8 जुलाई को बरनाला के तर्कशील भवन में किसान संगठनों का एक दिनी कन्वेंशन हुआ। इसमें भारतीय किसान यूनियन एकता (डकोंदा), क्रांतिकारी किसान मंच, किसान एकता केन्द्र, संग्रामी किसान समिति के कार्यकर्ता शामिल हुए। कन्वेंशन का आयोजन भारतीय किसान यूनियन एकता (डकोंदा) ने किया। कन्वेंशन का संचालन अमरीक सिंह ने किया। कन्वेंशन में बलदेव मंढेर, अजमेर अकादिया, शमशेर कला मंच, किसान एकता केन्द्र ने गीतों से किसान संघर्ष एवं एकता का संदेश दिया। गुरदेव सिंह रामपुरा के अभिवादन वक्तव्य के बाद कन्वेंशन की शुरूआत हुई।
कन्वेंशन में तीन सत्रों में चर्चा की गयी। पहले सत्र में किसान संगठनों ने अपने अनुभव और संगठन का परिचय दिया। दूसरे सत्र में अपने कार्यक्षेत्र में किसानों की समस्याओं को बताया। तीसरे सत्र में किसान संगठनों की चुनौतियों और साझा प्रयासों पर बात की गयी।
भा.कि.यू. एकता डकोंदा के अध्यक्ष मंजीत सिंह ने बताया कि हम 1995 से ही एक स्वतंत्र संगठन के तौर पर काम कर रहे हैं। पंजाब में 60 के दशक के बाद हरित क्रांति की शुरूआत हुई। इसमें बड़े पैमाने पर मशीनों, रासायनिक खादों, संवर्धित बीज, कीटनाशक को बढ़ावाा दिया गया। शुरूआती खुशहाली के बाद दशक भर में इसके दुष्परिणाम भी आने लगे जिसके विरोध में किसान संगठनों ने आवाज उठायी। संघर्ष करते हुए राजकीय दमन भी झेलना पड़ा। खुद उन्हें एक फर्जी मुकदमों में सालों दमन का सामना करना पड़ा। इसके अलावा नशे, अपराध के शिकार नौजवानों का भी राज्य मशीनरी दुरूपयोग करती है। लेकिन आम तौर पर ये भी किसान संगठनों के लोगों से नहीं उलझते हैं। वर्तमान में उनका संगठन भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के किसानों पर दुष्प्रभावों के खिलाफ आंदोलनरत है।
किसान एकता केन्द्र के मोनू तोमर ने बताया कि 90 के दशक में आयी नयी आर्थिक नीतियों के दुष्परिणामों के चलते किसानों को चेतना सम्पन्न करने की जरूरत महसूस हुई। महेन्द्र टिकैत के नेतृत्व में उस समय कई आंदोलन लड़े गये लेकिन किसानों में सामूहिक चेतना का अभाव था। इसके लिए 2007 से ही ‘किसान’ पत्रिका निकाली जा रही है। ऐतिहासिक किसान आंदोलन के दौरान किसानों के बीच अधिक सक्रियता आयी। 2024 से स्मार्ट मीटर लगाये जाने के खिलाफ वे संघर्षरत हैं। अभी तक संघर्ष सफल रहा है। गन्ना किसानों को अन्य की तुलना में यूरिया की जरूरत कम होने के बावजूद उपलब्ध नहीं हो पा रही है। यह नीतिगत विफलता का मामला है जिस पर किसानों को संगठित करने का प्रयास जारी है। साप्ताहिक किसान पाठशाला और किसान पुस्तकालय के जरिये किसानों को जागरूक करने और क्रांतिकारी विचारों पर खड़ा करने का प्रयास है। भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के किसानों पर बुरे असर को लेकर सभा की गयी।
संग्रामी किसान समिति के शौर्य मजूमदार ने बताया कि बंगाल में किसानों की समस्या भिन्न तरह की है। यहां जमींदारों का काम किसानों से कर वसूलकर ब्रिटिश शासकों को सौंपना था। इसके खिलाफ ही तिभागा आंदोलन हुआ था और जमीन के पुनर्वितरण की मांग आजाद भारत में भी प्रमुख मांग बनी। आज यहां छोटे किसान ही प्रमुख रूप से हैं। कई जगहों पर आदिवासी किसानांे की जंगल में भागीदारी को लेकर संघर्ष रहा है। मनरेगा जैसी योजना के जाॅब कार्ड बनाने के लिए और अनियमितता के खिलाफ संघर्ष करना पड़ता है। बिजली और पानी की उपलब्धता भी किसानों का प्रमुख मुद्दा बनता है।
क्रांतिकारी किसान मंच से हिमांशु ने बताया कि जबरन भूमि अधिग्रहण के खिलाफ उचित मुआवजे की मांग को लेकर किसानों के संघर्ष में शामिल हुए। उन्हें एकजुट करने का प्रयास किया, समिति बनाई गयी। उस दौरान जारी ऐतिहासिक किसान आंदोलन में भागीदारी की। समय-समय पर होने वाले आह्वानों में किसानों को लामबंद करते हैं।
