चुनाव की आड़ में नागरिकता परीक्षण

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बिहार चुनाव में मोदी सरकार अपने फासीवादी एजेंडे को चुनाव आयोग के जरिए आगे बढ़ा रही है। नागरिकता संशोधन कानून के जरिए तीन पड़ोसी देशों के गैर मुसलमानों को भारत की नागरिकता देने का प्रावधान 2019 में किया गया था और फिर नागरिकता परीक्षण हेतु राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) कराने की बात मोदी सरकार ने कही और इसके बाद बड़े स्तर पर देश भर में आंदोलन हुआ तो सरकार पीछे हट गई। मगर अब साम्प्रदायिक नागरिकता कानून के बाद चुनाव के बहाने बिहार में परोक्ष तरीके से नागरिकता परीक्षण कराया जा रहा है।
    
यह चुनाव आयोग विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के नाम पर कर रहा है। इस प्रक्रिया में मतदाताओं को अपनी नागरिकता साबित करने के लिए जन्म प्रमाण पत्र सहित 11 दस्तावेजों में से कोई एक जमा करना जिसमें जन्म की तारीख और जगह का पता लगे, अनिवार्य किया गया है। इसमें आधार कार्ड, वोटर कार्ड, राशन कार्ड, डी एल, पेन कार्ड जैसे आम पहचान दस्तावेज अब नागरिकता के प्रमाण नहीं माने जा रहे हैं। अब बड़ी संख्या में इन 11 दस्तावेजों के नहीं होने के चलते भी बिहार के गरीब, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्गों पर गहरा असर पड़ेगा। हिंदू फासीवादियों के हिसाब से जिनके पास ये 11 दस्तावेज में से कोई नहीं होगा, यदि वे मुसलमान होंगे तो घुसपैठिए और बाकी धर्मों के होंगे तो शरणार्थी माने जायेंगे। हिन्दू फासीवादी सरकार इसे मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाने और चुनावी ध्रुवीकरण का हथियार बना रही है। बिहार चुनाव से पहले इसे लागू कर वे अपने वोट बैंक को भी मजबूत करना चाहते हैं। जाहिर है इसमें सवर्णों का सापेक्षिक तौर पर नागरिकता में अनुपात बढ़ जाएगा क्योंकि उन्हीं के लिए नागरिकता साबित करना आसान होगा।
    
चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि आधार कार्ड, वोटर कार्ड, पैन कार्ड जैसे दस्तावेज नागरिकता साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। इसके बजाय जन्म प्रमाण पत्र, पासपोर्ट, जाति प्रमाण पत्र जैसे 11 दस्तावेजों की मांग की गई है, जो आम जनता के लिए जुटाना मुश्किल होगा।
    
बिहार में अधिकांश ग्रामीण परिवारों के पास जमीन नहीं है, पासपोर्ट रखने वालों की संख्या बहुत कम है, और सरकारी सेवाओं में काम करने वालों की संख्या भी सीमित है। ऐसे में दस्तावेज जुटाना उनके लिए चुनौतीपूर्ण होगा। हाईस्कूल की शिक्षा किये हुए लोगों का प्रतिशत भी 10-12 से ज्यादा नहीं है।
    
नागरिकता साबित करने की जिम्मेदारी सरकार या जांच एजेंसियों के बजाय आम नागरिकों पर डाली गई है कि वे अपनी नागरिकता साबित करें। यदि कोई दस्तावेज नहीं जमा कर पाता, तो उसे विदेशी या घुसपैठिया घोषित किये जाने का खतरा रहेगा।
    
विपक्ष ने इस प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन कोर्ट ने फिलहाल चुनाव आयोग के पक्ष में फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा है कि नागरिकता की पहचान गृह मंत्रालय का काम है, चुनाव आयोग का नहीं। हालांकि यह सुझाव भी दिया कि आधार, वोटर कार्ड और राशन कार्ड पर भी चुनाव आयोग विचार करे। मगर चुनाव आयोग अब बिहार में भारी संख्या में नेपाली, बांग्लादेशी आदि आदि के होने का हवाले देकर एन आर सी के पक्ष में माहौल बना रहा है।
    
वास्तव में, यह प्रक्रिया न्याय की मूल अवधारणा के खिलाफ है क्योंकि नागरिक होना साबित करने का बोझ निर्दोष जनता पर डाला गया है। न्याय की बुनियादी अवधारणा यह है कि आरोप लगाने वाले को अपने आरोप साबित करने होंगे, अन्यथा किसी पर भी आरोप लगाना बेहद आसान होगा और यह उत्पीड़न का औजार बन जाएगा। वास्तव में हिंदू फासीवादियों ने अधिकांश मामलों में अपना न्याय का सिद्धांत यही बना डाला है कि जिस पर आरोप लगाया गया है वह ही अपनी बेगुनाही साबित करे। वे किसी पर भी आरोप लगाते हैं मीडिया ट्रायल शुरू होता है बिना न्यायिक प्रक्रिया के ही जिस पर आरोप लगाया जाता है उसे अपराधी बना दिया जाता है। सालों बाद उसे बिना सबूत के न्यायालय निर्दोष के रूप में रिहा करती है।  
    
इस एजेंडे के देशव्यापी विस्तार की संभावना है। बिहार में इस प्रक्रिया को लागू कर इसे अन्य राज्यों में भी लागू करने की तैयारी है, जिससे पूरे देश में सामाजिक और राजनीतिक तनाव बढ़ सकता है।
    
इस प्रकार, बिहार में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण के जरिए एन आर सी एक ऐसा कदम है जो लोकतांत्रिक अधिकारों और सामाजिक न्याय के लिए गंभीर खतरा बन सकता है इसकी ही ज्यादा संभावना है। इसके जरिए भी हिंदू फासीवादी एकाधिकारी पूंजी के हित में हिंदू फासीवादी राज्य कायम करने की ओर बढ़ रहे हैं।
 

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