इजरायली नरसंहार विरोधी अमेरिकी छात्रों पर कार्यवाही

/ijarayali-narasanhar-virodhi-ameriki-students-par-action

भारतीय नागरिक कोलंबिया विश्वविद्यालय में अर्बन प्लानिंग में पीएचडी कर रही रंजनी श्रीनिवासन कैंपस में फिलिस्तीन के समर्थन में हुए प्रदर्शनों का समर्थन करने को लेकर अमेरिकी सरकार ने उनका वीज़ा रद्द कर दिया। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़, गृह मंत्रालय ने सुरक्षा कारणों से रंजनी का वीजा 5 मार्च को रद्द कर दिया। जिसके बाद 11 मार्च को उन्होंने स्व-निर्वासन ले लिया।
    
डिपार्टमेंट आफ होमलैंड सिक्योरिटी मंत्री क्रिस्टी नोएम ने रंजनी के सूटकेस लेकर निकलते हुए एक वीडियो क्लिप को एक्स पर पोस्ट किया है। उन्होंने लिखा, ‘‘संयुक्त राज्य अमेरिका में रहने और पढ़ाई करने के लिए वीजा देना एक खास अधिकार की बात है। जब आप हिंसा और आतंकवाद की वकालत करते हैं, तो उस विशेषाधिकार को रद्द कर दिया जाना चाहिए और आपको इस देश में नहीं रहना चाहिए।’’
    
बताते चलें कि गाजा में इजराइल व अमेरिकी साम्राज्यवादियों के नरसंहार के खिलाफ बीते साल अप्रैल में विश्वविद्यालय के छात्रों ने हैमिल्टन हाल कैंपस में तंबू गाड़ लिए थे। छात्र विश्वविद्यालय में ही रहने लगे थे। इसने उस समय एक बार नये सिरे से फिलिस्तीन के नागरिकों-महिलाओं-बच्चों पर किये जा रहे भीषण दमन को सामने ला दिया था। और दुनिया के अलग-अलग विश्वविद्यालयों व कोनों में अमेरिका इस युद्ध से बाहर आये और गाजा में नरसंहार तुरंत रोका जाए, इसकी मांग जोर पकड़ने लगी थी।
    
कोलंबिया विश्वविद्यालय अधिकारियों के कहने के बाद पुलिस ने दर्जनों लोगों को गिरफ्तार किया था। हालांकि, इनमें से किसी के खिलाफ आपराधिक मामला उस समय दर्ज नहीं किया गया था।
    
विश्वविद्यालय प्रशासन की हालिया कार्रवाई महमूद खलील के हिरासत में लिए जाने के बाद सामने आई है। सीरिया में पैदा हुए खलील कोलंबिया से ग्रेजुएट हैं, उन्हें लुसियाना में कोर्ट में सुनवाई के बाद हिरासत में ले लिया गया था। खलील के मामले ने कालेज-कैंपस में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अमेरिका के स्थाई नागरिकों के निर्वासन की अनुमति देने वाली कानूनी प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े किए हैं। अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय ने बीते साल कैंपस में फिलिस्तीन के समर्थन में हुए प्रदर्शनों में भाग लेने वाले छात्रों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की है। कैंपस में बीते साल हैमिल्टन हाल पर प्रदर्शन करने के अभियान में शामिल रहे कुछ छात्रों को विश्वविद्यालय ने या तो निलंबित कर दिया है या उन्हें निकाल दिया है।
    
अमेरिका के वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खलील समेत फिलिस्तीन समर्थक लोगों पर लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि वो हमास का समर्थन करते हैं। राष्ट्रपति बार-बार कहते रहे हैं कि प्रदर्शनकारियों को देश से निकाला जाना चाहिए। ट्रंप चेतावनी दे चुके हैं कि वो उन स्कूलों और विश्वविद्यालयों की फंडिंग छीन लेंगे जो ‘अवैध प्रदर्शनों’ की अनुमति देगा। 
    
ट्रंप प्रशासन ने कोलंबिया विश्वविद्यालय की 40 करोड़ डालर की फंडिंग यह कहते हुए रोक दी है कि वो कैंपस में यहूदी विरोधी भावना से लड़ने में नाकाम रहा है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने एक बयान जारी कर कहा था कि यूनिवर्सिटी के ज्यूडिशियल बोर्ड (यूजेबी) ने छात्रों के खिलाफ प्रतिबंध लगाए हैं। इनमें ‘कई सालों तक निलंबन से लेकर, अस्थाई तौर पर डिग्री रद्द करना और निष्कासन’ शामिल है।
    
अमेरिकी सरकार, इजरायल व अन्य साम्राज्यवादियों के द्वारा फिलिस्तीन मुक्ति संघर्ष का दमन वर्षों से जारी है। और आज गाजा पर भीषण बमबारी और नरसंहार में निर्दोष बच्चे-महिलाएं-नागरिक मारे जा रहे हैं। इस नरसंहार से किसी भी न्यायप्रिय मूल्यों वाले इंसान को दुख ही होगा। इसी का विरोध रंजनी सहित तमाम छात्र कोलंबिया विश्वविद्यालय में कर रहे थे। छात्रों का यह दमन फिलिस्तीन के मुक्ति संघर्ष को नहीं रोक पायेगा। रंजनी सहित इन छात्रों के संघर्षों को सलाम है जिन्होंने अमेरिकी शासकों के ठीक सामने उनके कुकर्मों को दुनिया के सामने रखा। अमेरिकी शासक अपने हितों के लिए इस युद्ध को बनाये हुये हैं। निश्चित तौर पर एक दिन जनता इनको इनके कुकर्मों की सजा अवश्य देगी।

आलेख

/amerika-ka-iran-par-operation-d-day-hatasha-ka-parinam

अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

/education-and-emplyoment-dasha-aur-durdasha

भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

/cocoroach-saradar-and-samajvadi-janataantrik-morcha

उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

/titali-effect-kuch-itihaas-se-kucha-vartaman-mein

तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

/sadho-thagawa-nagariya-lootal-ho

वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?