1971 में संयुक्त राज्य अमेरिका दिवालिया होने की कगार पर था। दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने वैश्विक वित्त व्यवस्था को एक वादे के आधार पर खड़ा किया था। प्रत्येक डॉलर सोने की निश्चित मात्रा के समकक्ष था। कोई भी देश अमेरिकी केन्द्रीय बैंक के पास जाकर 35 डॉलर देकर एक आउंस सोना प्राप्त कर सकता था। सभी देश डॉलर पर भरोसा करते थे क्योंकि डॉलर रखना या सोना रखना एक जैसा था।
लेकिन अमेरिका इस स्थिति का लाभ उठा रहा था। अगले 25 वर्षों तक इसने अपने सोने के भंडार की तुलना में ज्यादा डॉलर छापे। अपने वियतनाम युद्ध के खर्चों को यह इस जरिये पूरा कर रहा था। 1970 तक दुनिया के अन्य देशों के पास 40 से 50 अरब डॉलर का रिजर्व था। जबकि अमेरिकी खजाने में मात्र 10 अरब डॉलर का रिजर्व था। अगर कोई भी तीन बड़े देश अपने पास रिजर्व डॉलर के बदले सोना लेने पहुंच जाते तो अमेरिका के पास देने को कुछ नहीं होता।
सबसे पहले फ्रांस ने इस स्थिति को भांपा। 1965 में राष्ट्रपति डि गाल ने डॉलर के बदले सोना हासिल करना शुरू किया। स्विटजरलैण्ड ने इसका अनुकरण किया। फिर अगस्त 1971 में ब्रिटेन 3 अरब डॉलर लेकर पहुंचा और सोने की मांग की। यह वह क्षण था जब अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन को समझ में आ गया कि अब यह व्यवस्था आगे जारी नहीं रह सकती। इसकी पृष्ठभूमि में मौजूद वैश्विक आर्थिक संकट इस व्यवस्था के लिए ताबूत में आखिरी कील बन चुका था। 15 अगस्त, 1971 को निक्सन ने सोने से डॉलर की इस परिवर्तनीयता की समाप्ति की घोषणा कर दी।
इसके बाद एक नया प्रश्न उठ खड़ा हुआ। अगर डॉलर के पास सोने वाले गुण नहीं हैं तो कोई भी वैश्विक व्यापार के लिए भला इसका इस्तेमाल क्यों करेगा? किसी अन्य मुद्रा का इस्तेमाल क्यां नहीं करेगा। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा के रूप में डॉलर की उपयोगिता समाप्त हो जाने पर दूसरे देश अपने रिजर्व में मौजूद डॉलर को बेचने लगते। इससे अमेरिका में भारी मुद्रास्फीति पैदा हो जाती। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा के रूप में डॉलर की भूमिका को बरकरार रखने में 1974 में अमेरिका और साऊदी अरब में हुए एक समझौते ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
इस समझौते के तहत अमेरिका को साऊदी शेखशाही को सैन्य सुरक्षा प्रदान करनी थी। इसके एवज में साऊदी अरब को दो चीजें करनी थीं। पहली, उसे अपने तेल का भुगतान अमेरिकी डॉलर में लेना था। दूसरा, इस आय को अमेरिकी सरकार के बांडों में निवेश करना था। तेल किसी भी देश की अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक है। इसलिए सभी तेल आयातक देश अमेरिकी डॉलर को अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा के रूप में इस्तेमाल करने के लिए बाध्य हुए और उनके द्वारा खर्च किया जाने वाला डॉलर अमेरिकी खजाने में पहुंचता रहा। वैसे तो अमेरिका ने इस तरह का समझौता सिर्फ साऊदी अरब के साथ किया था, लेकिन खाड़ी के अन्य तेल निर्यातक देशों ने भी इस तरीके को ही अपनाया।
यह व्यवस्था पिछले पचास सालों से जारी है। इसे पेट्रोडॉलर व्यवस्था भी कहा जाता है। आज अमेरिका के ऊपर 38.9 ट्रिलियन डॉलर का सरकारी कर्ज है। मगर इसके बावजूद अमेरिकी अर्थव्यवस्था ध्वस्त नहीं हो रही है तो इसमें बड़ी भूमिका इसी पेट्रोडॉलर की व्यवस्था की है। वैश्विक वित्त व्यवस्था पर अमेरिकी वर्चस्व में भी यह पेट्रोडॉलर व्यवस्था अपनी भूमिका निभाता है।
आज पचास साल बाद इस पेट्रोडॉलर व्यवस्था में दरार दिखाई पड़ने लगी है। रूस और चीन अपना तेल व्यापार गैर डॉलर मुद्रा में करने लगे हैं। ब्रिक्स के देशों में यह चर्चा हो रही है कि अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में डॉलर का विकल्प क्या है।
2024 में अमेरिका-साऊदी अरब के समझौते के पचास वर्ष पूरे हो गये हैं। इसके बाद से साऊदी अरब इस समझौते के दायरे से बाहर निकलने का संकेत देने लगा है। पिछले कुछ वर्षों से साऊदी अरब चीन को बेचे जाने वाले तेल का चीनी युआन में भुगतान लेने की बात करने लगा है। ईरान तमाम प्रतिबंधों के बावजूद पेट्रोडॉलर व्यवस्था का हिस्सा बनने को तैयार नहीं हुआ।
आज ईरान पर अमेरिका इजरायल द्वारा थोपे गये युद्ध के पीछे एक कारक पेट्रोडॉलर व्यवस्था पर मंडरा रहे खतरे के बादलों को हटाना है। इसके पहले भी इराक, लीबिया, और वेनेजुएला में ऐसे ही खतरों से निपटने के लिए अमेरिका ने वहां के शासकों को बलपूर्वक हटाया है।
अमेरिकी साम्राज्यवादी जितने ज्यादा असुरक्षित हो रहे हैं उतने ही ज्यादा पगला रहे हैं। आज इनका पागलपन दुनिया की जनता के सामने इनको ज्यादा से ज्यादा बेनकाब कर रहा है।