एक अफवाह से सार्थक वार्तालाप

Published
Sun, 03/01/2026 - 07:01
/ek-afawah-se-saarthak-vartaalaap

सोशल मीडिया पर एक अफवाह उड़ी कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने महिलाओं के पहनावे को लेकर एक बयान दिया है। कि जो भी महिला या वयस्क लड़की फुहड़ कपड़े पहन कर घूमेगी उनका अकाउंट बंद कर देना चाहिए।
    
एक साथी सहकर्मी जो अक्सर ही हम लोगों से मिलते हैं एक दिन सुबह जब उनसे मुलाकात हुई तो सहकर्मी बोले कि आपने एक बयान सुना राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने यह बयान दिया है।
    
मैं बोला नहीं ऐसा बयान तो नहीं दिया होगा क्योंकि अगर दिया होता तो अभी तक काफी हंगामा हो चुका होता।
    
वह बोला हो सकता है फेक न्यूज ही हो, पर बात तो ठीक है, जो भी अधनंगे कपड़े पहन कर घूमे उसे कोई तो दंड होना ही चाहिए।
    
मैं बोला कि बात ‘जो भी’ की नहीं है। सभी लोग एक समान नहीं हैं जो बात एक के लिए सही है वही बात दूसरे के लिए गलत भी हो सकती है।
    
जैसे इसी बात को देख लीजिए। मालिक कहेगा कि मैं इन लोगों को काम दे रहा हूं इनका घर-बार चलता है इससे और यह काम चोरी करते हैं। हम मजदूर कहेंगे कि हमारी कमाई से ही सब की तनख्वाह निकलती है हमारी तनख्वाह निकलती है और मालिकों की धन-दौलत बढ़ती है। वह एक फैक्टरी से दूसरी फैक्टरी का मालिक बनता चला जाता है, ऐश करता है और हम अपने लिए एक छोटा सा घर भी नहीं बना पाते हैं।
    
वह बोला ऊर्फी जावेद को देखो वह कैसे उल्टे-सीधे कपड़े पहन कर घूमती है। अगर ऐसा कुछ कानून बन जाएगा तो वह तो लाइन पर आ जाएगी।
    
मैं बोला अगर ऐसा कोई कानून बन भी जाएगा तो वह उस ऊर्फी जावेद का कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा बल्कि होगा उल्टा ही हमारे-तुम्हारे घर की महिलाएं बच्चियां, मजदूर-मेहनतकश महिलाएं, दलित आदिवासी महिलाएं, गरीब छात्राएं इन सब की आफत खड़ी हो जाएगी। परंपरागत कपड़ों (जैसे साड़ी-सूट) की जगह सामान्य कपड़े पहनने में ही, मंत्री-विधायक यह कहने में जरा भी शर्म नहीं करते हैं कि लड़कियां जींस-टॉप में घूमती हैं इसलिए उनका बलात्कार होता है।
    
वह बोला क्या आप यह कहना चाहते हैं कि हमारे घर की लड़कियां भी ऊर्फी जावेद जैसे कपड़े पहन कर घूमें। उनको इतनी आजादी दे दी जाए।
    
वैसे तो असली सवाल यही है कि महिलाओं को आजादी देनी चाहिए या आजादी उनका हक है। उनको आजाद ही रहना चाहिए। जैसे पुरुष आजाद रहते हैं। जब हम तुम पुरुष लोग किसी सलमान खान, शाहरुख खान, रितिक रोशन व टाइगर श्राफ को देखकर नहीं बिगड़ते हैं, लाइन पर रहते हैं तो क्या महिलाओं के अंदर इतना दिमाग या इतना धैर्य या इतनी समझ नहीं है कि वह ऊर्फी जावेद जैसों को देखकर बिगड़ जाएंगी, पुरुषों को किसने आजादी दी, जो महिलाओं को आजादी दी जाए। मर्द आबादी, पुरुष आबादी के लिए कोई कानून है कि वह अर्ध नंगे या नंगे घूमेंगे तो उनको यह फलां-फलां सजा दी जाएगी, तो फिर महिलाओं के लिए क्यों? जिस नैतिकता के तहत अधिकांश पुरुष आबादी ऐसा नहीं करती है इसी नैतिकता के तहत महिलाएं भी ऐसा नहीं करती हैं। परंतु पुरुष आबादी को हमेशा से ऐसा क्यों लगता रहा है कि अगर हम उनको कंट्रोल में नहीं रखेंगे तो वह हमारे हाथ से निकल जाएंगी बिगड़ जाएंगी।    -दीपक, फरीदाबाद

आलेख

/peace-bond-vishesh-karyakari-majistrate-v-shakti-prathakkaran-siddhant

शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त यह मत प्रस्तावित करता है कि लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए जरूरी है कि कार्यपालिका-विधायिका व न्यायपालिका परस्पर स्वतंत्र हों। अगर कार्यपालिका किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करना चाहे तो न्यायपालिका उसे रोक दे। फ्रांसीसी दार्शनिक मांतेस्क्यू को इस शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त का मूल प्रस्तावक माना जाता है।

/regime-change-or-vyavastha-parivartan

पूंजीवादी जनतंत्रों में चुनाव ‘सेफ्टी बाल्व’ का काम करता है। बदहाल और दुःखी परेशान लोग नयी सरकार को चुन उम्मीद करते हैं कि उनकी जिन्दगी में शायद बेहतरी हो जाये। अमरीका जैसे देश में तो इसी वजह से दोनों प्रमुख पार्टियां बारी-बारी से सत्ता में आती रहती हैं। चुनाव के जरिये सरकारें बदलती रहती हैं और पूंजीवादी व्यवस्था बदस्तूर चलती रहती है। मजदूर-मेहनतकश जनता बेहतरी की मृग मरीचिका में जीती रहती है। 

/janavad-ka-sawal-aur-majdoor-varg

मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

/punjivadi-jantantra-and-chunavi-corruption

अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

/election-aayog-hindu-fascist-and-loktantra

एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।