अमरीकी साम्राज्यवादी युद्ध के मैदान में ईरान को झुका नहीं पाये। वे कूटनीति में ईरान को पराजित नहीं कर सके। वे अपना कोई भी घोषित लक्ष्य अभी तक नहीं हासिल कर सके। 28 फरवरी को अमरीका-इजरायल द्वारा ईरान पर थोपे गये युद्ध के 6 महीने हो चुके हैं। अब वे ईरान को आर्थिक तौर पर अलग-थलग करने की नयी मुहिम शुरू कर रहे हैं। इसको वे आपरेशन डी-डे (Operation D-day) घोषित कर रहे हैं। इसके जरिये अमरीकी वित्त सचिव ब्रेसेन्ट ने घोषणा की है कि ईरान के तेल-गैस को जो भी देश उससे खरीदेगा, उससे वित्तीय लेन-देन करेगा, उसके साथ किसी भी किस्म का व्यापार करेगा या उसके साथ जहाजों का पारगमन करेगा तो ऐसे सभी देशों पर अमरीका प्रतिबंध लगायेगा। वह ईरान के साथ व्यापार करने वाली कम्पनियों, व्यक्तियों पर भी प्रतिबंध लगायेगा। अमरीका ऐसे देशों को डालर की लेन-देन प्रणाली, स्विफ्ट प्रणाली से वंचित कर देगा। वे इसे ईरान को आर्थिक तौर पर तबाह करने के मकसद से लागू करने की घोषणा कर रहे हैं। उनकी यह सोच है कि इससे वे ईरान को आत्म-समर्पण करने के लिए मजबूर कर देंगे और अपनी शर्तों पर ईरान को होरमुज जल डमरूमध्य को खोलने के लिए मजबूर कर देंगे।
ईरानी शासकों ने होरमुज जल डमरूमध्य को अपने नियंत्रण में ले रखा है। उनका यह स्पष्ट कहना है कि होरमुज जल डमरूमध्य उसके कानूनी अधिकार क्षेत्र में आता है। इसका दूसरा किनारा ओमान का कानूनी क्षेत्र है। इसके प्रबंधन की जिम्मेदारी ईरान और ओमान की है। ईरान और ओमान, दोनों देश इस सम्बन्ध में समझौता कर रहे हैं। दोनों देशों ने मिलकर यह घोषणा की है कि होरमुज जल डमरूमध्य से जहाजों के पारगमन के प्रबंधन की जिम्मेदारी इन दोनों देशों की है और इसमें किसी तीसरे देश की कोई भूमिका नहीं है। इससे अमरीकी साम्राज्यवादी और ज्यादा बौखला गये हैं। ट्रम्प अब ओमान पर बमबारी करने की धमकी दे रहे हैं। ट्रम्प बीच-बीच में यह घोषणा करते रहते हैं कि होरमुज जल डमरूमध्य अमरीका का क्षेत्र है। वे इसकी घेराबंदी अपने विशालकाय जंगी जहाजों के जरिये किये हुए हैं। अब अमरीकी एयरक्राफ्ट कैरियर जंगी जहाज यू.एस.एस. अब्राहम लिंकन की यह हालत हो गयी है कि उसमें तैनात नाविकों और मैरीनों की लम्बे समय से तैनाती की वजह से उनके भोजन और साफ-सफाई की व्यवस्था चरमरा गयी है। एक नाविक ने तो इससे कूद कर जान भी दे दी है। इससे नाविकों और मैरीनों के भीतर असंतोष और गुस्सा व्याप्त होने के कारण अमरीकी साम्राज्यवादियों को यू.एस.एस. अब्राहम लिंकन जहाज को वापस ले जाना पड़ा है। और उसके स्थान पर एक दूसरे एयरक्राफ्ट कैरियर को यहां तैनात करना पड़ा है। इस दूसरे एयरक्राफ्ट कैरियर को एशिया-प्रशांत क्षेत्र से लाकर यहां तैनात किया गया है।
