गिरता रुपया, गिरता ‘राष्ट्रीय गौरव’

Published
Wed, 04/01/2026 - 15:50
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इन दिनों रुपया गिरता और बस गिरता ही जा रहा है। मार्च के तीसरे हफ्ते में रुपया डालर के मुकाबले 94 के ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंच गया है। मगर अब ‘राष्ट्रीय गौरव’ डालर रुपए के ‘विनिमय दर’ पर निर्भर नहीं करता। हां! कभी यह विनिमय दर पर निर्भर हुआ करता था तब जब हिंदू राष्ट्रवादियों का गौरव गुजरात में ‘गुजरात माडल’ तक सीमित था। अब इसे वित्त मंत्री की जुबान से रुपए का गिरना नहीं बल्कि डालर का ऊंचा हो जाना भी कहा जा सकता है जिसमें हिंदू राष्ट्रवादी सरकार का कोई दोष नहीं। हिंदू राष्ट्रवादियों ने हमें बता दिया है कि रुपये का गिरना अब ‘राष्ट्रीय गौरव’ का पैमाना नहीं है कि यह तो सिर्फ ‘वैश्विक परिस्थितियां’ हैं जिनके चलते यह हो रहा है।
    
हां! 2012-13 के दौर में रुपए की डालर के सापेक्ष गिरावट अवश्य ही ‘राष्ट्रीय गौरव’ का गिरना था। 2014 के आम चुनाव से पहले ‘हिंदू हृदय सम्राट’ के लिए ‘रुपए की गिरावट’ प्रिय विषय हुआ करता था। मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए 2013 में ट्वीट किया थाः ‘‘कांग्रेस और रुपये के बीच होड़ है। कौन नीचे गिरेगा, यही प्रतिस्पर्धा है“। तब डालर 58 रुपए के आस-पास था। आज के पी एम मोदी ने तब कहा था ‘‘भारतीय रुपया अकेले डालर के मुकाबले गिरता जा रहा है? मैंने स्पष्ट कहा है कि यह केवल आर्थिक कारणों से नहीं है, बल्कि दिल्ली से शुरू हुई आपकी भ्रष्ट राजनीति का इसमें बड़ा हाथ है। मैं यह आरोप बहुत गंभीरता से लगा रहा हूं।“
    
हिंदू राष्ट्रवादियों की नजर में रुपए की डालर के सापेक्ष इस गिरावट के लिए मनमोहन सिंह की सरकार ही जिम्मेदार थी इसलिए हमें बताया गया कि नरेंद्र दामोदर दास मोदी इस ‘राष्ट्रीय गौरव’ के गिरावट के अपमान से देश को मुक्ति दिला सकता है और ऐसा ‘महान मोदी’ जादू की छड़ी घुमाकर रुपए को इसकी ऊंची कीमत दिलाकर कर सकते हैं। तब ऐसा एक स्वयंभू आध्यात्मिक गुरू श्री श्री रविशंकर ने 2014 में हमें भाजपा और संघ के नेताओं के साथ भरोसा दिलाते हुए कहा ‘‘अगर मोदी सत्ता में आते हैं तो रुपया 40 रुपये प्रति डालर पर मजबूत हो जाएगा’’। हिंदुत्व के एक धुरंधर नेता वेंकैया नायडू जो मोदी काल में राज्य सभा के उपसभापति बने उन्होंने भी 2013 में कहा ‘‘रुपया गिर रहा है, सरकार भंग करो, तुरंत चुनाव कराओ’’। 
    
मगर 10-12 साल बाद स्थिति उलट गई है। रुपया जो आजादी के बाद डालर के सापेक्ष गिरना शुरू हुआ था गिरता गया खासकर 1990 के आर्थिक सुधार के बाद तो गिरावट की दर बढ़ गई। मोदी काल में तो मात्र 12 सालों में इसने गिरावट की दर में ऐतिहासिक मुकाम हासिल कर लिया। मोदी सरकार के 12 वर्षों में रुपया 35.45 रुपये गिर चुका है। यानी 60.5 प्रतिशत की गिरावट हो चुकी है। अब रूपये की गिरावट मोदी की उम्र से काफी आगे निकल चुकी है। जल्दी ही इसके 100 पहुंचने के अनुमान हैं जो मोदी सरकार की नई उपलब्धि होगी। रुपए की यह गिरावट ही पहले मनमोहन को चिढ़ाती थी अब मोदी को कुढ़ा रही है। भाजपाइयों के पाखंड और झूठ को उजागर कर रही है। कांग्रेस और विपक्ष अब मोदी को उनके रुपए की गिरावट पर जुमलों की याद दिला रहे हैं। 
    
