अल्बानिया में जेरेड कुशनर द्वारा जमीन कब्जाने का विरोध

Published
Tue, 06/16/2026 - 08:50
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अल्बानिया बाल्कन का एक छोटा सा देश है। यहां पर भी, जब पूर्वी यूरोप के देशों की संशोधनवादी सत्ताओं का पतन हुआ, उसी समय केे आस-पास छुट्टा पूंजीवाद आ गया। तब से अल्बानिया में पूंजीवादी हुकूमतें कायम हैं। यहां की हुकूमत न सिर्फ पूंजीवादी है बल्कि अमरीकी साम्राज्यवाद की पिट्ठू और इजरायली यहूदी नस्लवादी हुकूमत की कट्टर समर्थक है। पिछले चार बार से लगातार चुने गये प्रधानमंत्री एडीरामा हैं। एडीरामा की सरकार ने ट्रम्प की बेटी इवान्का ट्रम्प और उसके दामाद जेरेड कुशनर को अमीरों की मौजमस्ती के लिए एक टापू दे दिया है। इसका विरोध अल्बानिया की जनता सड़कों पर आकर कर रही है। 
    
जेरेड कुशनर और इवान्का ट्रम्प ने अल्बानिया के समुद्र तटीय क्षेत्र और साजान द्वीप को वहां के प्रधानमंत्री एडीरामा से लेकर वहां पर एक बड़ा रिजार्ट बनाने की योजना शुरू की। ज्वेर्नेक नामक जगह को कंटीले तारों से घेर दिया गया और उस जमीन का समतलीकरण करना शुरू कर दिया। ज्वेर्नेक के बाशिंदों को जब यह पता चला तो वे विरोध प्रदर्शन करने के लिए आगे आये। कुशनर के सुरक्षा गार्ड प्रदर्शनकारियों को घसीटकर अपने यहां ले गये। अल्बानिया की पुलिस मूकदर्शक बन देखती रही। किसी ने प्रदर्शनकारी को घसीटते हुए ले जाने की वीडियो सोशल मीडिया में डाल दी। इसके बाद राजधानी तिराना सहित समूचे देश में विरोध प्रदर्शनों का तांता लग गया। ये विरोध प्रदर्शन अभी भी जारी हैं। 
    
यह टापू पेलिकन पक्षियों, कछुआ प्रजनन केन्द्रों और दुर्लभ यूरोपीय गुलाबी राजहंसों का घर है। इस क्षेत्र को 2023 में वन्य नदी राष्ट्रीय उद्यान घोषित कर दिया गया था। ट्रम्प जब 2024 में दुबारा राष्ट्रपति चुने गये तो उनके दामाद जेरेड कुशनर ने संरक्षित क्षेत्र और अल्बानिया के सबसे बड़े साजान द्वीप पर विलासितापूर्ण सम्पत्ति परियोजनाओं के माध्यम से हजारों धनी पर्यटकों के लिए योजना की शुरूवात की। प्रधानमंत्री रामा ने कुशनर से जुड़ी एक विकास कम्पनी को ‘रणनीतिक निवेशक’ का दर्जा देकर इस परियोजना का उत्साहपूर्वक स्वागत किया। इसका अर्थ यह था कि अल्बानिया की सरकार निर्माण और बुनियादी ढांचे की लागत वहन करेगी और ‘रणनीतिक निवेशक’ कम्पनी को टैक्स से छूट देगी। 
    
दरअसल, ये ‘रणनीतिक निवेशक’ अल्बानियाई कानून से ऊपर हो गये हैं। अल्बानिया की सरकार बेशर्मी से इनकी मदद कर रही है। रामा की सरकार और इसकी पूर्ववर्ती सरकारें भी भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी रही हैं। इसे न तो अल्बानिया के लोगों के हितांे की परवाह है और न ही पर्यावरणीय खतरे की चिंता है। पारदर्शिता का नितांत अभाव है। चूंकि यह अमरीकी साम्राज्यवाद की पिट्ठ सरकार है, इसलिए लोगों के वास्तविक मुद्दोें से ध्यान भटकाने के लिए यह मौजूदा विरोध प्रदर्शनों को विदेशी साजिश का हिस्सा घोषित करती है। इसे पहले ग्रीस की साजिश करार दिया गया। और अब यह इसे ईरान की साजिश करार दे रही है। 
    
लगातार बढ़ते जा रहे विरोध प्रदर्शनों की खासियत यह है कि इसमें विरोधी बड़ी पार्टी की कोई भूमिका नहीं है। ये दोनों पार्टियां- मौजूदा प्रधानमंत्री रामा की तथाकथित समाजवादी पार्टी और विरोधी डेमोक्रेटिक पार्टी- धनिक अल्पतंत्र की पार्टियां रही हैं। इन्हें अपने संसाधनों को विदेशी साम्राज्यवादियों के हाथों गिरवी रखने में कोई गुरेज नहीं है। अल्बानिया साम्राज्यवादी फौजी गुट नाटो का सदस्य हो गया है और 2030 तक यह यूरोपीय संघ में शामिल होने की उम्मीद कर रहा है। हालांकि पड़ोसी देश सर्बिया के साथ इसके रिश्ते खराब हैं। लेकिन सर्बिया के शासक और अल्बानिया के शासक दोनों यहूदी नस्लवादी इजरायल के साथ अच्छे रिश्ते रखते हैं। सर्बिया में भी जेरेड कुशनर ने ऐसी ही एक परियोजना शुरू की थी। लेकिन सर्बिया में व्यापक विरोध प्रदर्शनों के बाद उसने इस परियोजना से हाथ खींच लिया था। लेकिन सर्बियाई शासक व्यूसिक की सत्ता बरकरार बनी रही। 
    