जहां एक तरफ, अमरीकी युद्ध विमान (पेंटागन) यह चिंता जाहिर कर चुका है कि अमरीका अपनी आधुनिक हवाई रक्षा प्रणालियों, रडार प्रणाली और आधुनिक हथियारों का भण्डार काफी हद तक ईरान के साथ युद्ध में खर्च कर चुका है, उनमें कमी आ गयी है, वहीं दूसरी तरफ व्यापक अमरीकी मजदूर-मेहनतकश आबादी को बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी का सामना करना पड़ रहा है। खुद अमरीकी शासकों का एक बड़े हिस्से में विरोध हो रहा है कि अमरीका का ईरान युद्ध उसका अपना युद्ध नहीं है। अमरीका यह युद्ध इजरायल के लिए लड़ रहा है। इस युद्ध के चलते ट्रम्प का ‘अमरीका को फिर से महान बनाओ’ (MAGA) का आधार कमजोर पड़ रहा है। अमरीकी शासक इस युद्ध से बाहर निकलने के लिए बेचैन हैं। लेकिन ट्रम्प विजय की भावना या दिखावे के साथ इस युद्ध से बाहर निकलना चाहते हैं। ट्रम्प को जल्दी है कि वह मध्यावधि चुनावों के पहले इस युद्ध से बाहर आ जाये।
अभी तक पश्चिम एशिया में ईरान ही एकमात्र देश रहा है, जो 1979 से अमरीकी साम्राज्यवादियों को चुनौती देता रहा है। अमरीकी साम्राज्यवादी 1979 को ‘इस्लामी क्रांति’ के जरिये अपने को चुनौती देने वाले ईरान को कभी स्वीकार नहीं कर सके थे। वे तब से अब तक लगातार ईरान में सत्ता परिवर्तन की कोशिश करते रहे हैं। पहले उन्होंने सद्दाम हुसैन के इराक को उकसाकर ईरान को आठ साला युद्ध में घसीटा। इसके बाद उन्होंने ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाये। यह सिलसिला अब ईरान के ऊपर युद्ध थोपने तक जा पहुंचा। इस युद्ध में ईरान की भारी तबाही के बावजूद, ईरान ने अपनी मिसाइलों और ड्रोनों के जरिये इस क्षेत्र में मौजूद अमरीकी फौजी अड्डों को अपने हमलों का निशाना बनाया। उन्हें बड़े पैमाने पर क्षतिग्रस्त किया। हालत यहां तक पहुंच गयी कि कई अड्डों और अमरीकी सैनिकों को अन्य दूरस्थ इलाकों में तैनात करना पड़ा।
अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना। उसने दक्षिणी लेबनान में हमले जारी रखे। जबकि समझौते के तहत लेबनान में भी युद्ध विराम लागू होना था। इसे लागू कराने की जिम्मेदारी अमरीका की थी। अमरीकी साम्राज्यवादियों द्वारा समझौते के उल्लंघन के बाद ईरान ने होरमुज जल डमरूमध्य को फिर से बंद कर दिया।
इधर खाड़ी के देशों के भीतर मौजूद अमरीकी अड्डों पर जब ईरानी हमले होने लगे, तब खाड़ी के देशों ने यह महसूस करना शुरू किया कि अमरीकी फौजी अड्डे उनकी हिफाजत नहीं कर रहे हैं, तब उन्होंने अपनी सुरक्षा के लिए अमरीकी छाते से बाहर आकर वैकल्पिक रास्ते की तलाश करना शुरू कर दिया। पहले साउदी अरब ने पाकिस्तान के साथ एक सुरक्षा संधि की। फिर तुर्की, साउदी अरब और पाकिस्तान ने मिलकर एक सुरक्षा गठबंधन बनाया। इसमें कहा गया कि यह गठबंधन ऐसा सुरक्षा समझौता है जिसके तहत यदि किसी एक देश पर हमला होता है तो उसे सभी पर हमला माना जायेगा। यह सुरक्षा समझौता इलाकाई ताकतों का था। इसमें बाद में इस क्षेत्र के और देशों को जोड़़ने की बात कही गयी।
अभी हाल में, ईरान को भी इस सुरक्षा समझौते में शामिल करने की कोशिश हुई। कहा जाता है कि ईरान इस सुरक्षा गठबंधन में तभी शामिल होगा, जब इसके नीति निर्धारण में शुरू से ईरान की भागीदारी हो। यदि ईरान इसमें शामिल हो जाता है तो यह इजरायल और अमेरिका के लिए एक नया सिरदर्द होगा। क्योंकि इजरायल यह घोषणा करता रहा है कि ईरान के बाद तुुर्की उसके हमले का अगला निशाना होगा। सीरिया में इजरायल और तुर्की के बीच प्रभाव के लिए अलग संघर्ष चल रहा है।
