भारत में पढ़े-लिखे युवाओं में बेकारी की समस्या विस्फोटक स्तर तक बढ़ चुकी है। छात्रों-युवाओं की रोजगार को लेकर बेचैनी लगातार बढ़ती जा रही है। इस बेचैनी का एक नमूना बीते दिनों दिखाई दिया। बिहार पुलिस मद्य निषेध विभाग की भर्ती परीक्षा के लिए सैकड़ों युवा पाटलिपुत्र स्टेशन पर पहुंचे थे। पर यहां ट्रेनों के काफी देर से आने के चलते परीक्षा के लिए देरी का शिकार हुए युवाओं का गुस्सा स्टेशन पर फूट पड़ा। छात्रों ने ट्रेन में जमकर तोड़फोड़ की। ट्रेन पर पत्थर बरसाये। यहां तक कि छात्रों को समझाने आये रेल आई जी व कई अन्य पुलिसकर्मी भी छात्रों के आक्रोश से बच नहीं पाये और घायल हो गये। ट्रेन लेट होने के चलते परीक्षा छूटने पर परीक्षार्थियों ने रेलवे ट्रैक जाम कर दिया और वे परीक्षा रद्द करने की मांग करने लगे।
पुलिस के अनुसार 200-250 छात्र पाटलिपुत्र स्टेशन पर ट्रेन पकड़ने आये थे। जब छात्र हिंसक हो उठे तो पुलिस ने बल प्रयोग कर उन्हें तितर-बितर कर दिया।
उपरोक्त घटना सुनने में एक सामान्य घटना प्रतीत हो सकती है पर यह बेकारी का दंश झेल रहे युवाओं के बढ़ते गुस्से को दिखाने को पर्याप्त है। ट्रेन लेट होने से परीक्षा छूटने ने बेहतर रोजगार की आस पाले इन युवाओं की आशाओं को एक झटके में ध्वस्त कर दिया। रेल अधिकारी अगर युवाओं में बढ़ते आक्रोश के प्रति सचेत होते तो विशेष ट्रेन संचालित कर इस घटना से बच सकते थे। पर रेल अधिकारी भला कब से छात्रों-युवाओं के गुस्से की परवाह करने लगे। छात्रों को शांत करने आये आई जी वर्दी के रौब में छात्रों को शांत करने के नाम पर धमकाने लगे। इससे छात्रों का गुस्सा और बढ़़ गया व वह तोड़-फोड़ में बदल गया।
रटी-रटायी स्क्रिप्ट की तरह पुलिस इस घटना में अराजक लम्पट तत्वों का हाथ होने की कहानी गढ़ हिंसक छात्रों पर मुकदमे दर्ज कर उनके दमन में जुट गयी है। सैकड़ों छात्रों पर गम्भीर धाराओं में मुकदमा दर्ज हो चुका है।
इस घटना में न तो रेलवे अपनी चूक मानने को तैयार है और न ही आई जी व अन्य रेल पुलिसकर्मी। सबको गलती छात्रों-युवाओं की नजर आ रही है। ये प्रशासनिक अधिकारी ये नहीं देख पाते कि छात्र सालों-साल किसी नौकरी की तैयारी करते हैं। बड़े इंतजार के बाद नौकरी की भर्ती की अधिसूचना निकलती है और जब सुन्दर भविष्य का सपना लिए छात्र ट्रेन पकड़नेे जाते हैं तो ट्रेन के लेट होने पर यदि उनकी परीक्षा छूट जाये या परीक्षा का पेपर लीक हो जाये तो छात्रों का गुस्से से भर जाना स्वाभाविक ही है। और जब अधिकारीगण उनकी समस्याओं के हल के बजाय उन्हें धमकाने लगे जायें तो युवाओं का गुस्सा और बढ़ना तय है। इस पर भी जब मुकदमे दर्ज कर उनका दमन राजसत्ता करने लगे तो मामला और गंभीर हो जाता है।
यह दिखाता है कि सरकारें-प्रशासन-पुलिस सब बेकारी की मार झेल रहे युवाओं के दर्द से कोई सरोकार नहीं रखते। वे छात्रों के आक्रोश को डण्डे से कुचलना चाहते हैं। उनकी यह हरकत देश को उस दिशा में ले जा रही है जहां किसी दिन छात्रों-युवाओं का गुस्सा विस्फोटक रूप ग्रहण कर राजसत्ता के जालिम हुक्मरानों का इंसाफ नेपाल की तरह अपने हाथों करने लगेगा।