कृत्रिम बुद्धिमत्ता और वास्तविक दुनिया

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इस वक्त भारत सहित पूरी दुनिया में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का शोर मचा हुआ है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इण्टेलीजेंस) पर चर्चा आम फैशन का हिस्सा बन चुकी है। जो भी अपने को आधुनिक दिखलाना चाहता है वह कृत्रिम बुद्धिमत्ता के मानव जाति पर पड़ने वाले प्रभाव की चर्चा करता है। अकादमिक क्षेत्रों में, ‘ग्लोबल वार्मिंग’ पर फैशनेबल चर्चा अब बीते जमाने की बात बनने की ओर बढ़ रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता से कौन-कौन से पेशे अतीत की वस्तु बन जायेंगे यह चर्चा व्यापक चिंता व उद्विग्नता (बेचैनी) को जन्म दे रही है। कई लोग सशंकित हैं तो कई लोग आतंकित हैं। और इसे बढ़ाने में पूंजीवादी मीडिया की भी एक बड़ी भूमिका है। वैसे भी उन्हें इस काम में महारत हासिल है। इस रूप में ए आई नई सनसनी है। 
    
यहां कई सवाल (असली-नकली) खड़े किये जा रहे हैं। सबसे बड़ी आशंका व्यक्त की जा रही है कि एक दिन मनुष्य द्वारा निर्मित मशीन (ए आई) मनुष्यों पर राज करने लगेगी। मनुष्य ए आई के गुलाम बन जायेंगे। वैज्ञानिक काल्पनिक किस्सों (फिक्शन) में तो यह बातें काफी लम्बे समय से की जाती रही हैं परन्तु इसे अब एक वास्तविक खतरे के रूप में पेश किया जा रहा है। क्या ऐसा संभव है? नहीं, बिल्कुल भी नहीं! 
    
ऐसा तब ही संभव हो सकता है जब ऐसी दुनिया की कल्पना कर ली जाये जहां आज के समाज के अंतरविरोध यकायक गायब हो जायें। कोई ए आई का मालिक न रह जाये। ए आई एक ऐसी शक्ति बन जाये जिसके अपने ही विशेष हित हों। कपोल किस्सों में मनोरंजन के लिए ये बातें ठीक हो सकती हैं परन्तु वास्तविक दुनिया में ए आई के विभिन्न प्रचलित रूपों का कोई जन्मदाता, विकास करने वाला, नियंत्रक और उससे बढ़कर उसके जरिये बेहिसाब मुनाफा कमाने वाला उसका मालिक सशरीर इस धरती पर मौजूद है।
    
मसलन, भारत में इस वक्त सबसे ज्यादा चर्चा का विषय बने ‘‘ग्रोक’’ का मालिक एलन मस्क है। और एलन मस्क दुनिया के सबसे अमीर आदमियों में भी सबसे अमीर है। और उसे अमेरिकी सत्ता का संरक्षण प्राप्त है। और अब तो वह स्वयं अमेरिकी सरकार का हिस्सा है। उसकी दौलत व ताकत ट्रम्प के सत्ता में काबिज होने के बाद दिन दूनी रात चौगुनी की गति से बढ़ रही है। 
    
ऐसे ही हर ए आई का कोई न कोई मालिक है। उसका जन्मदाता और नियंत्रक है। और वे लोग कौन हैं जो इस सच के ऊपर पर्दा डालकर ए आई की चर्चा मानो ऐसे करते हैं कि इस पूंजीवादी व्यवस्था में निजी मालिकाना खत्म हो गया हो। निजी सम्पत्ति का विनाश हो गया हो। और निजी सम्पत्ति की रक्षा में लगा पूंजीवादी राज्य गायब हो गया हो। मालिक और नौकर का फर्क खत्म हो गया हो। एकाधिकार की प्रवृत्ति खत्म हो गयी हो। साम्राज्यवादी देश खत्म हो गये हों। और उनके बीच हर वक्त चलने वाली होड़ व झगड़े खत्म हो गये हों। अमेरिकी, चीनी, जापानी, जर्मन, ब्रिटिश, रूसी साम्राज्यवाद ने रामनामी चादर ओढ़ ली हो। यानी जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर चर्चा होती है या की जाती है तो वास्तविक दुनिया से मुंह मोड़ लिया जाता है। 
    
इस वक्त जितने भी ए आई उपकरण मौजूद हैं उनका मालिकाना या तो अमेरिकी या चीनी साम्राज्यवादी देश के व्यक्तियों या सत्ता के पास है। और जो साम्राज्यवादी इस होड़ में पिछड़ गये हैं, वे किसी भी तरह से इसमें शामिल होकर बराबरी करना चाहते हैं। जर्मन, जापानी, रूसी आदि की तो क्या बात की जाए भारत जैसा तकनीक व पूंजी के मामले में पराश्रित देश भी अपने ए आई माडल के लिए बेताब हैं। यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता का क्षेत्र भी, इस दुनिया के हर भौगोलिक, प्राकृतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक मनोरंजन आदि क्षेत्रों की तरह साम्राज्यवादी, पूंजीवादी देशों और उनके द्वारा पोषित-संरक्षित एकाधिकारी घरानों के बीच गहरी होड़ व झगड़े का क्षेत्र है। यहां भी वही गलाकाटू प्रतियोगिता व दूसरे को मात देने व नष्ट करने का झगड़ा मौजूद है जो कि इस दुनिया में हर जगह मौजूद है। और ये ए आई माडल किन मामलों में ‘‘ज्ञान’’ देंगे और किन मामलों में ‘‘मौन’’ साध लेंगे यह सब कुछ इनके मालिकों की इच्छा पर निर्भर है। कतई उनके नियंत्रण में है। 
    