इस प्रकार, हम यह देख सकते हैं कि लम्बे समय तक अमरीकी साम्राज्यवादियों के प्रभाव के नीचे रहने वाले खाड़ी देश अब अपने इलाके का एक स्वतंत्र सुरक्षा तंत्र विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन अमरीकी साम्राज्यवादी इस क्षेत्र में अपने प्रभाव को बनाये रखने की पूरी कोशिश में लगे हुए हैं। इसके लिए वे एक तरफ ईरान को झुकाने के लिए इसे आर्थिक तौर पर बर्बाद करने की कोशिश कर रहे हैं और दूसरी तरफ, वे फिर से पाकिस्तान की मदद से नया समझौता करने की कोशिश कर रहे हैं। अभी हाल ही में पाकिस्तान के सेना प्रमुख और रक्षा मंत्री की ईरान की यात्रा का मकसद यह था कि ईरान को फिर से समझौते की मेज पर लाया जाये। कहा जाता है कि ईरान के शासकों ने पाकिस्तान के वार्ताकारों को यह स्पष्ट कर दिया कि जब तक अमरीका पुराने समझौता ज्ञापन की शर्तों को लागू नहीं करता, तब तक नयी समझौता वार्ता में शामिल होने का सवाल ही नहीं उठता। पाकिस्तानी सेना प्रमुख ने कहा कि समझौता ज्ञापन के 60 दिन पूरे होने के बाद वह समाप्त हो गया है, इसलिए नयी समझौता वार्ता फिर से शुरू की जानी चाहिए। ईरान ने अपनी अवस्थिति स्पष्ट कर दी कि पहले अमरीका पुराना समझौता लागू करे तभी वार्ता या अप्रत्यक्ष वार्ता आगे बढ़ेगी।
ट्रम्प की सत्ता दोनों चालें एक साथ चल रही है। एक तरफ ‘आपरेशन डी-डे’ के जरिये यह ईरान को आर्थिक तौर पर तबाह करना चाहती है। उसे दुनिया के देशों के साथ व्यापार करने से रोकना चाहती है। दूसरी तरफ, वह ईरान के साथ समझौता वार्ता करना चाहती है।
ईरान ने भी यह स्पष्ट कर दिया है कि यदि कोई देश उसे अलग-थलग करने की अमरीकी कोशिशों में मददगार बनता है तो वह भी ईरान के विरुद्ध युद्ध में भागीदार माना जायेगा। ईरान ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि उसके तेल-गैस की बिक्री नहीं होगी तो इस क्षेत्र से किसी भी देश के तेल और गैस की बिक्री नहीं हो सकेगी। अभी तो होरमुज जल डमरूमध्य बंद है इसके बाद बाब-अल-मंदेब भी बंद होगा और लालसागर का रास्ता बंद होने से इस क्षेत्र का अधिकांश तेल और गैस ही नहीं पेट्रो रसायन, खाद और अन्य मालों का निर्यात बंद हो जायेगा।
ईरान की इस चेतावनी का असर यह पड़ना शुरू हो गया है कि खाड़ी के देश अमरीकी साम्राज्यवादियों पर यह दबाव डालना शुरू कर चुके हैं कि वे ऐसा कदम न उठायें। ईरान पहले से ही बहुत सारे आर्थिक प्रतिबंधों का सामना कर चुका है। ईरान का कहना है कि यह अमरीकी साम्राज्यवादियों के बस में नहीं है कि वे ईरान के व्यापार की धमनियों को पूरी तरह से रोक सकें। अव्वल तो यह है कि ईरान पहले से ही डालर प्रणाली से अलग अपना व्यापार अलग-अलग देशों से कर रहा है। दूसरे, रूस और चीन ने अमरीकी प्रतिबंधों को एकतरफा और गैर कानूनी बताया है। चीन ईरान के तेल का मुख्य खरीददार है। उसने साफ-साफ कहा है कि वह ईरान के साथ अपना व्यापार जारी रखेगा। उसका ईरान के साथ 25 वर्षीय समझौता है।
इस तरह ईरान को अलग-थलग करने की अमरीकी कोशिशें शुरू से ही असफल होने के लिए अभिशप्त हैं।