इसी प्रकार, अल्बानिया के प्रधानमंत्री एडीरामा सोचते हैं कि उनकी सत्ता बनी रहेगी। हालांकि विरोध प्रदर्शन दिनों-दिन बढ़ता जा रहा है। अब प्रदर्शनकारियों की मांग प्रधानमंत्री रामा के इस्तीफे की बन चुकी है। लोग इन विरोध प्रदर्शनों को ‘फ्लेमिंगों क्रांति’ की संज्ञा दे रहे हैं। फ्लेमिंगों वही गुलाबी राजहंस है जिनके पुतले लेकर लोग सड़कों पर नारे लगा रहे हैं ‘‘रामा इस्तीफा दो’’ और ‘‘इवान्का वापस जाओ’’। ये नारे विरोध प्रदर्शनों का प्रतीक बन गये हैं। लोगों के नारों में ‘‘अल्बानिया बिक्री के लिए नहीं है’’, एक प्रमुख नारा बन गया है। इन विरोध प्रदर्शनों में छात्रों-नौजवानों, मजदूरों, पर्यावरणविदों और बुद्धिजीवियों की भारी संख्या शामिल हो रही है।
    
चूंकि प्रधानमंत्री एडीरामा की सरकार इजरायल समर्थक सरकार है, इसलिए इजरायल द्वारा गाजापट्टी में किये गये नरसंहार और व्यापक विनाश पर चुप्पी साधकर और वहां की समस्याओं के लिए एकमात्र हमास को वह जिम्मेदार ठहरा रही है। यह हमास को नेस्तनाबूद करने की इजरायली-अमरीकी योजनाओं की समर्थक है और इजरायल की तरफ से यह वहां अपनी फौज भेजने के लिए तत्पर है। यह ट्रम्प द्वारा प्रस्तावित गाजा शांति योजना की भागीदार बनी हुयी है। 
    
प्रधानमंत्री एडीरामा ने 2026 में ही इजरायल का दौरा किया था। वहां जाकर उसने इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू की चापलूसी भरी प्रशंसा की। पिछले एक साल में, अल्बानिया ने इजरायली सैन्य कम्पनियों, जिनमें एल्बिट सिस्टम्स भी शामिल है, के साथ ड्रोन, मोर्टार और तोपखाना प्रणालियों के लिए एक नया लाखों-करोड़ों डालर का हथियार सौदा किया है। तिराना में चालीस इजरायली कम्पनियों को आमंत्रित करते हुए एक तकनीकी और साइबर सुरक्षा शिखर सम्मेलन की मेजबानी की है, और इजरायल को ईंधन की आपूर्ति करने वाले एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता के रूप में इसे चिन्हित किया गया है। इजरायल-अल्बानियाई समझौता, एक कृषि समझौता ज्ञापन पर उस समय हस्ताक्षर किये गये जब यह विरोध प्रदर्शन भड़क गया था। यहां यह भी ध्यान में रखना उल्लेखनीय है कि एक छोटे से ईरान की सत्ता के विरोधी गुट को अल्बानिया में पाला-पोषा जा रहा है। इसका नाम मुजाहिदीन ए-खल्क (एम.ई.के.) है। 
    
यह सब चर्चा करने का आशय यह है कि जेरेड कुशनर की ‘विकास परियोजना’ में सीधे इजरायली निवेश का संकेत देने के बजाय, ये सम्बन्ध एक व्यापक रणनीतिक गठबंधन की ओर इशारा करते हैं- विशेष रूप से कुशनर की खुद की भागीदारी को देखते हुए। कुशनर की निवेश फर्म एफिनिटी पार्टनर्स की स्थापना उसके ससुर ट्रम्प द्वारा कराये गये अब्राहम समझौते के अनुरूप, इजरायल और अरब जगत के बीच निवेश सम्बन्धों को बढ़ावा देने के लिए की गयी थी। कुशनर सीरियाई मूल के कतरी अरबपति अल-खय्यात बंधुओं से अल्बानियाई विकास के लिए निवेश प्राप्त करने का प्रयास कर रहा है। हालांकि अल-खय्यात बंधुओं की अपनी अल्बानियाई निवेश कम्पनी से सम्बन्धित धनराशि को जून के दूसरे सप्ताह में अस्थाई तौर पर रोक दिया गया है। 
    
चूंकि कई बाल्कन देशों में ट्रम्प और उसके दामाद के आर्थिक हित जुड़े हुए हैं, इसलिए अल्बानिया में भी इसके विरोध के बावजूद कुशनर की योजना आगे बढ़ाने के लिए एडीरामा की सरकार कटिबद्ध है। 
    
अल्बानिया जो एक समय दुनिया को बेहतर बनाने के सपने देखता था और उसके लिए प्रयासरत था, आज वह प्रतिक्रियावादियों का गढ़ बन चुका है। वह अमरीकी साम्राज्यवादियों और यहूदी नस्लवादी इजरायली शासकों का समर्थक ही नहीं बल्कि चाटुकार बन चुका है। 
    
इन विरोध प्रदर्शनों का चूंकि कोई व्यापक सामाजिक-आर्थिक कार्यक्रम नहीं है, इसलिए इस ढीले-ढाले गठबंधन से किसी व्यापक परिवर्तन की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। पूंजीवादी दायरे में सिमटना इसकी नियति है। हां, वस्तुगत तौर पर इससे परिवर्तनकारी शक्तियों को बल मिल सकता है। 

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