पी एफ नियमों में आशंकित करने वाले बदलाव

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कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) ने ईपीएफ में कर्मचारियों के जमा पैसों के निकासी के नियमों में कुछ ऐसे बदलाव किये हैं, जिससे करीब 7 करोड़ ईपीएफ अंशधारकों में चिंता और बेचैनी पैदा हो गयी है। ईपीएफ में जमा समस्त राशि को निकालने के संबंध में एक बदलाव यह किया गया है कि अब लगातार 12 महीने की बेरोजगारी के बाद ही कोई अंशधारक अपनी समस्त जमा राशि (पेंशन वाले हिस्से को छोड़कर) निकाल सकता है। पेंशन वाला हिस्सा निकालने के लिए 36 माह की बेरोजगारी की न्यूनतम सीमा तय कर दी गयी है। पहले 2 माह की बेरोजगारी के बाद पेंशन वाली कटौती समेत समस्त राशि निकाली जा सकती थी। इस तरह से कर्मचारियों और मजदूरों को लग रहा है कि उनका अपने पैसे पर से भी अधिकार कमजोर किया जा रहा है। 
    
इस मामले में विभिन्न कोणों से उठने वाली आलोचनाओं के बाद ईपीएफ ने सफाई दी है कि आंशिक निकासी को इन बदलावों के जरिये पहले से आसान कर दिया गया है। अब अंशधारक कभी भी अपनी समस्त जमा राशि का 75 प्रतिशत हिस्सा निकाल सकता है। पहले आंशिक निकासी कर्मचारी वाले हिस्से से ही की जा सकती थी और नियोक्ता वाला हिस्सा आंशिक निकासी के जरिये नहीं निकाला जा सकता था। इस तरह ईपीएफ सफाई देता है कि समस्त राशि के 25 प्रतिशत हिस्से की निकासी को ही कठिन बनाया गया है। ईपीएफ का कहना है कि सेवानिवृत्ति के समय कर्मचारी का हाथ बिल्कुल खाली न हो जाए, इसलिए थोड़ी कड़ाई जरूरी है। 
    
यह सही बात है कि पिछले कुछ सालों में (खास तौर पर कोविड के बाद से) ईपीएफ अंशधारक आंशिक या समयपूर्व पूर्ण निकासी के जरिये अपनी ईपीएफ जमा राशि बड़ी मात्रा में निकालने लगे हैं। यह ईपीएफओ द्वारा निकासी को आसान बनाने तथा अंशधारकों के किन्हीं तात्कालिक बड़े खर्चों के लिए पैसों की जरूरत पैदा होने दोनों वजहों से हुई है। यहां यह भी ध्यान रखना होगा कि लोगों को ईपीएफ निकासी से इतर भी बड़े कर्जे लेने पड़े हैं और बड़ी संख्या में लोगों के सिर पर कर्ज का बोझ है। यह सब लोगों के जीवन के संकट की अभिव्यक्ति है। इन संकटों पर कोई बात किये बगैर ईपीएफओ लोगों के ईपीएफ के पैसों पर सांप की तरह कुंडली मार कर बैठ रहा है तो लोगों को परेशानी होना स्वाभाविक ही है। 
    
आज मजदूरों-कर्मचारियों को ईपीएफ की पेंशन के प्रति कोई मोह नहीं है। लोगों को लगता है कि ईपीएफ से मिलने वाली 1000-1500 रुपये की पेंशन के लिए 55-60 वर्ष तक इंतजार करने से बेहतर है कि पहले मौजूदा चुनौतियों को हल किया जाए। कुछ राज्य सरकारों द्वारा ईपीएफ से ज्यादा वृद्धावस्था पेंशन दी जा रही है। चूंकि कोई व्यक्ति किसी एक पेंशन सेवा का ही लाभ उठा सकता है, इस वजह से भी पेंशन में जमा राशि व्यर्थ लगने लगती है। कुछ अंशधारक तो 10 साल की सेवा के बाद सिर्फ इसलिए नौकरी से दो माह का ब्रेक ले लेते हैं, ताकि उनका पीएफ का पैसा पेंशन फंड में न चला जाए।
    
ईपीएफओ संस्था काफी समय से दावा कर रही है कि इसकी न्यूनतम पेंशन राशि को बढ़ाया जाएगा। लेकिन यह कितना और कब बढ़ाया जाएगा इसका कोई फैसला लिए बगैर निकासी नियमों में बदलाव ने लोगों को आशंकित कर दिया है। 
    
सरकार समय-समय पर ईपीएफ में जमा राशि को शेयर बाजार में लगाने की बात करती रहती है। बल्कि इसका एक हिस्सा तो शेयर मार्केट में लग भी चुका है। यह भी लोगों को आशंकित करता है कि कहीं उनका पैसा डूब न जाए। ऐसे में ईपीएफ निकासी नियमों में हुए बदलाव से लोग आशंकित हैं तो इसे बेवजह नहीं कहा जा सकता। 

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