चुनाव, चुनाव आयोग और हिंदू फासीवाद

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बिहार में नवंबर माह में विधान सभा के चुनाव होने हैं। इसी बीच जून माह में, यकायक चुनाव आयोग ने बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी ैप्त् आनन-फानन में करवाया। इस पुनरीक्षण के बाद चुनाव आयोग ने 65 लाख मतदाताओं को मतदाता सूची से बाहर कर दिया। वास्तव में मतदाताओं के एक ठीक-ठाक हिस्से को पुनरीक्षण के नाम पर खारिज करने की आशंका थी, ऐसा ही हुआ। जिस तरह से बड़े पैमाने पर बिना फार्म भरे, आधे-अधूरे फार्म, बिना दस्तावेज, दस्तखत के यानी बड़े पैमाने की अनियमितता, मनमानेपन, अराजकता और धोखाधड़ी से मतदाता पुनरीक्षण हुआ उसने चुनावी प्रकिया की पोल खोल कर रख दी है। ऐसा लगने लगा है कि मोदी सरकार अपने मनमाफिक मतदाताओं का चुनाव कर रही है।
    
वास्तव में पिछले 5-6 सालों से चुनाव की प्रकिया पर कई लोगों का संदेह बढ़ने लगा था। भाजपाइयों की जीत को, कई ने ई वी एम का खेल बताया तो कई ने वोट शिफ्टिंग (कोई भी बटन दबने पर वोट कमल को जाना)। ई वी एम के जरिए वोटों की धोखाधड़ी के डेमो भी कुछ ने दिखाए। कई ऐसे भी थे जिन्होंने ‘‘ई वी एम हटाओ देश बचाओ’’ के नारे के साथ ई वी एम के खिलाफ लगातार मुहिम भी चलाई है। जैसे-जैसे राज्य दर राज्य चुनाव आगे बढ़ते गए, चुनाव जीतने के तमाम हथकंडे भी उजागर होते गए। एक तरफ विपक्षी पार्टियों के मतदाताओं का सूची से नाम हटा देना तो दूसरी तरफ खुलेआम दलितों और मुसलमानों को वोट देने से रोकने की कोशिशें संघी सरकार और इसकी पुलिस प्रशासन की ओर से दिखने लगीं। 
    
चुनाव आयोग ने प्रचार से लेकर नियम कानूनों का इस्तेमाल इस तरह से किया कि मोदी, मोदी सरकार और इनकी राज्य सरकारों को फायदा हो खासकर निर्णायक मौकों पर। केदारनाथ की गुफा में मोदी के सिंहासन जाप का तो चुनावी आचार संहिता की धज्जियां उड़ाकर प्रचार हुआ था। इस तरह के उदाहरण भरे पड़े हैं। इसके बाद हरियाणा, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र के चुनावों ने खुद कथित गोदी मीडिया यानी एकाधिकारी पूंजीवादी मीडिया घरानों के एंकरों और खुद भाजपा-संघ के लोगों को भी तब हैरत में डाल दिया कि जहां जमीन पर माहौल भाजपा, मोदी सरकार के बिल्कुल खिलाफ था और चुनावी दिन के सर्वे में भाजपा जीत से बहुत दूर होती थी वहीं बंपर जीत भाजपा को हासिल हुई। यही स्थिति आम चुनाव में बनी थी। आखिरकार लाखों मनपसंद वोटर्स का नाम जुड़वाने और विरोधी वोटर्स का नाम हटा देने का खेल भी धीरे-धीरे सामने आया और अब स्पष्ट हो गया। महाराष्ट्र में 6 माह में 40-45 लाख वोटर्स का बढ़ जाना यूं ही नहीं हुआ।
    
इसलिए विपक्षी पूंजीवादी पार्टियों के इस आरोप से इंकार करना बेहद मुश्किल है कि चुनाव फर्जी तौर-तरीकों और धोखाधड़ी से जबरन जीते गए हैं। कर्नाटक की बंगलुरु सीट की एक विधानसभा का विपक्षी पूंजीवादी पार्टी के नेता राहुल गांधी ने प्रेस कान्फ्रेंस में तथ्यों और सबूतों के साथ 1,00,250 फर्जी मतदाताओं (लगभग 40 हजार फर्जी अमान्य पते वाले, 10 हजार से ज्यादा एक पते वाले, 11 हजार डुप्लीकेट मतदाता, 33 हजार से ज्यादा फार्म 6 का दुरुपयोग और 4 हजार अमान्य तस्वीरों वाले मतदाताओं) के जरिए निर्वाचन आयोग को कठघरे में खड़ा कर दिया।
    
