोषित कर रहे हैं। अमरीकी साम्राज्यवादी होरमुज जलडमरूमध्य की घेरेबंदी किये हुए हैं। उन्होंने ईरान के दक्षिण के कई टापुओं में लगातार बमबारी की है। उन्होंने नागरिक आबादी पर हमले किये हैं। इसका जवाब ईरान ने अमरीकी फौजी अड्डों को तबाह करके दिया है। ईरान ने अमरीकी मानव रहित पनडुब्बी पर होरमुज जलडमरूमध्य के प्रवेश द्वार पर कब्जा कर लिया है। अमरीकी साम्राज्यवादियों ने ईरान के तेल टैंकरों को डुबो दिया है। बदले मंे ईरान ने कई अमरीकी और अमरीकी मदद से गुजरने वाले टैंकरों पर हमला किया है। ईरान की हुकूमत अब यह घोषणा कर रही है कि उनके नियंत्रण मंे अब सिर्फ होरमुज जलडमरूमध्य का क्षेत्र ही नहीं है बल्कि ओमान की खाड़ी और अरब सागर का एक क्षेत्र तक उनके नियंत्रण में आ गया है। ईरान ने विमान वाहक युद्धपोतों पर हमले किये हैं और अमरीकी साम्राज्यवादियों को इन युद्धपोतों को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया है। इसके साथ ही, ईरान ने जार्डन में मौजूद अमरीकी अड्डों पर आधुनिक मिसाइलों से हमला करके उनके कई विमानों और हेलीकाप्टरों को नुकसान पहुंचाया है। उसने बहरीन, कुवैत और संयुक्त अरब अमीरात में मौजूद अमरीकी फौजी अड्डों को निशाना बनाया है। अब ईरान रक्षात्मक कार्रवाईयों तक अपने को सीमित नहीं रख रहा है बल्कि संभावित हमले से पहले वह आक्रामक कार्रवाईयों को अंजाम देने की रणनीति अपना रहा है। अब यह युद्ध सिर्फ ईरान की सीमाओं तक ही सीमित नहीं रह गया है। 
    
इधर यमन के अंसारूल्लाह (हौथी) लोगों ने साउदी अरब के विरुद्ध हमलों को तेज कर दिया है। साउदी अरब ने यमन के कई शहरों में बमबारी और हवाई हमले किये और साउदी समर्थक यमन की सरकार को हौथियों पर हमला करने में मदद की है। जवाब में यमन की अंसारूल्लाह सरकार ने साउदी अरब की सबसे बड़ी तेल कम्पनी अराम्को पर हमला किया है। यमन ने बाब-अल-मंदेब को साउदी अरब के लिए बंद कर दिया है। 
    
लेबनान में यहूदी नस्लवादी इजरायली हुकूमत द्वारा बड़े पैमाने पर हमले जारी हैं। वे दक्षिणी लेबनान में हिजबुल्ला को समर्थन करने वाली आबादी पर हमले कर रहे हैं। हिजबुल्ला संगठन के लड़ाके इजरायल के हमलों का जवाब ही नहीं दे रहे हैं बल्कि वे इजरायल के भीतर तक हमले कर रहे हैं। 
    
गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं। 
    
पश्चिमी तट पर इजरायल फिलिस्तीनियों को उजाड़कर वहां यहूदी बस्तियों का विस्तार कर रहा है। अंतर्राष्ट्रीय विरोध के बढ़ते जाने के बाद उसने घोषणा की है कि वह यहूदी चैकियों को खाली करेगा। यूरोप के कई देशों ने ईरान द्वारा पश्चिमी तट पर जबरन यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध किया है। ग्रेट ब्रिटेन के विदेश मंत्री ने इसका पुरजोर विरोध किया है और इसकी निंदा की है। इसके जवाब में इजरायल ने येरूशलम से ग्रेट ब्रिटेन का दूतावास बंद कर दिया है। 
    
इराक में प्रतिरोध संगठन अमरीकी फौजी ठिकानों पर हमला कर रहे हैं। पिछले महीने इन प्रतिरोध संगठनों पर अमरीकी साम्राज्यवादियों के साथ मिलकर साउदी अरब ने बमबारी की थी। इसका विरोध इराकी सरकार ने किया था। इराक के अंदर अमरीकी फौजों की मौजूदगी का विरोध हो रहा है। सितम्बर के अंत तक अमरीका ने अपने फौजी अड्डे इराक से हटाने की बात कही है। 
    
