क्या हवा बदलने वाली है

Published
Sun, 08/16/2026 - 15:50
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अभी ज्यादा कुछ दिन नहीं हुए थे कि भाजपा ने पांच में से तीन राज्यों खासकर प.बंगाल  में बम्पर जीत हासिल की थी। अब इस बात को छोड़ दिया जाए कि भाजपा ने जीत कैसे हासिल की। भाजपा का हौंसला आसमान छू रहा था और वह एक के बाद एक पार्टी में फूट कराके संसद में तीन-चैथाई बहुमत की जुगत भिड़ा रही या साजिश रच रही थी। फिर जो हुआ वह सबके सामने है। छात्र-युवा उभार ने न केवल एक मंत्री का इस्तीफा बल्कि मोदी सरकार का इकबाल भी छीन लिया। 
    
छात्र-युवा उभार ने जितना हतप्रभ मोदी एण्ड कम्पनी को किया उतना ही हतप्रभ भारत के बड़े-बड़े राजनैतिक विश्लेषकों को भी किया। इसमें शेखर गुप्ता, तवलीन सिंह, वीर सांघवी जैसे कई नामी-गिरामी शामिल हैं। ‘हवा बदल रही है’ का शोर मचने लगा है। राहुल गांधी का ग्राफ ऊपर चढ़ने लगा तो मोदी की नाकामियों का हिसाब लगाया जाने लगा है। और इस गणित में सारे गुणा-भाग का आधार मौजूदा छात्र-युवा उभार है। और इस उभार ने सोशल मीडिया में जो रील, मीम्स का बवंडर खड़ा किया है उसे इसके प्रमाण के तौर पर पेश किया जा रहा है। विपक्षी पार्टियों के हौंसले बुलंद हैं और तीन सप्ताह से संसद ठप्प है और ऐसे में जब बिहार और मध्य प्रदेश में भाजपा अपनी सारी मशीनरी के बाद भी चुनाव हार गयी तो इसे बदलती हवा का एक और प्रमाण बताया गया।
    
बदलती हवा की कहानी ऐसी है कि मोहन भागवत को खुद कमान संभालनी पड़ी है। ‘जेन-जी’, ‘जेन-अल्फा’ शुद्ध गैर हिन्दू-भारतीय संस्कृति वाले लफ्जों का पीछा करना पड़ा है। अब क्या तो मोदी और क्या तो भागवत ‘जेन-जी’ शब्दावली के ग्राहक और प्रवक्ता बनने की हास्यास्पद कोशिशें कर रहे हैं। समय बीत रहा है और हवा कहीं आंधी न बन जाये इसका डर सता रहा है। राजनैतिक विश्लेषकों ने जो कि अपने को महज मौसम वैज्ञानिक समझते हैं, घोषणा कर दी है कि हवा बदल रही है और बदली हवा के अनुरूप उन्होंने अपने को अभी से ढालना शुरू कर दिया है। नये मौसम के अनुरूप वे अपने वस्त्र, अपनी चाल-ढाल सब तय कर रहे हैं।  

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उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

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तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

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वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?

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अमेरिकी साम्राज्यवादी अब ऐसी स्थिति में नहीं रह गये हैं कि वे नाटो देशों को सीधे आदेश जारी करें। इसे ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन जैसे क्षेत्रीय गठबंधनों का सामना करना पड़ रहा है। ये सारे गठबंधन अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया को एक हद तक चुनौती दे रहे हैं। 

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अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।