पिंजरे में कैद चिड़िया -माया एंजलो

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एक आजाद चिड़िया
फुदकती है,
हवा के पंखों पर सवार
और नदी की लहरों पर
बहती हुई उस छोर तक।
अपने परों को
नारंगी सूरज की रोशनी
में डुबोए हुए,
आसमान की ऊंचाईयों में
.....लेती है।

लेकिन पिंजरे में बंद चिड़िया
पिंजरे की सलाखों
के उस पार की दुनिया
देख नहीं पाती।
उसके पर कतरे हुए
और पांव बंधे हुए हैं
इसलिए वह अपने गले को खोलकर गाती है।

वह गाती है
एक डरी हुयी आवाजों में
जिसमें अनजानी चाहतो
की तड़फ सुनाई देती है।
दूर पहाड़ियों में उसकी धुन 
सुनाई देती है
क्योंकि पिंजड़े में बंद चिड़िया
गाती है
अपनी आजादी के लिए।

आजाद चिड़िया
किसी और हवा के बारे में सोचती है।
सुबह की रोशनी में
लार में बिलबिलाते मोटे कीड़े उसके लिए होते हैं
और सारा आसमान 
उसे अपना लगता है।

लेकिन पिंजड़े में बंद चिड़िया 
सपनों के कब्रिस्तान में 
सांस ले रही है।
दुस्वप्न के चीख की तरह
उसकी छाया चीत्कार करती है।
उसके पर कतरे हुए 
और पैर बंधे हुए हैं,
इसलिए वह गला खोलकर गाती है
वह आजादी के लिए गाती है।
(अंग्रेजी से अनुवाद : चन्द्रमाध मिश्र 
साभार : कविता कोश)

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