हल्द्वानी/ विभिन्न राजनीतिक-सामाजिक संगठनों ने सिटी मजिस्ट्रेट कार्यालय के माध्यम से उत्तराखण्ड राज्य के मुख्यमंत्री को बनभूलपुरा की जनता के आवास की रक्षा के लिए माननीय उच्चतम न्यायालय में राज्य सरकार द्वारा जनहित में पक्ष रखे जाने की मांग करते हुए दशकों से बसी आबादी को हटाने की हर कोशिश बंद करने, नजूल भूमि पर बसी हुई आबादी को मालिकाना अधिकार दिए जाने की मांग की गई। यह भी मांग उठाई गई कि किसी अपरिहार्य स्थिति में विस्थापन होना जरूरी हो तो बिना शर्त बनभूलपुरा के प्रभावित सभी परिवारों को बाजार भाव पर उनकी सम्पत्तियों का मुआवजा देते हुए उनके संपूर्ण पुनर्वास की जिम्मेदारी राज्य सरकार ले। साथ ही एक ज्ञापन पत्र उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को भी भेजा गया जिसमें हजारों मेहनतकशों के नागरिक अधिकार और आजादी से भी पहले की बसासत के पहलुओं और मानवीय आधार का संज्ञान लेने और पूरे प्रकरण में राज्य सरकार की साम्प्रदायिक भूमिका के विरुद्ध राज्य सरकार को संवैधानिक दायित्वों के निर्वहन करने का निर्देश देने की मांग की गई।
ज्ञापन में बनभूलपुरा बनाम रेलवे मामले में जनता के आवास के अधिकार के पक्ष पोषण और न्याय के लिए विचारणीय बिंदुओं को उठाया गयाः
1. बनभूलपुरा में रहने वाली आबादी हल्द्वानी काठगोदाम नगर निगम के अंतर्गत आती है। अतः राज्य सरकार की स्वामित्व वाली भूमि पर बाकी शहर की तरह ही बनभूलपुरा का भी फैसला किया जाना चाहिए। सभी नजूल भूमिवासियों को मालिकाना अधिकार दिया जाये।
2. बनभूलपुरा के 5365 परिवारों का मामला कभी भी रेलवे ने स्वयं स्टेशन विस्तार के लिए प्रस्तुत नहीं किया। अभी तक भी रेलवे की स्टेशन विस्तार की कोई ठोस योजना प्रस्तुत नहीं है जबकि भूमि पर रेलवे के स्वामित्व के कोई दस्तावेज नहीं हैं। साथ ही राज्य सरकार की भी भूमि अब स्पष्ट है। इसे दो पक्षों के निजी संपत्ति विवाद के स्थान पर जनता के आवास का अधिकार बनाम राज्य के तौर पर लिए जाने की जरूरत है। जनता के दशकों से काबिज होने को प्रधानता दी जानी चाहिए।
3. उक्त मामले में राज्य सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में तलब किये जाने पर सर्वे कर अपनी भूमि चिन्हित की। जबकि ब्रिटिश काल से स्थापित प्राथमिक विद्यालय, माध्यमिक विद्यालय, दो इंटर कालेजों के अलावा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, वाटर हेड टैंक, आदि को राज्य सरकार यहां संचालित करती है। इससे पहले 2017 से 2022 तक राज्य सरकार ने कहीं भी अपने स्वामित्व को नहीं स्वीकारा। इस पूरे मामले में राज्य सरकार उदासीन बनी रही है। जबकि राज्य को अपने नागरिकों के पक्ष में मजबूती से खड़ा होना चाहिए था। ऐसा न करना राज्य सरकार की मंशा पर सवाल खड़ा करता है।
4. राज्य सरकार ने 2018 में मलिन बस्तियों को संरक्षित करते हुए एक अध्यादेश जारी किया था, जो विस्तार के साथ आज भी लागू है। बनभूलपुरा की मलिन बस्तियां भी इसमें संरक्षित थीं। लेकिन राज्य सरकार ने इस बिंदु से भी अपने नागरिकों व उनके घर-परिवारों का पक्ष नहीं रखा। ये बिंदु राज्य सरकार की मंशा पर प्रश्न खड़े करते हैं।
5. उक्त बनभूलपुरा बस्ती का प्रभावित हिस्सा अल्पसंख्यक मुसलमान बहुल है। जिस कारण मुख्यमंत्री समेत राज्य के अन्य जिम्मेदार मंत्री, विधायक तक साम्प्रदायिक बयानबाजी करते रहे हैं। यह भाजपा की राजनीति का प्रमुख मुद्दा बना हुआ है। लेकिन भारत का संविधान किसी भी राज्य सरकार को धार्मिक आधार पर भेदभाव करने की इजाजत नहीं देता है। अतः राज्य सरकार को अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन करना चाहिए।
6. रेलवे द्वारा योजना प्रस्तावित न होने के बावजूद यदि माना जाए कि रेलवे विस्तार की जरूरत है तब भी हमें अपने देश की उन्नत निर्माण तकनीक पर भरोसा करना चाहिए। उन्नत निर्माण क्षमता से हजारों लोगों को प्रभावित किये बिना पूर्व में गौला नदी के ऊपर या वनभूमि पर रेलवे स्टेशन का विस्तार संभव है। अतः लोगों को उनके आवास और आजीविका से उजाड़ने या विस्थापित करने से संरक्षित किया जा सकता है।
7. यह गौर किया जाए कि बनभूलपुरा के हजारों प्रभावित लोग मेहनतकश हैं। इनमें से अधिकांश के पास अन्य कहीं भू-मालिकाना नहीं है। यह मिस्त्री, पेंटर, बढ़ई, मैकेनिक, ढुलाई मजदूर, आदि अंतरिम आदेश में दिए गए प्रधानमंत्री आवास व म्ॅै में पात्र नहीं होंगे। अतः विस्थापन की संभावित किसी भी स्थिति में किसी नई पात्रता के बजाय सभी प्रभावितों को पात्र माना जाए और बनभूलपुरा के प्रभावित सभी परिवारों को बाजार भाव पर उनकी सम्पत्तियों का मुआवजा देते हुए संपूर्ण पुनर्वास की जिम्मेदारी राज्य सरकार ले।
ज्ञापन देने वालों में क्रांतिकारी लोक अधिकार संगठन, पछास, एक्टू, भाकपा (माले) आदि संगठनों के प्रतिनिधि शामिल थे।
-हल्द्वानी संवाददाता