सीरिया में गोलन पहाड़ियों से आगे तक जाकर इजरायल ने कब्जा कर रखा है। सीरिया में इजरायल और तुर्की के बीच संघर्ष चल रहा है। सीरिया के उत्तरी हिस्से में तुर्की का प्रभाव है और दक्षिणी हिस्से पर इजरायल का कब्जा है। सीरिया की अल-गुलानी की हुकूमत इन दोनों ताकतों के समक्ष प्रभावहीन है। वहां भी प्रतिरोध संगठन संगठित हो रहे हैं। 
    
इस तरह, हम देखते हैं कि अमरीका-इजरायल द्वारा ईरान पर थोपे गये युद्ध की लपटों में समूचा पश्चिमी एशिया आ गया है। खाड़ी देशों की हुकूमतें अभी तक अमरीकी साम्राज्यवादियों के सुरक्षा कवच के भरोसे थीं। लेकिन इस युद्ध के दौरान अमरीकी साम्राज्यवादियों के इन देशों में मौजूद फौजी अड्डे ही सुरक्षित नहीं रहे तो इस क्षेत्र के शासकों का अमरीकी सुरक्षा कवच पर भरोसा हिल गया। खाड़ी के देशों में अमरीकी साम्राज्यवादियों का एकछत्र प्रभुत्व था। अमरीकी साम्राज्यवादी अपने फौजी अड्डों के रख-रखाव का खर्च भी इन्हीं देशों से वसूलते थे। अब जब वे सुरक्षित नहीं रहे तो खाड़ी के देश वैकल्पिक सुरक्षा प्रणाली विकसित करने के बारे में सोचने लगे। तुर्की, साउदी अरब और पाकिस्तान ने मिलकर एक सुरक्षा संगठन का निर्माण किया। भविष्य में इसमें ईरान भी शामिल हो सकता है। खाड़ी के देशों के शासक जहां अमरीकी साम्राज्यवाद की तरफ झुकाव रखते हैं, वहीं इन देशों की व्यापक आबादी फिलिस्तीन की आजादी की समर्थक है और अमरीकी साम्राज्यवादियों और यहूदी नस्लवादी इजरायली हुकूमत की विरोधी है। इसीलिए जब अमरीकी फौजी अड्डों पर ईरानी मिसाइलें गिरती हैं तो वहां की अवाम जश्न मनाती है। ये दृश्य जार्डन, बहरीन और कुवैत में देखे गये हैं। 
    
ईरान ने यह घोषित किया है कि अमरीकी फौजी अड्डों को इस क्षेत्र से जाना होगा। अमरीकी साम्राज्यवादी इस क्षेत्र की तमाम अस्थिरता व गड़बड़ी के लिए जिम्मेदार हैं। यदि इस क्षेत्र में स्थायित्व लाना है और इसकी सुरक्षा करनी है तो क्षेत्रीय सुरक्षा तंत्र विकसित करना होगा। ईरान की हुकूमत क्षेत्रीय सुरक्षा तंत्र विकसित करने में सभी पड़ोसी देशों के साथ मिलकर काम करने की बात करती रही है। ईरान ने ओमान के साथ मिलकर होरमुज जलडमरूमध्य के प्रबंधन के सम्बन्ध में एक समझौता भी किया है। 
    
ईरान का यह स्पष्ट कहना है कि यदि अमरीकी साम्राज्यवादी उसकी घेरेबंदी नहीं समाप्त करते और उसके तेल व गैस की निकासी में बाधा खड़ी करते हैं तो इस क्षेत्र से किसी भी देश के तेल और गैस टैंकर की निकासी नहीं होगी। यदि खाड़ी के देशों के शासक अमरीकी साम्राज्यवादियों के साथ सांठ-गांठ करते हैं तो उनके तेलवाहक जहाज ही नहीं बल्कि उनके तेल व गैस भण्डार भी हमले का निशाना बन सकते हैं। 
    
