चले थे दुबे बनने बन गये छब्बे

Published
Sun, 08/16/2026 - 15:50
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भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में अनर्गल डींगे हांकने वाली संघी मशीनरी इतने खुशनुमा दावे करती रहती है कि जनता तो क्या पूंजीपति वर्ग भी उन पर भरोसा करने से इंकार करता रहा है। बीते कुछ वर्षों में भारत के जापान, ब्रिटेन को पछाड़ दुनिया की चैथी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के दावे व प्रचार काफी जोर-शोर से किये गये थे। और साथ ही जर्मनी को पछाड़ शीघ्र ही तीसरी व कुछ सालों बाद दूसरी अर्थव्यवस्था बनने का ख्वाब दिखाया जा रहा था। 
    
पर बीते दिनों संसद में भारत सरकार को स्वीकारना पड़ा कि भारत दरअसल 2025-26 में चैथी से गिरकर छठी अर्थव्यवस्था बन गया है। कि जापान, ब्रिटेन ने फिर से भारत को पछाड़ दिया है। 
    
सितम्बर 2022 में दावा किया गया था कि भारत ब्रिटेन को पछाड़ दुनिया की 5वीं बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। इसी तरह 30 दिसम्बर 25 को सरकार ने घोषित किया था कि भारत का सकल घरेलू उत्पाद 4180 अरब डालर के साथ जापान से आगे निकल गया है और भारत दुनिया की चैथी बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है।
    
पर 2025-26 की आई एफ एफ की वल्र्ड इकानामिक आउटलुक रिपोर्ट के हवाले से राज्यसभा में वित्त राज्यमंत्री पंकज चैधरी ने राज्यसभा में बताया कि भारत 3920 अरब डालर के साथ  दुनिया की छठी बड़ी अर्थव्यवस्था है। आई एम एफ अमेरिकी डालर विनिमय दरों के आधार पर मापी गयी नामिनल सकल घरेलू उत्पाद के आधार पर ये आंकड़े जारी करता है।    
    
बीते दिनों डालर के सापेक्ष रुपये की गिरती के साथ भारत की औद्योगिक व कृषि क्षेत्र की विकास दर में कुछ खास सुधार न होने ने इस स्थिति में पहुंचाया। भारत की यह छठी हैसियत भी तब है जब भारत सरकार पर आंकड़े बढ़ा-चढ़ा कर पेश करने का आरोप लगता रहा है और मोदी सरकार वास्तविक उत्पादन-वितरण सुधारने के बजाय खुशनुमा अंाकड़े पेश करने व प्रचार में जुटी रही है। 
    
भारतीय अर्थव्यवस्था का संकट तरह-तरह से अपने को अभिव्यक्त कर रहा है। बीते दिनों बेकारी की मार झेल रहे जेन जी नौजवानों का जंतर-मंतर संघर्ष इसी अर्थव्यवस्था के संकट को दिखा रहा था कि अर्थव्यवस्था नये रोजगार सृजित करने में एकदम असफल साबित हो रही है। इसी वर्ष आई टी सेक्टर की ढेरों कम्पनियों द्वारा की गयी छंटनी व बेहद कम कैम्पस सलेक्शन ने दिखाया कि संकट की मार से सेवा क्षेत्र भी अछूता नहीं है। वर्ष 2025-26 के शुरूआती 9 माह में आई टी सेक्टर ने महज 17 नई नौकरियां सृजित कीं।
    
कृषि क्षेत्र पहले से ही संकट का शिकार है। इस वर्ष जापान द्वारा भारतीय आम व चीन द्वारा भारतीय चावल की खरीद से इंकार ने किसानों के संकट को और बढ़ाया ही है। ऊपर से मोदी सरकार भारत-अमेरिकी डील में किसानों के हितों को दांव पर लगा किसानों के जख्मों पर नमक डाल रही है। 
    
पहले नोटबंदी ने व फिर जी एस टी ने लघु उद्यमों की कमर तोड़ दी व लाखों मजदूरों को सड़कों पर ला दिया। 
    
इतने सारे संकेतकों के बावजूद मोदी सरकार खुशनुमा प्रचार कर प्रचार को ही जनता को हकीकत मानने को प्रेरित कर रही है। अच्छी बात यही है कि विकास के इस हल्ले को अब ज्यादातर जनता सुनना व मानना दोनों बंद कर रही है। 

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