एक ‘राष्ट्रवादी’ कविता -कल्लोल चक्रवर्ती

हाँ, कोरोना के बाद से दिख नहीं रहा है एक लाचार परिवार
जो हर जाड़े में कम्बल और रजाई के लिए आवाज़ लगाता था
नुक्कड़ में पुराने कपड़े सिलने वाला दर्जी महीनों से नजर नहीं आता
लेकिन सैकड़ों वर्ष पुराने वे धर्मस्थल आज प्राचीन गौरव से दीप्त चमक रहे हैं
हजार और पांच सौ के पुराने नोटों के साथ चलन से बाहर कर दिये गये हैं
आन्दोलन, प्रेस की आजादी और धर्मनिरपेक्षता जैसे जुमले भी.
हाँ, कुछ मुट्ठी भर किसानों ने आवाज़ उठाने की जुर्रत की
क्योंकि उनको पैसा आ रहा था विदेश से
कहा गया कि उनमें से कुछ मर गये
मर तो वे तब भी जाते जब वे घरों में रहते
कहा गया कि उनके लंगर में भोजन मिल रहा था सैकड़ों लोगों को
और हम जो करोड़ों भूखों को भोजन मुहैया करा रहे हैं
उसका क्या!
काम पर लगा दिया गया है मालवीयों, गोस्वामियों, पात्रों, कश्यपों और चौधरियों को
जो कल तक किसी के भी खिलाफ़ कुछ भी लिख-बोल सकते थे
आज वे गूंगे बन चुके हैं
यह कह दिया गया है ऐलानिया कि विरोध में कुछ भी बर्दाश्त नहीं किया जाएगा
देश बदल रहा है, सोच बदल रही है
ऐसे में जो नहीं बदलेंगे वे देश बदल लेने के लिए आजाद हैं
कृपया सुन लें कि पहले की सरकारों की तरह
हम बदले की कार्रवाई नहीं करते.
अब भी अगर आप बुलडोजर को शक्ति का नया प्रतीक मानने से इनकार करते हैं
तो हम क्या कर सकते हैं?
लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इससे बड़ा उदाहरण
और क्या हो सकता है श्रीमान
कि प्रधानमंत्री को हर सुबह गाली देने के बाद भी आप
बिल्कुल सही-सलामत हैं!                   साभार : samalochan.com

आलेख

/janavad-ka-sawal-aur-majdoor-varg

मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

/punjivadi-jantantra-and-chunavi-corruption

अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

/election-aayog-hindu-fascist-and-loktantra

एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।

/uddharak-ideology-ki-talaas

इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

/war-and-diplomacy-uthal-puthal-se-bhari-duniyaa

गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।