ऐसी स्थिति में समूची दुनिया में तेल और गैस का संकट घनीभूत हो सकता है। अभी ही, तेल और गैस के दाम बहुत बढ़ गये हैं। दुनिया वैश्विक संकट के मुहाने पर खड़ी है। 
    
अमरीकी साम्राज्यवादियों द्वारा दुनिया भर में एकतरफावाद चलाने के चलते रूसी और चीनी साम्राज्यवादियों ने व्यापक देशों को गोलबंद करके उसका मुकाबला करने के प्रयास तेज कर दिये हैं। अभी हाल ही में किर्गिस्तान की राजधानी में शंघाई सहकार संगठन की शीर्ष बैठक हुई। इस बैठक में ईरान पर हमले की निंदा की गयी। हालांकि अमरीका और इजरायल को नाम लेकर हमलावर नहीं कहा गया। इस प्रस्ताव में भारत सरकार ने भी सहमति दी। भारत के प्रधानमंत्री ने अपनी इजरायल व अमरीका समर्थक अपनी पूर्व की अवस्थिति में बदलाव किया। 
    
अब भारत में ब्रिक्स देशों की शीर्ष बैठक हो रही है। इसमें रूस, चीन, ईरान सहित ब्रिक्स के कई देश शामिल हो रहे हैं। यहां भारत सरकार को दुविधापूर्ण स्थिति का सामना करना पड़ सकता है। रूस, चीन और ईरान डालर के प्रभुत्व को खत्म करने के लिए जोर देंगे। अभी वैकल्पिक मुद्रा की स्थापना तो दूर की बात लगती है लेकिन ब्रिक्स देशों के बीच आपसी व्यापार को बढ़ाने और उसका भुगतान आपसी मुद्रा में करने की प्रक्रिया को और गति दी जा सकती है। अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प पहले ही ब्रिक्स को लेकर धमकी दे चुके हैं। ट्रम्प ने साफ कहा है कि जो देश डालर में व्यापार को छोड़ेगा, उस पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया जायेगा। डालर आधारित बैंकिंग प्रणाली से बाहर जाने का डर भी इन देशों पर पैदा किया जा रहा है। यदि ब्रिक्स देशों के बीच आपसी मुद्रा में व्यापार में तेज गति आती है तो इससे भी डालर के प्रभुत्व को एक हद तक धक्का लग सकता है। इसमें रूस और चीन अग्रणी भूमिका निभा सकते हैं। 
    
चूंकि अमरीकी साम्राज्यवादी चीन को अपना मुख्य प्रतिद्वन्द्वी मानते हैं इसलिए वे चीन को घेरने की अपनी नीति को आगे बढ़ा रहे हैं। अभी हाल ही में, अमरीका की फौजों ने जापान और दक्षिण कोरिया के साथ संयुक्त सैन्याभ्यास किया है। ताइवान के मसले पर जापान और दक्षिण कोरिया चीन के विरुद्ध हैं। लेकिन दक्षिण कोरिया के साथ चीन के व्यापारिक सम्बन्ध पहले से ज्यादा मजबूत हुए हैं। इसलिए दक्षिण कोरिया का चीन के विरुद्ध युद्ध में उतरना थोड़ा मुश्किल है। 
    
ब्रिक्स देशों की बैठक से पहले चीन के राष्ट्रपति मिश्र की यात्रा पर गये थे। वहां पर उन्होंने मिश्र के साथ कई समझौते किये। इसके अतिरिक्त, पश्चिमी एशिया में क्षेत्रीय सुरक्षा तंत्र निर्मित करने और बाहरी हस्तक्षेप से मुक्त पश्चिमी एशिया के निर्माण में मिश्र द्वारा महत्वपूर्ण भूमिका निभाने पर चर्चा हुई। इसके बाद सितम्बर के अंत में चीन के राष्ट्रपति शी जिन पिंग की अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प से वाशिंगटन में मुलाकात होनी है। दोनों प्रतिद्वन्द्वी साम्राज्यवादी शक्तियों की इस मुलाकात में वैश्विक शक्ति संतुलन पर चर्चा होगी और दोनों साम्राज्यवादी शक्तियां आपसी टकरावों को टालने और प्रतिद्वन्द्विता व सहयोग करने पर चर्चा करेंगी। चीनी राष्ट्रपति का यह अमरीकी दौरा शंघाई सहकार संगठन और ब्रिक्स की शीर्ष बैठकों के बाद हो रहा है। वे इन संगठनों की ताकत और अपनी आर्थिक व राजनीतिक-सामरिक ताकत के बल पर अमरीकी राष्ट्रपति से मौजूदा दुनिया की स्थिति पर चर्चा करेंगे। स्वाभाविक है कि इसमें ईरान की मौजूदा स्थिति पर भी चर्चा होगी। 
    