इस तरह से देखें तो वैसे हमारी आज की दुनिया में  कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) एक बहुत बड़ी वैज्ञानिक तकनीकी उपलब्धि है। और अगर कृत्रिम बुद्धिमत्ता का विकास ‘कृत्रिम सामान्य बुद्धिमत्ता’ (आर्टिफिशियल जनरल इण्टेलीजेंस - एजीआई) के स्तर पर हो जाता है तो यह और भी बड़ी बात होगी। यानी ‘एजीआई’ माडल मनुष्यों की तरह चिंतन प्रणाली का एक प्रतिरूप होगा। ‘ए जी आई’ विभिन्न विषयों व चीजों में सह संबंध स्थापित कर तुरन्त निष्कर्ष पर पहुंच जायेगा। ‘ए जी आई’ अभी तो बहुत दूर की कौढ़ी है। परन्तु इसके किसी माडल के कुछ वर्षों में आने की एक संभावना तो मौजूद है ही। और जब ऐसा होगा तब भी वैसा ही होगा जैसा ए आई के समय हो रहा है। साम्राज्यवादी देशों और एकाधिकारी घरानों में एक और तीखी होड़ और दुनिया में अपना वर्चस्व कायम करने के लिए इसका इस्तेमाल करने के लिए किसी भी हद तक जाना। जैसा किसी जमाने में परमाणु हथियारों के मामले में हुआ था वहीं ए आई या ए जी आई के मामले में होगा। किसी एक साम्राज्यवादी देश का उसका पहले आविष्कार करना, फिर उसके सबसे नजदीकी प्रतिद्वन्द्वी का भी उसका आविष्कार कर लेना और फिर एक के बाद एक अन्य देशों का इन परमाणु हथियारों की तकनीक हासिल या विकसित करना। और फिर ऐसे दर्जन से ज्यादा देशों का सामने आना जो परमाणु हथियारों से लैस हो गये। ओर कई इसे हासिल करना चाहते हैं। 
    
परमाणु हथियार विकसित होने से पहले दुनिया दो विश्वयुद्ध झेल चुकी थी। करोड़ों लोग इन युद्धों में मारे गये थे। और जब परमाणु हथियार खोज लिये गये तब भी साम्राज्यवादी देशों के द्वारा थोपे गये युद्ध और हमलों का नाश न हुआ और न हो सकता था। जितने लोग इन विश्व युद्धों में मारे गये थे उससे कम लोग दूसरे विश्व युद्ध के बाद थोपे गये युद्धों और हमलों में नहीं मारे गये हैं। इसका मतलब क्या है? जो भी तकनीक आ जाये या वैज्ञानिक उपलब्धि हासिल हो जाये वह इन नर पिशाचों के हाथ में रहेगी तो वही करेंगे, जो आज तक ये करते आये हैं। मुनाफे के लिए कुछ भी करना और किसी हद तक जाना। और इसके लिए विनाशकारी युद्ध या हमले करना हो तो वह भी करना। मजदूरों-मेहनतकशों के जीवन को बार-बार संकट में डालना। 
    
गौर से देखा जाये तो मानव ज्ञान के तीन अहम स्रोत रहे हैं। जिन्हें- ‘‘उत्पादन, वर्ग संघर्ष और वैज्ञानिक प्रयोग’’- जैसे तीन क्षेत्रों में बांटा जाता रहा है। वास्तविक दुनिया में उत्पादन (यानी कृषि, उद्योग से लेकर वैज्ञानिक उपकरण) का विशाल क्षेत्र और मानव जाति के भरण-पोषण, रहन-सहन आदि को किन्हीं कृत्रिम बुद्धिमत्ता से लैस रोबोटिक उपकरणों से प्रतिस्थापित करना शेखचिल्लीपना है। और फिर कोई तो होगा जो इन मशीनों का निर्माण व उपयोग करेगा। और जहां तक वर्ग संघर्ष के क्षेत्र की बात है वहां असल झगड़ा मनुष्यों के बीच है। एक ओर पूंजीपति है तो दूसरी ओर मजदूर, किसान और अन्य मेहनतकश हैं। साम्राज्यवादी देशों के आपसी झगड़े हैं तो ये देश तीसरी दुनिया के देशों का शोषण-दोहन करते हैं। यानी मनुष्यों की अति विशाल बहुसंख्या शोषित-उत्पीड़ि़त है। और रही बात विज्ञान और वैज्ञानिक प्रयोगों की तो ये आज एकाधिकारी पूंजी के सेवक बने हुए हैं।
    
कृत्रिम बुद्धिमत्ता वास्तविक दुनिया में शोषण-उत्पीड़न, होड़-संघर्ष, युद्ध और हमलों को मिटा नहीं सकती है। वास्तविक दुनिया को बदलने के लिए मजदूरों-मेहनतकशों, शोषितों-उत्पीड़ितों को ही आगे आना होगा। अपने संघर्षों को ऐसी धार देनी होगी कि वास्तव में दुनिया बदल सके।  

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