वैसे यह अद्भुत है कि सांस्कृतिक राष्ट्रवादी भाजपा और संघ का ‘राष्ट्रीय गौरव’ रुपए के गिरने-उठने पर निर्भर करता है। संघी एकाधिकारी पूंजी विशेषकर अडाणी-अंबानी की सेवा में आकंठ डूबे हुए हैं और स्वयं भी भाजपा इलेक्टोरल बान्ड से लेकर तमाम तरीके अपनाकर पार्टी की तिजोरियां भर रही है। रुपए की कीमत भले ही अंतर्राष्ट्रीय कारोबार में डालर के सापेक्ष गिर रही हो मगर हिंदू राष्ट्रवादियों के लिए इसकी कीमत इतनी ऊंची है कि ये दिन-रात इसे बटोरने में लगे हुए हैं। कभी खिचड़ी खाकर प्रचार करने वाले कई संघी कार्यकर्ता अब मर्सिडीज में घूम रहे हैं। शाह ने अपने बेटे को दुनिया के सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ट का मुखिया बना डाला है।  
    
जिस तरह पहले रुपया गिरने पर हिंदू राष्ट्रवादी मातम मनाते थे और सत्ताधारी पार्टी को कोसते थे वही काम अब कांग्रेस और अन्य विपक्ष भी कर रहा है। मगर दोनों इसके असली कारण को भी जानते हैं और ये भी जानते हैं दोनों की तू-तू, मैं-मैं के ड्रामे में कौन कमाई कर रहा है और कौन नुकसान में है कि जिस एकाधिकारी पूंजी के लिए दोनों काम कर रहे हैं वह हर स्थिति में फायदे में है। दोनों ही जानते हैं कि आजादी के बाद के कथित समाजवादी माडल में भी इन्होंने जमकर मुनाफा बटोरा है और 1990 के दौर से शुरू निजीकरण-वैश्वीकरण के दौर में भी। 1960 के दशक में जब पहली बार डालर के सापेक्ष रुपए का भारी अवमूल्यन किया गया यानी कीमत गिराई गई तब भी एकाधिकारी पूंजी मालामाल होती गई और आज भी।
    
रुपए की वर्तमान गिरावट अमेरिकी साम्राज्यवादियों और इजरायली विस्तारवादी शासकों द्वारा ईरान की संप्रभुता को रौंदने से तेल और गैस की कीमतों में उछाल है और विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ते आयात बिल के दबाव के साथ निवेशकों का डालर पर भरोसा होने से इसमें बढ़ता निवेश है। रूपये की पूछ ज्यादा कमजोर हो गई है। 
    
1990 से पहले भारत एक हद तक बंद अर्थव्यवस्था था। रुपया स्थिर विनिमय दर से जुड़ा हुआ था। सरकार इसकी कीमत का अपनी जरूरत के अनुरूप अवमूल्यन करती थी। ऐसा आर्थिक संकट और घटते विदेशी मुद्रा भंडार के दौरान सरकार करती थी। यह यकायक होता था। मगर 1990 के दशक में विदेशी पूंजी और मालों की आवाजाही के लिए देशी बाजार को खोल देने के बाद रुपया अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अस्थिर विनिमय दर यानी मुद्रा की मांग और आपूर्ति के हवाले हो गया। तब से इसकी डालर के सापेक्ष कीमत औसतन सालाना 3.5 प्रतिशत की दर से गिरती जा रही है।
    
वैसे आम तौर पर रुपए के गिरने से देश के भीतर निर्यात में लगे कारोबारियों को फायदा होता है। इन्हें निर्यात में प्राप्त डालर के लिए अब ज्यादा रुपए मिलने लगते हैं। कपड़ा, चमड़ा, कृषि उत्पाद, कालीन, हस्तशिल्प (हीरा आदि भी) और कुछ इंजीनियरिंग वस्तुओं के कारोबारी जो निर्यातक हैं रुपए की गिरावट से ज्यादा मुनाफा बटोरते हैं। हालांकि किसी खास परिस्थिति में जब इसमें इस्तेमाल होने वाली चीजें महंगी हो जाती हैं तो मुनाफा कम होता है या कभी नुकसान होता है। जैसे कि युद्ध के चलते पेट्रोल-डीजल महंगा होने से अन्य चीजों की कीमतें बढ़ जाती हैं इससे लागत बढ़ जाती है। इसके अलावा प्रवासी भारतीयों को भी इससे फायदा होता है क्योंकि उसी डालर के लिए पहले से ज्यादा रुपया हासिल होने लगता है यानी उनकी कमाई के लिए ज्यादा रुपए हासिल होने लगते हैं। दोनों ही मामलों में रुपए की ऊंची होती कीमत नुकसान पहुंचाती है।
    