आज की दुनिया में व्यापक बदलाव हो रहे हैं। अमरीकी साम्राज्यवादियों के एकछत्र प्रभुत्व वाली दुनिया बदल रही है। एकतरफ, अमरीकी साम्राज्यवादियों के प्रतिद्वन्द्वी के रूप में चीनी और रूसी साम्राजयवादी आ चुके हैं। अमरीकी साम्राज्यवादियों के एक समय के घनिष्ठ साझीदार यूरोपीय साम्राज्यवादियों के साथ उनके सम्बन्धों में दरार आ चुकी है। दूसरी तरफ, कई मध्यवर्ती क्षेत्रीय शक्तियां अस्तित्व में हैं। वे इस साम्राज्यवादी वर्चस्व वाली दुनिया में अपना हिस्सा सुनिश्चित करना चाहती हैं और वे किसी साम्राज्यवादी ताकत की पिछलग्गू नहीं रहना चाहतीं। और तीसरी तरफ, ऐसे देशों की बड़ी संख्या है जो इस या उस साम्राज्यवादी ताकत के दबाव में है। वे इन दबावों से मुक्त होना चाहते हैं। 
    
ये सभी तरह के देश पूंजीवादी देश हैं। इन सभी जगहों पर शोषक पूंजीपति वर्ग सत्ता में है जो सभी मजदूर-मेहनतकश आबादी का दुश्मन है। इनमें साम्राज्यवादी देश दुनिया पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहते हैं। वे गरीब देशों को लूटने के मामले में एकमत हैं लेकिन लूट के बंटवारे के बारे में उनके अंदर फूट और टकराव है। ये राष्ट्रवाद के नारे से अपने देश की मजदूर-मेहनतकश अवाम को धोखा देते रहते हैं और अपनी साम्राज्यवादी लूट में उनकी सहमति हासिल करने की कोशिश करते हैं। दूसरी तरफ, देशों की बड़ी संख्या ऐसी है जो साम्राज्यवादी लूट का शिकार है, इन देशों के शासक एक तरफ, साम्राज्यवादियों के साथ सांठ-गांठ करते हैं, उनके साथ सौदेबाजी करके अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिशें करते हैं और अपने देश की व्यापक मजदूर-मेहनतकश आबादी को राष्ट्रवाद के नारे के इर्द-गिर्द एक हद तक का साम्राज्यवाद विरोध प्रदर्शित कर उन्हें अपने समर्थन में खड़ा करते हैं। ये अन्य देशों के साथ टकराव में व्यापक मजदूर-मेहनतकश आबादी को युद्ध मशीन के चारे के तौर पर इस्तेमाल करते हैं। ये इस देशभक्ति के नाम पर व्यापक मजदूर-मेहनतकश आबादी को अपने पक्ष में खड़ा कर ले जाते हैं।
    
आज साम्राज्यवादी देशों की कूटनीतिक पैंतरेबाजी अपनी लूट को और प्रभाव क्षेत्रों को बढ़ाने की कोशिश की है। बाकी गरीब देशों और साम्राज्यवादी लूट व दमन के शिकार देशों के शासकों की कोशिश इस लूट में अपना हिस्सा बढ़ाने और सौदेबाजी की ताकत को बढ़ाने की है। 
    
मजदूर-मेहनतकश आबादी की मुक्ति का सवाल इन देशों के शोषक वर्गों के विरुद्ध विजयी संघर्ष से ही हल होगा। शासक वर्गों की कूटनीतिक चालों और इनके युद्ध को इसी नजरिए से देखना चाहिए। 

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