मोदी ये ना करे तो क्या करे

आम चुनाव के पहले चरण के मतदान के बाद कुछ ऐसा हुआ कि मोदी एण्ड कम्पनी को लगने लगा कि चुनाव जीतना है तो अपने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करना होगा। मोदी का ब्रह्मास्त्र क्या था। मुसलमानों को राक्षस, आक्रान्ता आदि के रूप में दिखाओ और हिन्दुओं का भयादोहन करो। ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ का नारा हवा-हवाई नारा था। असल नारा तो मुसलमानों को ‘घुसपैठिया’, ‘ज्यादा बच्चे पैदा करने वाला’ आदि गालियां देना है। ‘वोहरा मुसलमान’, ‘शिया मुसलमान’, ‘पसमांदा मुसलमान’ जिनको कल तक मोदी-भाजपा-संघ को अपने खेमे में लाना था अब सब घुसपैठिये, ज्यादा बच्चे पैदा करने वाले हो गये। पहले चरण के मतदान के तुरंत बाद मोदी ने अपने चेहरे पर अपने आप चढ़ा हुआ नकाब खुद ही उतार फेंका। दूसरे, तीसरे, आदि चरण के बाद मोदी का कौन सा चेहरा सामने होगा। साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण, साम्प्रदायिक उन्माद के लिए अब और खराब बातें मोदी एण्ड कम्पनी करेगी। 
    
असल में मोदी ये ना करे तो क्या करे। यही उनका चुनाव जीतने का मूल मंत्र रहा है। गुजरात से लेकर दिल्ली की सत्ता पर कब्जा ऐसे ही किया गया है।  

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अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।

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शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी शासक भी दुनिया को यह जताने में लगे हुए हैं कि उनका अमेरिका से टकराने का कोई इरादा नहीं है। वे सबके साथ साझेदारी की बात कर सकते हैं। यानी अमेरिका व चीन साथ-साथ सारी दुनिया में छा सकते हैं।

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जेनरेशन जेड की युवा पीढ़ी को संघी ताकतें समझा रही हैं कि वे काॅकरोच जनता पार्टी के बहकावे में न आयें। वे मोदी के साथ खड़े रहें। वहीं काॅकरोच जनता पार्टी युवाओं के आक्रोश-दर्द को मुद्दा बना उन्हें बुराई मुक्त पूंजीवाद का ख्वाब परोस रही हैं। ऐसे में युवाओं को सही रास्ता तलाशना होगा। सही रास्ता इन दोनों रास्तों से अलग शहीदे आजम भगत सिंह का रास्ता है

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हिंदू फासीवादियों के लिए बिहार एस आई आर की पहली प्रयोगशाला थी। पश्चिम बंगाल  निशाने पर लंबे समय से ही था। ये तमाम प्रयास के बावजूद यहां की सत्ता से काफी दूर थे। चुनाव आयोग के जरिए एस आई आर और गृह मंत्रालय के अधीन अर्ध सैनिक बलों के दम पर इस किले को फतह करना हिंदू राष्ट्रवादियों का खास मकसद था। अंततः इस चुनाव में यहां की सत्ता को गिरफ्त में लेने में ये सफल हो चुके हैं। 

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दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों में पूंजीपति वर्ग ने ‘कल्याणकारी राज्य’ कायम किये जिसके पीछे समाजवादी खेमे का दबाव तो था ही साथ ही उन देशों में संगठित मजदूर आंदोलन का भी भय था जो पहले विश्व युद्ध के बाद फिर उठ खड़ा हुआ था। दो विश्व युद्धों की तबाही और महामंदी की विभीषिका से उसका क्रांतिकारी तेवर भी था जिसे पूंजीपति वर्ग नजरअंदाज नहीं कर सकता था।