जी-20 और विश्व गुरू

जी-20 की अध्यक्षता जब से भारत को मिली है तब से संघ-भाजपा के कूपमंडूक बहुत खुश हैं। मूर्खों के स्वर्ग में रहने वाले अतीत के इन बंदियों को लगने लगा कि बस अब भारत के विश्व गुरू बनने या बनाने का इनका दिवा स्वप्न पूरा होने का वक्त आ गया है।

जी-20 की विदेश मंत्रियों की बैठक में विश्व गुरू अर्थात् मोदी जी की बड़ी फजीहत हुयी। जी-20 के विदेश मंत्रियों की ठीक बैठक के समय उन्होंने उपदेश दिया कि बांटने की नहीं जोड़ने की बात करो। और साथ ही नारा उछाला ‘एक धरती, एक परिवार और एक भविष्य’। उन्होंने यह ‘दिव्य ज्ञान’ प्रदान किया परन्तु रूस और अमेरिका के विदेश मंत्रियों ने वही किया जो उन्हें करना था। चीन ने तो अपने विदेश मंत्रियों को इस बैठक में भेजा ही नहीं। विश्व गुरूता के मामले में चीनी भारत से दो कदम आगे हैं। जब वे खुद ही पीर हैं तो भारत को बड़ा पीर कैसे मान लें। जैसी भारत और चीन के बीच बड़े पीर बनने की होड़ है ठीक वैसी ही होड़ जी-20 के अधिकांश देशों के बीच अलग-अलग वजह से है। हर कोई हर किसी को सबक सिखाना चाहता है। अमेरिका और रूस तो यूक्रेन को लेकर लड़ ही रहे हैं।

जी-20 की अध्यक्षता के लिए मोदी जी ने बड़ी अलग ढंग की जुगत लगायी है। मोदी जी चाहते थे कि कैसे भी हो यह अध्यक्षता उन्हें 2024 के आम चुनाव के ठीक पहले मिले। वह इसलिए कि वे साबित कर सकें कि भारत का कैसा डंका पूरी दुनिया में बज रहा है। महान प्रतापी हिन्दू हृदय सम्राट अब विश्व सम्राट नहीं भी तो विश्व गुरू तो बन ही चुके हैं।

असल में जी-20 के चक्रीय क्रम के अनुसार भारत को अध्यक्षता 2020 में मिलनी थी। भारत के इंकार के बाद और कोविड-19 महामारी के बीच यह पहले इटली को मिली। फिर भारत का नम्बर आना था परन्तु भारत के इंकार के बाद इण्डोनेशिया का नम्बर आया। और अब वह मुफीद वक्त आ गया था जब भारत अध्यक्षता ग्रहण कर सकता था। अतः आम चुनाव के ठीक एक साल पहले भारत ने अध्यक्षता ग्रहण की।

विश्व गुरू की गणना में रूस-यूक्रेन युद्ध शायद नहीं रहा होगा। और अगर रहा भी होगा तो शायद उन्होंने यह गणना नहीं की होगी कि युद्ध इतना लम्बा खिंचेगा। और मोदी जी के ‘विश्व गुरू’ बनने की राह में राहु बन जायेगा। यदि युद्ध समय रहते समाप्त हो गया होता या अभी भी इनकी अध्यक्षता के काल में समाप्त हो जाये तो विश्व गुरू वाली हवा अच्छे ढंग से फैलती या फैलायी जा सकती थी। रूस-यूक्रेन के कारण उपजी परिस्थितियों और ध्रुवीकरण ने भारत की अध्यक्षता के जश्न को फीका बना दिया है। स्वयं रूस और अमेरिका के बीच फंसे भारत के लिए ‘किसको छोड़ूं, किसको पकडूं’ वाली स्थिति है।

भारत की अध्यक्षता में विघ्न डालने की कोशिशों को परवान चढ़ाने में बीबीसी की मोदी पर डाक्यूमेण्ट्री ने भी अपना काम किया। ऐसे ही आर्थिक, सामाजिक, मानवीय या प्रेस स्वतंत्रता सम्बन्धी वैश्विक रिपोर्ट भी अपना काम करती रहती है। अक्सर ही विश्व गुरू को आईना दिखाती रहती है। अक्सर ही आईने में अपनी शक्ल देखकर विश्व गुरू और उनके चेलों को गुस्सा आ जाता है। वे या तो अपनी शक्ल से या फिर आईने से इंकार कर देते हैं।

मोदी जी के विश्व गुरू के महोत्सव में राहुल गांधी एक ऐसे व्यक्ति के रूप में उभरे हैं जिन्हें इनके शब्दों में ‘विघ्न संतोषी’ कहा जायेगा। विघ्न डालना और फिर संतोष से भर जाने वाले कांग्रेसी वही सब कुछ कर रहे हैं जो अतीत में संघी-भाजपाई कांग्रेसियों के जमाने में करते थे। राहुल ने लंदन में एक मंच के जरिये यह सच प्रसारित किया कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एक कट्टरपंथी फासीवादी संगठन है कि वह एक गुप्त सोसाइटी (सीक्रेट सोसाइटी) है कि वह वैसा ही संगठन है जैसा कि ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’। बस राहुल ने इस सच को उजागर नहीं किया कि इस फासिस्ट संगठन को, इस ‘सीक्रेट सोसाइटी’ को, इस ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ के हिन्दू संस्करण को किसने पाला-पोसा। जिन ‘सत्तर सालों’ में कांग्रेस की सरकार रही तो इनके खात्मे के लिए उन्होंने क्या किया। सच तो यही है कि इस विषधर सांप को इन्होंने ही पाला-पोसा है।

