किन्नर

/kinnar

विवाह लगभग समाप्त हो चुका है। सुबह-सुबह खुले आसमान के नीचे ओस टपक रही है। दूल्हे के परिवारजन ठंड से बचने के लिए अलाव के इर्द-गिर्द बैठे हुए हैं। हंसी-खुशी और ससुराल की कमियों-खूबियों की बातचीत का क्रम एकदम से बदल जाता है। ये किन्नरों की आवाज है।
    
ये लोग यहां भी मांगने आ गए, पहले तो सिर्फ लड़के के पैदा होने पर आते थे। दूल्हे के छोटे भाई ने कहा। ‘‘अब तो मकान बनने पर भी आते हैं’’। जवाब आया। ‘‘कितना पैसा देना होगा’’? चाचा ने पूछा। ‘‘जितना कम में मान जाएं ये तो उनके ऊपर है।’’ किसी ने जवाब दिया।
    
अपने चिर परिचित अंदाज में किन्नरों का समूह और आम समाज आमने-सामने है। मांगने वाला इस कवायद में है कि अधिकतम हासिल हो सके और सामने वाला न्यूनतम पर। लेने-देने के इस क्रम में मांगने वाला घृणित हथकंडे अपना सकता है यह बात देने वाला समूह जानता है और यह भी जानता है कि किन्नरों के इस समूह से किसी नैतिकता या सामाजिक व्यवहार की उम्मीद नहीं की जा सकती है।
    
‘‘चलिए बैठकर बातचीत करते हैं’’। बातचीत की पेशकश दूल्हे के बड़े भाई की थी। सामने कुर्सी पर बैठते हुए कविता (किन्नरों की प्रधान) के चेहरे पर एक विजयभाव है, एक आत्मविश्वास है। शायद वो जानती है ऐसे हजारों लोगों से कैसे विजय पानी है। कैसे निरुत्तर करना है। बैठने के अंदाज में एक विजयघोष का भाव है।

मोहित (दूल्हे का बड़ा भाई)- हम लोग पैसे देने की प्रथा को गलत मानते हैं।

कविता- क्यों?

मोहित- हम मानते हैं कि दुनिया में सब बराबर हैं। जितने आत्मसम्मान और स्वाभिमान से मुझे जीने का हक है उतना ही हर इंसान को होना चाहिए।

कविता- ये तो हमारा नेग है, हिजड़ा मांगेगा नहीं तो क्या करेगा?

मोहित- हम नेग या बख्शीश जैसी प्रथा को गलत मानते हैं। क्यों समाज ऐसा हो जिसमें किसी को पैसे के लिए भीख मांगनी पड़े। किसी को दीन या छोटा बनना पड़े? क्यों नहीं सबको बराबरी के एहसास पर खड़ा होना चाहिए। हम आप लोगों को भी बराबर का इंसान मानते हैं इसीलिए पैसा देना गलत मानते हैं।

कविता- ऐसा मानता कौन है? हमें बराबर का दर्जा देता कौन है? हमारे साथ बचपन से ही समाज कैसे सुलूक करता है हमें बहुत अच्छे से पता है! तुम बराबरी की बात कर रहे हो।

मोहित- हां मैं जानता हूं तुम्हारी कही गई हर बात सच है। तुम्हारे समाज का दर्द, तकलीफ, तिरस्कार कुछ भी हमसे छिपा नहीं है। लेकिन हम समाज की बेहतरी, बदलाव के लिए लड़ने वाले लोग हैं।

कविता- इतनी बड़ी बातें कर रहे हो तो फिर दहेज लेकर शादी क्यों कर रहे हो?
    
कविता को लगा मानो उसने अब सामने वाले की सब बातों को धता दिया हो। जैसे सामने वाले को उसका वास्तविक चेहरा दिखा दिया हो।

मोहित- ये शादी बिना दहेज के हो रही है! चाहो तो लड़की के पिता से बात कर लो!
    
कविता का मन इस बात पर विश्वास के लिए तैयार न था लेकिन वह निरुत्तर थी। तभी दुल्हन के पिता का आगमन होता है और कविता अपने दो साथियों के साथ कुछ बात करने चल देती है।
    
‘‘कहां इन लोगों से इतनी बड़ी बातें कर रहे हो। ये लोग नंगई पर उतर जाते हैं। इन्हें दूसरों की परेशानी कहां दिखती है।’’ दूल्हे के चाचा ने कहा। बाकी सभी लोग किन्नरों के चरित्र का बखान करने लगे। हर कोई अपने अंदाज में उन्हें परिभाषित कर रहा है।

मोहित- क्या इन लोगों में जितनी बुराइयां गिना रहे हो उसके लिए ये खुद जिम्मेदार हैं। क्या इस समाज का हमारा-तुम्हारा इसमें कोई दोष नहीं है?
    
बातचीत थोड़ा गंभीर हो चली। मोहित ने कहना जारी रखा।

मोहित- अगर तुम्हारे घर में कोई किन्नर पैदा हो जाए तो तुम क्या करोगे? एक तीखा प्रश्न जिसने वहां मौजूद हर शख्स को झकझोर दिया था।’’

मोहित- जिस समाज में लड़की के पैदा होने पर मातम छा जाता है वहां किन्नर पैदा होने पर क्या आलम होगा? तब परिवार क्या करेगा। और यदि समाज से विद्रोह करके उसे पाल भी लिया तो क्या समाज उस निर्दोष बच्चे को जीने देगा। खेल-कूद, शिक्षा-रोजगार हर पल-प्रतिपल उसे किस हिकारत और वंचना को झेलना पड़ेगा।’’
    
थोड़ी देर खामोशी मानो मोहित गहरे दुख में है, फिर बात जारी रखता है ‘‘अपने होश संभालने से लेकर अपनी मृत्यु तक ताउम्र समाज की नीचता और गलीजपन के जिस दंश को ये झेलते हुए बड़े होते हैं तब उनसे किस नैतिकता, सामाजिक सरोकारों मानवीयता की उम्मीद की जा सकती है।’’?
    
एक नीरवता, खामोशी, चुप्पी ने मानो सबको डस लिया हो। मानो तार्किकता के इस प्रवाह ने वहां बैठे हर शख्स को कुछ पलों के लिए भीतर से झकझोर दिया हो। इस खामोशी को कविता की बधाई ने तोड़ा।

कविता- हमें अभी पता चला कि ये शादी बिना दहेज के हो रही है। अब कोई गिला-शिकवा नहीं। हमें जो खुशी से मिलना था मिल गया। सब अच्छे लोग हैं, दूल्हा-दुल्हन का माथा चूमकर आशीष देती हैं।
    
कविता के भीतर कुछ चल रहा है जिसे मोहित की आंखें भांप लेती हैं। विदा लेने से पहले एक बार मोहित की तरफ मुड़ती हैं उन आंखों की तरफ जिसमें उसने पहली बार इंसान होने का दर्जा देखा था। बराबरी के एहसास भरे शब्द देखे थे। ‘‘कभी घर आइए बैठकर बातें करनी हैं!

मोहित- अभी ज्यादा तो कुछ नहीं कह सकता लेकिन हां इतना जरूर विश्वास दिला सकता हूं कि यदि कभी आप लोग अपने अधिकारों के लिए लड़ते हैं तो हमें अपने साथ खड़ा पाएंगे। बातचीत और किताबों की सख्त दरकार है हमारी दुनिया को।’’
    
बातचीत और किताबें? कविता ने ये शब्द सुने जिसकी गूंज उसके कानों में देर तक गूंजती रही।             -पथिक
 

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