इसका जो भी नाम है गुण्डों की सल्तनत का

Published
Tue, 09/01/2026 - 15:50
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एक आम मजदूर, एक आम किसान कोई ठेला, रेहडी वाला या छोटा दुकानदार देश में रहने वाला हर आम मेहनतकश जहां जिस देश का बाशिंदा है उसे अपना देश कहता है मगर क्या वह देश उसका अपना है। गर अपना है तो कितना, और कितना वह पराया है। 
    
एक देश जो अमीरों का है उसमें डा. सुभाष चंद्रा रहते हैं, अपने नाम के साथ डा. लगाते हैं। इन्होंने करीब 4000 करोड़ रुपये का खुद कर्ज लिया और गारण्टी ली करीब 18,000 करोड़ रुपये के दूसरों के कर्ज की। राष्ट्रीय कम्पनी विधि प्राधिकरण (एन सी एल टी) जो कि 1 जून 2016 को मोदी काल में अस्तित्व में आई थी जिसका काम कंपनी के झगड़ों का निपटारा करना बताया गया था वहां सुभाष चंद्रा खुद को दिवालिया हेतु प्रस्तुत किया। और कुछ ले देकर इस 22,006 करोड़ के कर्ज से पिण्ड छुड़ाने की गुजारिश कर डाली। 
    
एन सी एल टी ने एक कमेटी का गठन किया जिसमें कर्जा देने वाले ही निर्णायक होने थे। कर्जा देने वाले की हैसियत उसको वोटिंग राइट में भी वरीयता देती है। अंततः 22006 करोड़ की विशाल धनराशि महज 6.5 करोड़ के लेन-देन पर निपटा दी गयी। मजेदार बात यह है यह सब कुछ विधि सम्मत, न्याय संगत तो था ही तथाकथित जनवादी भी था जहां फैसला अल्पमत-बहुमत के माध्यम से  हुआ था। 
    
गौरतलब बात यह है कि ये वो ही डा. सुभाष चंद्रा हैं जिन्होंने कभी सुधीर चैधरी जैसे बड़े-बड़े तथाकथित राष्ट्रवादी एंकरों को नौकरी पर रखा था। जी-न्यूज और पूरे जी ग्रुप के मालिक सुभाष चंद्रा भारतीय जनता पार्टी के नेता हैं और भूतपूर्व सांसद रह चुके हैं। जब प्रचण्ड हिन्दुत्व की लहर हो व भक्तों को महाकुंभ की अद्भुत डुबकी लगाई जा रही है तब एन सी एल टी नाम की संस्था मुक्तिदायिनी मां गंगा बन डा.सुभाष चंद्रा का उद्धार कर गयी। सारे पुराने पाप धुल गये। 
    
दूसरी तरफ आम मजदूर-कर्मचारी-किसान हैं जो किसी का गारण्टर बनने में भी 10 बार सोचते हैं और कर्जा लेने में 50 बार। हफ्तों तक बैंक के चक्कर काटते, कागज इकट्ठे करते हुए दो गारण्टर ढूंढते हुए जब बैंक पहुंचते हैं तो बैंक पहले सुनिश्चित करता है कि ये गरीब-गुरबा यदि कर्ज न चुका पाए तो इसकी सम्पत्ति की नीलामी कर वसूली हो सकती है या नहीं। देश की कचहरी में हर रोज अपमानित हुए दो-चार लोग आपको मिल जाएंगे।
    
सुभाष चंद्रा अपना घर बनाने, कोई गाड़ी  खरीदने, दुकान में सामान भरने या इलाज के लिए  कर्ज नहीं लेते, कर्ज न चुकाने पर उनका कभी सिविल खराब नहीं होता, उनके नाम का चस्पा किसी बैंक, तहसील पर न लगा होगा। न ही उनकी शान ओ शौकत में कमी आएगी। वो पूरी शान से जहां भी जाएंगे सम्मान के हकदार होंगे, जानते हैं क्यों?
    
इसलिए यहां दो दुनिया हैं, दो देश हैं, एक दुनिया जोकों की है जो दूसरों के रक्त पर जीती है और इन जोकों में गजब की एकता है। भिन्न-भिन्न देशों की जोंके आपस में दुश्मन हो सकती हैं मगर उनके खून चूसकर मोटा होने के तरीके जरूर आत्मसात कर लेती हैं। ये दुनिया अमीरी, सम्पत्तिशाली पूंजी की दुनिया खून ख्वार, शोषकों की दुनिया, व्यवस्था के मातहत बनाई गयी किसी के सोपानक्रम के शिखर पर हर सरकारी मुलाजिम, बोर्ड आफ डायरेक्टर का हर मेंबर इन परजीवियों का हितैषी हम कदम है। 
    
और दूसरी दुनिया है शोषितों-मजलूमों खून चुसे हुए लोगों की दुनिया। जो सबसे ज्यादा खटती है और सबसे ज्यादा अपमानित होती है। किसी सरकारी दफ्तर में इसकी सुध लेने वाला कोई नहीं होता। इसके ऊपर कुछ दया के छींटे मारकर कुछ लोग देवतुल्य बना दिये जाते हैं। यह दुनिया महज चंद हजार रुपयों पर महीने का दस टका ब्याज देती है। छोटे कर्ज पर भी बैंक इसकी सम्पत्ति हड़प सकता है। सबसे मजेदार बात है कि यह कानून का सम्मान करता है। वो पुलिस से डरता है और उसका सम्मान करता है। एक सच्चा देशभक्त होते हुए भी उसे अलग से देशभक्ति सिखाई जाती है। 
    
फटेहाल, मेहनती चंद हजार रुपये पाने वाले ‘देशभक्त और आलीशान लग्जरी लाइफ जीने वाले देशभक्त एक साथ ज्यादा दिन तक एक देश में तो नहीं रह सकते। किसी शायर ने भी क्या खूब लिखा है, ‘‘इसका जो भी नाम है गुण्डों की सल्तनत का, मैं उसका नागरिक होने पर थूकता हूं। गर उसका कोई अपना खानदानी भारत है तो उससे भी मेरा नाम खारिज कर दो।
    
सारी दुनिया के शोषित देर-सबेर, बहुत जल्द ही इन खानदानी लोगों को जो समस्त धरा को अपनी खानदानी मिल्कियत समझ बैठे हैं इनके पदों से, इनके सिंहासनों से अपदस्थ करेंगे और एक समानता की दुनिया - मेहनतकशों की दुनिया का सृजन करेंगे।  

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