क्रांतिकारी किसान मंच के लालू तिवारी ने बताया कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में वे मुख्यतयः छोटे किसानों और खेत मजदूरों के बीच सक्रिय हैं। किसानों की खाद, बीज की कमी को लेकर और मनरेगा के तहत काम मिलने में होने वाली गड़बड़ी को लेकर संघर्षरत रहते हैं। ऐतिहासिक किसान आंदोलन के दौरान ही किसानों को संगठित करने के प्रयास किये। संयुक्त किसान मोर्चा की प्रांतीय समिति में शामिल हैं।
दूसरे सत्र में लाल परचम पत्रिका के मुख्तयार भुला ने कहा कि पंजाब के साथ शुरू से ही ज्यादती हुई है। बंटवारे में उसकी खेती की जमीन का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान चला गया। भाषाई आधार पर राज्य का विभाजन होने से भी जमीन कम हो गयी। ऐसा ही बंगाल के लोगों ने भी झेला। देश में शरणार्थी के तौर पर रहने को मजबूर हुए। महलवारी, रैयतवारी की ब्रिटिश व्यवस्था से हुई लूट के खिलाफ ‘जमीन जोतने वाले की’ मांग पैदा हुई। आजाद भारत में भी केन्द्र सरकार ने वायदे के बावजूद ऐसा नहीं किया। लेकिन क्रांति की लहर के डर से जमीन की चकबंदी और टैक्स वसूली में सुधार हुआ। इन सुधारों से कुछ नहीं होना था और देश में खाद्यान्न संकट ने इसे जाहिर कर दिया। फिर की गयी तथाकथित हरित क्रांति में मशीनों, रासायनिक खाद, दवाओं से पूंजीपतियों ने फायदा उठाया। इसके दूरगामी नुकसान पर सरकार ने कोई बयान नहीं दिया। यह सब महाराष्ट्र, आंध्रा के समुद्र तटीय क्षेत्र आदि हिस्सों में भी किया गया। 80 के दशक से नीतियां खेती के बजाय पूंजी के पक्ष में होने लगी। ‘‘हरित क्रांति’’ से किसान संकट में फंस गये। और संघर्ष को मजबूर हो गये। इसके चलते फसल के दाम (समर्थन मूल्य) बढ़ाने का संघर्ष प्रमुख हो गया। यह संघर्ष खेती के बजाय मंडी और बाजार के इर्द-गिर्द केेन्द्रित हो गया। किसानों में कुछ जमींदार, फार्मर बन गये जो होटल, फिल्म, रियल एस्टेट आदि क्षेत्रों में लगे हैं। दूसरी तरफ छोटे किसान, भूमिहीन मजदूर बन गये। छोटे-मझौले किसान कर्जदार हो गये। ज्यादातर बैंकों के तो कुछ सूदखोरों के चंगुल में फंसे हैं। जमीन बंटाई की उलटी प्रवृत्ति बढ़ रही है जिसमें बड़ा फार्मर छोटे किसानों की जमीन लेकर काश्त कर रहा है।
किसान एकता केन्द्र के मोहित पुंडेर ने कहा 90 फीसदी किसान छोटे-मझोले हैं। सिंचाई की केवल 2 प्रतिशत व्यवस्था ही सरकारी (नहर, ट्यूबेल आदि) है। नकद फसलों के कारण परम्परागत फसल और बीज खत्म हो गये हैं। व्यवसायी खेती बाजार के हिसाब से चलने को किसानों को मजबूर करती है। स्मार्ट मीटर लगाने जैसी योजना लागत बढ़ा देती हैं जिसका किसान विरोध कर रहे हैं। किसानों को बीज, खाद उपलब्ध करवाने वाली किसान काॅपरेटिव सोसाइटी किसानों को बाजार दरों पर कर्ज दिला देने भर को रह गयी है। कर्ज के कारण किसान आत्महत्या के मामले बढ़े हैं। भण्डारण की सरकारी सुविधा न होने के चलते फल-सब्जी का उत्पादन गिरा है। खेती में तकनीकी उपयोग बढ़ने से छोटे किसान पिछड़ जा रहे हैं। जोत का आकार छोटा होना और एक फसली खेती प्रमुख समस्या है। पशुपालन भी घाटे का सौदा हो गया है। कम्पनियों द्वारा तैयार पशु आहार पशुओं में नपुसंकता का भी कारण बन रहा है। कम्पनियों की लूट के इतर नकली कीटनाशक, खाद भी किसानों की बर्बादी के अतिरिक्त कारण हैं। कीटनाशकों का प्रयोग पानी को भी प्रदूषित कर रहा है। छोटी जोत और किसानों के खेती से बेदखल होने के कारण किराये पर ट्रैक्टर से खेत जोतने की प्रवृत्ति देखने में आ रही है।