आम तौर पर अपने आलोचकों, विरोधियों को फर्जी मुकदमों में फंसा देने वाली मोदी सरकार और इनका चुनाव आयोग इस मामले में अभी तक बिल्कुल रक्षात्मक है। तथ्यों और सबूतों को काटने के लिए मोदी के मंत्रियों और मुख्य चैनलों ने फर्जी, आधे-अधूरे या तोड़-मरोड़ कर तथ्य पेश किए। चुनाव आयोग ने इस प्रेस कान्फ्रेंस के बाद यकायक अपनी वेबसाइट पर डिजिटल डाटा के फार्मेट को बदल दिया और इमेज फार्मेट में बदल दिया ताकि इसमें से डाउनलोड करना और ढूंढना (सर्च करना) मुश्किल हो जाये।
    
चुनावी पद्धति और सीमित जनवादी अधिकार (आम नागरिकों के लिए) पूंजीवादी लोकतंत्र की बुनियाद है। इसी के दम पर इसे ‘जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए’ का मंत्र दोहराया जाता है। असल में यह शांतिपूर्ण काल में पूंजीपति वर्ग की लोकतंत्र की ओट में छुपी तानाशाही से इतर कुछ भी नहीं है। आर्थिक-राजनीतिक संकटों के काल में इस नकाब को हटाने में शासक पूंजीपति वर्ग को ज्यादा वक्त नहीं लगता। इसका एक रास्ता इंदिरा गांधी के जरिए संवैधानिक तानाशाही थोपे जाने के रूप में दिखा तो दूसरा रास्ता हिंदू फासीवादियों के दौर में फासीवादी तानाशाही की ओर बढ़ने के रूप में सामने आ रहा है। 
    
इसीलिए मौजूदा दौर में पूंजीवादी लोकतंत्र को खत्म करने के जो रास्ते हैं वह पहले से बिल्कुल भिन्न हैं। इसकी कार्यप्रणाली बिल्कुल भिन्न है। 
    
यदि 1975 के आपात काल के दौर को छोड़ दिया जाए तो आम तौर पर ही भारतीय पूंजीवादी जनतंत्र के लिए कोई विशेष संकट खड़ा नहीं हुआ, यह मजे में चलता रहा। मगर 2012-14 तक स्थिति वहां पहुंची कि शासक एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग ने हिंदू फासीवादियों को सत्तासीन करके खुद ही अपने सीमित संकीर्ण जनतंत्र को कमजोर करके फासीवादी तानाशाही की दिशा में कदम बढ़ाये।
    
इसलिए मौजूदा दौर में वो तमाम चीजें दिखीं और दिख रही हैं जो पहले कभी नहीं दिखीं। चुनाव के मामले में भी यही स्थिति बन चुकी है। चुनाव में एक हद तक बूथ कैप्चरिंग, भ्रष्ट आचरण, चुनाव जीतने के लिए दांव-पेंच पहले भी होते थे मगर पूरी चुनावी प्रक्रिया की वैधता पर संकट खड़ा हो जाये या संदेह के घेरे में आ जाये, ऐसा आम तौर पर पहले नहीं हुआ। 
    
पहले, चुनाव आयोग और सरकार के बीच स्पष्टतया एक हद तक की दूरी थी। इसका ये मतलब नहीं कि चुनाव आयोग पर सरकार का नियंत्रण नहीं था। चयन में सत्ताधारी पार्टी का ही वर्चस्व था। बावजूद इसके, स्थिति यह थी कि 1971 के चुनाव में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के रायबरेली से निर्वाचन को हाईकोर्ट ने इस आधार पर रद्द कर दिया कि इंदिरा ने एक सरकारी अधिकारी से अपने चुनाव प्रचार में मदद ली। आज यह सोच से भी परे है।
    
चुनाव आयोग के 1950 में स्थापित होने के बाद से 2023 से पहले तक प्रधानमंत्री और मंत्री परिषद की सलाह पर राष्ट्रपति चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर अपनी मुहर लगाता था। 2023 में, विधि आयोग की चुनाव आयुक्तों की नियुक्तियों के लिए एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चयन प्रक्रिया की सलाह के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि नियुक्ति के लिए एक समिति हो जिसमें प्रधानमंत्री, भारत के मुख्य न्यायाधीश (ब्ीपमि श्रनेजपबम वि प्दकपं . ब्श्रप्) एवं लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल हों।
    
मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को दर किनार करके तुरंत ही कानून में संशोधन करके तीन लोगों की चयन समिति द्वारा चुनाव आयुक्तों को चुनने का प्रावधान बना दिया जिसमें नेता प्रतिपक्ष, प्रधानमंत्री और प्रधानमंत्री द्वारा मनोनीत कैबिनेट मंत्री सदस्य थे। इसमें सत्ता पक्ष का बहुमत है विपक्ष इसमें चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता। चुनाव आयोग को मोदी सरकार द्वारा मनोनीत कहने में कोई दिक्कत नहीं। ई डी, सी बी आई, एन आई ए आदि संस्थाओं की ही तरह निर्वाचन आयोग पर भी हिंदू फासीवादियों का कब्जा हो गया। इसका नतीजा फिर भिन्न रूप में आना ही था।
    
बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण के नाम पर जो हुआ वह सबके सामने है। अवैध प्रवासियों यानी घुसपैठियों के तर्क से शुरू हुआ पुनरीक्षण अब कहीं और पहुंच गया है। निर्वाचन आयोग यह बताने में असफल रहा कि उसके और हिंदू फासीवादियों के हिसाब से कितने कथित घुसपैठिए बिहार में हैं।  चुनाव आयोग कहता है कि 22 लाख लोग मर चुके हैं, 35 लाख माइग्रेट (प्रवास) कर चुके हैं, एक लाख लोगों का पता ही नहीं चल सका और 7 लाख ने दो चुनाव पहचान पत्र बना रखे थे।
    
सुप्रीम कोर्ट की आधार कार्ड, वोटर कार्ड आदि को दस्तावेज के रूप में स्वीकार करने की सलाह को आयोग ने ठेंगा दिखाया। साथ ही इस निर्देश को भी मानने से इंकार कर दिया कि जिन 65 लाख लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं उनकी जानकारी और नाम खारिज करने की वजह; दोनों ही याचिकाकर्ताओं और संबंधित पार्टियों को दी जाये। आयोग ने कहा कि वह इसे बताने को बाध्य नहीं है। निष्पक्ष और शांतिपूर्ण चुनाव करवाना निर्वाचन आयोग का दायित्व था मगर यह मोदी सरकार के एजेंट की ही तरह काम कर रहा है।
    
चुनाव आयोग पर हिंदू फासीवादियों के पूर्ण नियंत्रण और इसे अपने अनुरूप ढालने के प्रयास भांति-भांति से साफ दिखाई देते हैं। कर्नाटक के संबंध में चुनाव आयोग पर जो गंभीर आरोप लगे हैं उसकी जांच पड़ताल करने के बजाय चुनाव आयोग हलफनामा देने की मांग कर रहा है और भाजपाई मंत्री और सरकार चुनाव आयोग के बचाव में पूरी तरह कूद पड़े हैं।
    
चुनाव आयोग पर लगातार सवालिया निशान हैं। बिहार में पुनरीक्षण के बाद कुछ अन्य तथ्य सामने हैं। स्क्राल.इन ने अपने विश्लेषण में पाया कि बिहार में सीमांचल की जिन विधानसभा सीटों पर 2020 में विपक्ष (कांग्रेस, ए एम आई एम, सी पी आई-एम एल) जीता था, वहां गैर-मुस्लिम मतदाताओं का बहिष्कार (मतदाता हटाने) औसतन काफी अधिक रहा है। अररिया में 14.7 प्रतिशत, बैसी में 14.0 प्रतिशत, अमौर में 11.8 प्रतिशत और मनिहारी में 10.9 प्रतिशत गैर-मुस्लिम नाम काटे गए, जबकि बलरामपुर में यह 9.2 प्रतिशत रहा, जो 10 प्रतिशत से थोड़ा कम है लेकिन अन्य कई सीटों से अधिक है। यहां गैर मुस्लिम बड़े अनुपात में मतदाता सूची से हटाए गए हैं। यह अनुपात दिखाता है कि विपक्षी कब्जे वाली सीटों पर गैर-मुस्लिम वोटरों की कटौती बीजेपी वाली सीटों की तुलना में कहीं ज्यादा हुई है। इससे स्वाभाविक निष्कर्ष निकलता है कि यहां विपक्ष की पूंजीवादी पार्टियों को नुकसान की संभावना होगी।
    
विपक्ष चुनाव आयोग पर मोदी सरकार से सांठ-गांठ करने और 2024 के आम चुनाव में मोदी सरकार बनवाने के आरोप लगा रहा है और चुनाव आयोग के खिलाफ सड़कों पर प्रदर्शन करने के साथ ही संसद में आवाज उठा रहा है। हिंदू फासीवादी गैंग इस सबको तवज्जो दिए बगैर इस तरह आगे बढ़ने का दिखावा कर रहे हैं मानो उन्हें इस सबसे कोई फर्क ही नहीं पड़ता।
    