राहुल गांधी के ‘सच्चाई’ को उजागर करने के बाद भाजपा-संघ के लोगों को तीखी मिर्ची लगी और उन्होंने राहुल को ‘माओवादी विचार प्रक्रिया’ का शिकार बता दिया। और इस तरह से फासीवाद के खिलाफ ‘माओवाद’ की गलत मंशा से ही सही चर्चा शुरू हो गयी। इसमें कोई शक नहीं कि फासीवाद का सही इलाज इतिहास में एक बार ‘माओवाद’ कर चुका है। जापानी सैन्य फासीवादियों को माओवादियों ने चीन में, दूसरे विश्व युद्ध के समय अच्छे ढंग से सबक सिखा दिया था। चीन की 1949 की क्रांति के निशाने पर जापानी सैन्य फासीवादी-साम्राज्यवादी थे। अब तो यह इतिहास ही बता सकता है कि क्या एक बार फिर ‘फासीवाद’ और ‘माओवाद’ आमने-सामने होंगे। और क्या फिर एक बार फिर फासीवाद ‘माओवाद’ के हाथों मुंह की हार खायेगा। खैर! बात रही राहुल गांधी के माओवादी होने की तो यह बात हवा में उड़ने वाली है।

जी-20 को महारूप देने और मोदी जी की ‘विश्व गुरू’ की छवि को भारत के मतदाताओं के मन में ढंग से बिठा देने के लिए मोदी सरकार सैकड़ों करोड़ रुपये (900 करोड़) फूंक रही है। देश के 50 शहरों-कस्बों में 200 ‘‘इवेंट’’ आयोजित होने हैं। विश्व गुरू का जलवा ऐसा बनाया जाना है कि 2024 का चुनाव बस यूं ही जीत लिया जाए।

जी-20 के इन 200 ‘इवेंट’ के लिए शहरों-कस्बों को नये ढंग से संजाया-संवारा जा रहा है। और इसके लिए एक तरफ भारत की जनता की गाढ़ी कमाई से टैक्सों के जरिये चुराये गये पैसों को पानी की तरह बहाया जा रहा है तो दूसरी तरफ सौंदर्यीकरण के नाम पर गरीबों की बस्तियों को उजाड़ा जा रहा है। ‘‘पकौड़ा रोजगार’’ कर किसी तरह से सड़कों के किनारे अपना जीवन यापन करने वालों को एकदम बर्बाद कर दिया गया है। किसी तरह अपनी गुजर बसर करने वाले अपने बर्बाद रोजगार के साधनों को तो कभी अपने उजड़े आशियाने को देख रहे हैं। मोदी जी के ‘विश्व गुरू’ बनने की कीमत भारत के शोषित-उत्पीड़ितों को चुकानी पड़ रही है। भाजपा की सरकारें इन ‘इवेंट’ को आयोजित करने के लिए आपस में इस बात की होड़ कर रही हैं कि किसकी पीठ पर विश्व गुरू की शाबासी का हाथ होगा।

जी-20 या अन्य वैश्विक मंचों का भविष्य इस वक्त साम्राज्यवादियों के बीच बढ़ती आपसी बढ़ती होड़ के कारण दांव पर लगा हुआ है। एक तरफ यूक्रेन पर कब्जे को लेकर रूसी और अमेरिकी व यूरोपीय साम्राज्यवादी आमने-सामने हैं तो दूसरी तरफ चीनी साम्राज्यवादियों को घेरने के लिए अमेरिकी-जापानी-आस्ट्रेलियाई या अन्य साम्राज्यवादी नई-नई तिकड़में लगा रहे हैं। वैश्विक मंच ही नहीं कई पुरानी संधियां भी इस बढ़ती होड़ के कारण दांव पर लग रही हैं। वैश्विक आर्थिक संकट अपने ढंग से इस होड़ को तीखा बना रहा है। ऐसी दुनिया में भारत के स्वयंभू विश्व गुरू के हाथों सफलता लगने की कम ही संभावना है। ये दीगर बात है कि विश्व गुरू के कूपमंडूक चेले और भोंपू चैनल हर हाल में इस बात को प्रचारित करेंगे कि भारत ने जी-20 की अध्यक्षता में ये कमाल किया कि वो कमाल किया।

जी-20 को सफलता तब मिल सकती है जब दुनिया के प्रमुख साम्राज्यवादी आपस में सुलह-समझौते करें। एक-दूसरे के हितों के लिए स्थान दें। परन्तु यह तो ऐसा हुआ कि शिकार के लिए लड़ने वाले जंगली जानवर लड़ना छोड़कर आपस में मिल-जुल कर रहने लगें। विश्व गुरू के न तो कर्मकाण्ड और न ही अध्यात्म का जादू जी-20 में चल सकता है। जो हो सकता है वह बस यह कि गुरू के चेले ‘वाह! गुरूजी वाह!’ कहते रहें।

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