क्रांतिकारी किसान मंच से शिवदेव सिंह ने कहा कि अधिग्रहण के मामले में सरकार सर्किल रेट से चार गुना भुगतान की बात करती है जबकि नाम मात्र का सर्किल रेट भी सरकार ही तय करती है। बीज की संवर्धित किस्मों के कारण किसान हर साल महंगे दामों पर बीज खरीदने को मजबूर है। क्योंकि बीच संवर्धन ऐसे किया जाता है कि वह अगले साल अनुत्पादक हो जाता है। बीजों के मामले में कंपनियों के एकाधिकाार के चलते कई अच्छे बीज बाजार में उपलब्ध ही नहीं होते हैं। आवारा और जंगली जानवर किसानों की समस्या बन गए हैं। रात-रात भर चैकीदारी के कारण कई किसान मानसिक तौर पर भी बीमार हो गये हैं। किसान मंच ने मजदूर आंदोलन से भी एकजुटता कायम की। मजदूर संघर्ष में सहयोग से किसान संघर्ष को मजदूर संघर्ष से जोड़ने में मदद मिली। बैंक और इंश्योरेंस कम्पनी ब्याज वसूली के लिए खाते से खुद पैसा काट ले रहे हैं। गलत कटौती पर पैसा वापिसी की प्रक्रिया खासी लेट-लतीफ है। अकेला किसान इन संस्थानों से लड़ने में अक्षम है। उत्तर भारत के कई राज्यों में हुए हालिया मजदूर आंदोलन ने कुछ दिनों के संघर्ष में सरकार को झुकने पर मजबूर किया। हमें उनसे सबक लेना चाहिए। मजदूर-किसान एकता कायम करने के प्रयास करने चाहिए।
संग्रामी किसान समिति के सुरेन्द्रनाथ चटर्जी ने कहा कि लगभग 70 फीसदी किसान 5 एकड़ से कम भूमि वाले हैं। किसानों का लगभग आधा एक फसली तो मात्र 20 फीसदी तीन फसली है। यूरिया, डीएपी को स्टाक कर डिस्ट्रिब्यूटर बाजार में कृत्रिम कमी भी पैदा करते हैं। किसानों की नहर के पानी पर निर्भरता है। वह भी एक फसली किसान तक को बरसात के मौसम में दिया जाता है। तालाब बनाने, जल संरक्षित करने के प्रति सरकार उदासीन बनी हुयी है। कई छोटे किसान खेती छोड़ने पर मजबूर हैं। खेत मजदूर भी साल में एक महीने ही मजदूरी पाते हैं बाकी समय अन्य राज्यों में मजदूरी करने पर विवश हैं। पिछले समय में सरकार, निजी कम्पनियों, आर्गेनिक (जैविक) खेती का प्रचार करती रही है। लेकिन फसल तैयार होने, गुणवत्ता जांचने से लेकर बाजार नेटवर्क उपलब्ध न होने के कारण यह भी किसानों के लिए घाटे का सौदा ही साबित हुई है।
तीसरे सत्र में प्रमुखता से यह बात आई कि आज छोटे-मझोले किसानों के बीच से नेतृत्व पैदा करने की जरूरत है। बड़े किसानों की मेहनतकश किसानों से एकजुटता नहीं बन पाती है। महंगी गाड़ी में आते किसान नेता और गरीब किसान के बीच गहरा लगाव नहीं बन सकता। सरकार ऐतिहासिक सफल किसान आंदोलन के बावजूद लगातार खेती-किसानी पर हमलावर है। सैकड़ों अध्यादेश, विधेयक, संशोधन किये जा रहे हैं। इनका सही विश्लेषण करने और किसान हितों की रक्षा के लिए विशेषज्ञता हासिल करने व इसके लिए जूझने की जरूरत है। पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में खेती को सम्मानित पेशा समझा जाता है तो बंगाल, बिहार, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश में किसान दरिद्रता की पहचान है। किसानों को यह समझने-समझाने पर जोर दिया जाए कि खेती की समस्या का कारण खेती में बाहर यानी उद्योग से पूंजी से जुड़ा है। सरकारें उद्योग, पूंजी के पक्ष में खड़ी हैं। इसका परिणाम खेती-किसानी की खस्ता होती हालत है। हमें मेहनतकश किसानों को (छोटे-मझोले) संगठित करने पर अधिक जोर देना चाहिए। महिलाओं को भी किसान संगठनों से जोड़ने की जरूरत है। महिलायें खेती के कई प्रमुख कामों से जुड़ी हैं, लेकिन किसान संगठनों में उनकी संख्या काफी कम है। उन्हें नेतृत्व तक लाने की जरूरत है। खेती-किसानी के संकट को सामूहिक खेती के समाजवादी क्रांति के तरीके से ही हल किया जा सकता है। इस क्रांतिकारी समाधान के जरिये समाजवादी क्रांति की महत्ता मेहनतकश किसानों में स्थापित करनी चाहिए।
कन्वेंशन में विचारों, अनुभव को साझा करने और कुछ मुद्दों पर संयुक्त गतिविधि करने की भावना व्यक्त की गयी। गीतों-नारों के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। गुरदीप सिंह रामपुरा ने कार्यक्रम को उत्साह भरने वाला बताया और सभी को धन्यवाद प्रेषित किया। -विशेष संवाददाता