हिंदू फासीवादियों ने आंकड़ों, सबूतों  को गायब करने की अपनी कला का हर जगह प्रदर्शन किया है जैसे बेरोजगारी, भुखमरी, आत्महत्या, अर्थव्यवस्था आदि के। उसी तरह चुनाव के मामले भी इंतजाम किए गए हैं। चुनाव आयोग इसमें शामिल रहा है। इसके कई उदाहरण हैं।
    
सुप्रीम कोर्ट में जब कुछ लोगों और ए डी आर ने याचिकाओं में वीवीपैट मशीन से निकलने वाली पर्चियों और ई वी एम के वोटों की 100 फीसदी मिलान करवाए जाने की मांग की तो इसे खारिज कर दिया गया। चुनाव आयोग और सरकार द्वारा अत्यधिक समय लगने, तकनीकी समस्या आदि कुतर्क कोर्ट में पेश किए गए। इस आधार पर कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने इसे सीमित करके किसी विधान सभा या संसदीय सीट के 5 प्रतिशत मतों पर अनियमित ढंग से लागू करने का फैसला दिया। साथ ही यह कहा कि 45 दिन तक सिंगल लोडिंग यूनिट (वी वी पी टी का हिस्सा) को भी सीलबंद लिफाफे में रखा जाये ताकि किसी उम्मीदवार द्वारा धांधली के आरोप लगने पर जांच की जा सके। हालांकि अब शिकायत करने वाले (अपने सीट पर धांधली के मामले में) उम्मीदवार को हफ्ते भर के भीतर शिकायत दर्ज करनी थी तथा जांच का खर्चा खुद ही वहन करना था।
    
इसी तरह दिसंबर 2024 में ‘आचार संहिता नियम, 1961’ में संशोधन कर ‘‘सार्वजनिक निरीक्षण’’ के दायरे से चुनाव और मतदान संबंधी इलेक्ट्रानिक रिकार्ड्स (ब्ब्ज्ट, वेबकास्ट) को बाहर कर दिया गया। यह कदम पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के एक आदेश के बाद उठाया गया, जिसमें चुनाव आयोग को चुनाव संबंधी वीडियो आदि याचिकाकर्ता को उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया था।
    
इसके बाद मई 2025 में चुनाव आयोग ने एक अन्य आदेश जारी कर सभी चुनावी प्रक्रियाओं (मतदान, गिनती, ई वी एम स्टोरेज) के सी सी टी वी फुटेज को परिणाम घोषणा के 45 दिन बाद नष्ट करने का निर्देश दिया। जबकि पहले के नियमों के हिसाब से चुनाव संबंधी फुटेज को साल भर तक सुरक्षित रखने का प्रावधान था। यदि इस दौरान कोई विवाद हो तो जांच पड़ताल कर नतीजे तक पहुंचा जा सके। इसे 45 दिन तक ही सुरक्षित रखने और फिर नष्ट कर देने का सिवाय धांधली, भ्रष्ट आचरण को छुपाने के अन्य कोई मकसद नहीं है। 
    
हिंदू फासीवादियों की सरपरस्ती में की गई ये सारी चीजें चुनावी प्रक्रिया और चुनाव के बढ़ते खोखलेपन को ही उजागर करती हैं। अब ये अपने विरोधी मतदाताओं को भी खारिज करने की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। जनता के बीच होते मोहभंग और असंतोष पर सवार होकर विपक्ष सत्ता पर पहुंच सकता है। इसे रोकने के लिए मोदी सरकार का ये एक ‘शानदार’ तरीका है। इस तरह यह उस ओर बढ़ने की कोशिश या संकेत है जहां चुनाव केवल औपचारिक या फर्जी हो जाएं जिसमें जीत आम तौर पर हिंदू फासीवादियों की ही हो और विपक्ष हाथ मलने के सिवाय और कुछ ना कर पाए।
    
यदि ऐसा ही होता है तब भी हिंदू फासीवादी भले ही सत्ता पर हों लेकिन अपने सामाजिक आधार के बड़े हिस्से को खो चुके होंगे। और तब इस रूप में ये, काफी कमजोर स्थिति में होंगे। तब जन असंतोष और जन आक्रोश बढ़ता हुआ इन्हें सत्ता से बेदखल करने की ओर बढ़ जाएगा। विपक्ष इस पर सवार हो सत्तासीन होने की भरसक कोशिश करेगा। यदि इस बीच क्रांतिकारी मजदूर वर्ग की अगुवाई में व्यापक संघर्ष उठ खड़ा हुआ तो तब यह हिंदू फासीवाद को खत्म करने के साथ ही इसे जन्म देने वाली पूंजीवादी व्यवस्था के खात्मे के साथ ही समाजवाद की स्थापना की ओर बढ़ जाएगा।

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