इसके अलावा जो ज्यादा बड़े कारोबारी हैं वे इस दौर में रुपए की ज्यादा तेज गिरावट को जानते हुए हेजिंग कर लेते हैं। वे अपनी मजबूत ट्रेजरी टीमों और हेजिंग रणनीतियों के दम पर, अपने मुनाफे को बचा रहे हैं। हेजिंग एक जोखिम प्रबंधन की रणनीति है। हेजिंग का मतलब है भविष्य में होने वाले नुकसान से बचने के लिए आज ही एक ‘बीमा’ खरीद लेना। उदाहरण के लिएः मान लीजिए एक भारतीय आयातक को तीन महीने बाद 10 मिलियन डालर का भुगतान करना है। आज डालर की दर 93 रुपये है। अगर तीन महीने में डालर 95 रुपये हो जाता है, तो आयातक को 20 लाख रुपये अतिरिक्त देने होंगे। इस जोखिम से बचने के लिए आयातक आज ही किसी बैंक के साथ फारवर्ड कान्ट्रैक्ट कर लेता है कि तीन महीने बाद वह 93 रुपये प्रति डालर की दर से डालर खरीदेगा, चाहे बाजार दर कुछ भी हो। हालांकि इसमें नुकसान के भी जोखिम हैं। मगर बड़ी पूंजी आम तौर पर मौके का फायदा उठाने में सफल होती है। यह अपने संकट का बोझ भी जनता पर ही डाल देती है। इसका नारा है ‘घाटा सार्वजानिक मुनाफा निजी’! छोटे आयातक, छोटे निर्यातक और छोटे कारोबारी इसकी पूरी मार झेलते हैं। उनके पास न तो हेजिंग की सुविधा है, न ही अपनी लागत को कीमतों में तुरंत डालने की क्षमता।
    
भारत के वे बड़े पूंजीपति जिनका अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कारोबार है वे रुपए की गिरावट से मुनाफा बटोरते हैं। एल एंड टी जैसी बड़ी कंपनियां जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ठेके लेती हैं और डालर में भुगतान पाती हैं, उनके लिए रुपये की गिरावट मुनाफे में सीधी बढ़ोत्तरी का कारण बनती है। यही स्थिति आईटी क्षेत्र और फार्मा क्षेत्र के लिए बन जाती है। द इकोनामिक टाइम्स के अनुसार, ‘‘आईटी उद्योग, जो ।प् के कारण मुश्किलों का सामना कर रहा था, को रुपये की गिरावट से राहत मिली है क्योंकि इसकी अधिकांश कमाई डालर में होती है“। 
    
इस सबके उलट देश के भीतर छोटे-छोटे कारोबारी और आम जनता रुपए की इस गिरावट की पूरी मार झेल रहे होते हैं विशेषकर मजदूर वर्ग समेत आम मेहनतकश जनसमुदाय। उद्योग और सेवा में बढ़ी हुई लागत को चीजों की कीमत बढ़ाकर जनता से वसूल कर लिया जाता है। वैसे एकाधिकारी पूंजी अपने एकाधिकार के दम पर और सरकार पर अपने प्रभाव और दबाव से भी मुनाफा बटोरने में कामयाब होती है। जैसे इस्पात क्षेत्र की भारतीय कंपनियों ने आयातित स्टील पर उच्च शुल्क प्रतिबंध लगवाकर बाजार पर एकाधिकार बनाए रखा और कई हजार करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया और वे स्टील पर 5 प्रतिशत तक अधिक का शुद्ध मुनाफा वसूल रही हैं।
    
रुपए की इस गिरावट से या अवमूल्यन से साम्राज्यवादी पूंजी अत्यधिक मुनाफा बटोर लेती है। इस तरह रुपए की इस गिरावट में देशी और विदेशी बड़ी पूंजी कमाई करते हैं। जनता की हालत खस्ता होती जाती है। चीजें आम तौर पर महंगी होती जाती हैं, महंगाई जनता को निगलते जाती है। विपक्षी पूंजीवादी राजनीतिक पार्टियां इस अवसर को अपने लिए सत्ता तक पहुंचने के मौके के रूप में इस्तेमाल करती हैं जैसा 2014 में गिरते रुपए के साथ राष्ट्रीय गौरव के गिरने की बात कहकर हिंदू राष्ट्रवादियों ने किया था।

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