इधर सितम्बर महीने में भारत में ब्रिक्स की बैठक होने वाली है। रूस, चीन, भारत के साथ ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका इसके शुरूआती सदस्य हैं। इसमें ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, इण्डोनेशिया जैसे अन्य देश भी शामिल हैं। कुछ देश पर्यवेक्षक के बतौर भी हैं। इनमें से अधिकांशतः डालर प्रणाली से बाहर अपना आपसी व्यापार करते हैं। डालर की जगह एक वैकल्पिक मुद्रा प्रणाली विकसित करने की बात लम्बे समय से चली आ रही है। अभी तो यह दूर की बात लगती है। लेकिन इन देशों का आपसी व्यापार इनकी आपसी मुद्राओं में होना बढ़ता जा रहा है। यह तंत्र अमेरिका द्वारा आर्थिक तौर पर ईरान की बांहें मरोड़़ने से रोकने में मददगार होगा।
आज स्थिति यह है कि अमरीकी साम्राज्यवाद का विश्वव्यापी प्रभुत्व कमजोर हो रहा है। वे दिन लद चुके हैं जब दुनिया में एकछत्र महाशक्ति अमरीका था। शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद मोटे तौर पर 2015-16 तक एकछत्र अमरीकी प्रभुत्व का काल था। इसके बाद, चीनी साम्राज्यवाद के उभार और रूस के फिर से खड़़ा होने के बाद अब अमरीकी साम्राज्यवाद को चुनौती देने वाली ताकतें खड़ी हो गयी हैं। यूक्रेन में अमरीकी और यूरोपीय साम्राज्यवादी तमाम कोशिशों के बावजूद रूस से पराजित होने की कगार पर हैं। एशिया-प्रशांत क्षेत्र में चीनी साम्राज्यवादियों की बढ़त हासिल हो रही है। अफ्रीका में फ्रांसीसी साम्राज्यवादियों का स्थान रूसी साम्राज्यवादी ले रहे हैं और चीन के साथ अधिकांश अफ्रीकी देशों के सम्बन्ध गहरे हो रहे हैं। वहां भी अमरीकी साम्राज्यवादियों को चुनौती मिल रही है। लातिन अमरीकी देशों में जहां अमरीकी साम्राज्यवादियों की पैठ ज्यादा गहरी है, वहां भी चीनी साम्राज्यवादियों का प्रभाव बढ़ रहा है।
ऐसी बदलती दुनिया में अमरीकी साम्राज्यवादी अपने एकछत्र प्रभुत्व को बचाये रखने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन परिवर्तन की इस धारा को रोका नहीं जा सकता। यह सही है कि अभी भी अमरीका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, उसकी सेना सबसे आधुनिक और बड़ी है। अन्य तकनीकी क्षेत्र में कई मामलों में वह अग्रणी है। लेकिन दुनिया भर में उसके करीब 900 फौजी अड्डे हैं। वह अपनी ताकत से ज्यादा अपने को फैलाये हुए है। उसके ऊपर 400 खरब डालर का कर्ज है।
अतीत के युद्धों ने इसकी मजदूर-मेहनतकश आबादी को तबाह किया है। यदि ईरान का यह युद्ध चलता रहा तो खुद अमरीका के अंदर व्यापक जन असंतोष भड़क उठेगा। यदि इसे रणकौशलात्मक आणविक युद्ध की ओर ले जाया गया तो खुद अमरीकी साम्राज्यवाद की तबाही भी बढ़ेगी। क्योंकि आणविक हथियार सिर्फ अमरीका या उसके समर्थकों के पास ही नहीं हैं।
ईरान के साथ इस क्षेत्र में प्रतिरोध की शक्तियां हैं जो इस समूचे पश्चिम एशिया में मौजूद हैं और सभी फिलिस्तीन की आजादी की लड़ाई की समर्थक हैं। यह ईरान की बड़ी ताकत है। इसी न्यायपूर्ण संघर्ष के समर्थन की वजह से भी उसको विश्वव्यापी समर्थन प्राप्त है।
अमरीकी साम्राज्यवादियों के सामने एक रास्ता यह है कि वह चुपचाप अपने को इस युद्ध से अलग कर लें। नहीं तो दूसरा रास्ता इस ईरान युद्ध के विस्तार का है जो इसके पराभव को और तेज करेगा।