राजनीति

गहराता सामाजिक आर्थिक संकट और ‘काकरोच जनता पार्टी’

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जैसा कि तय ही था कि जैसे ही पांच राज्यों में चुनाव निपटेंगे वैसे ही गैस, पेट्रोल-डीजल के दामों में आग लगेगी और महंगाई आसमान छूने लगेगी। मई माह के दूसरे पखवाड़े में पेट्रोल-डीजल सौ रुपये प्रति लीटर या उससे भी ज्यादा तक जा पहुंचे। बढ़ती महंगाई के बीच देश का आर्थिक संकट गहराता गया है और उसके साथ सामाजिक संकट भी गहरा रहा है। और इस गहराते सामाजिक संकट ने समाज के हर वर्ग और तबके को मजबूर कर दिया है कि वह अपनी प्रतिक्रिया दे।

पहली बार त्रासदी दूसरी बार प्रहसन

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आज से ठीक पंद्रह साल पहले गर्मियों में तथाकथित अन्ना हजारे आंदोलन शुरू हुआ था जिसने देश के लाखों-लाख युवाओं को उद्वेलित किया था। वो युवा इस उम्मीद से इस आंदोलन से जुड़े थे

बेचारे मेहनती वफादार संघी!

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9 मई को पं.बंगाल का नया मुख्यमंत्री एक पूर्व कांग्रेसी, एक पूर्व तृणमूली बन चुका है। इस आदमी का नाम शुभेन्दु अधिकारी है। इससे पहले असम का मुख्यमंत्री एक पूर्व कांग्रेसी ह

चाटुकारिता की हद है यह

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पिछले दिनों अमेरिकी सरगना डोनाल्ड ट्रम्प ने माइकल सैवेज की एक टिप्पणी सोशल मीडिया पर साझा की। यह टिप्पणी अमेरिका में पैदायशी नागरिकता के कानून का विरोध करते हुए की गयी थी

आप में फूट: भाजपा का काला कारनामा

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अब भाजपा के काले कारनामों का ताजा शिकार आम आदमी पार्टी (आप) बनी है। आप के राज्यसभा के दस सांसदों में से सात सांसदों ने भाजपा का दामन थाम लिया है। राघव चड्ढा जो कल तक भाजप

महिला आरक्षण - परिसीमन और हड़बड़ी

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मोदी सरकार की कार्यशैली ही ऐसी हो गयी है कि उसे जनता को आश्चर्य में डालने व तंग करने में मजा आने लगा है। नोटबंदी, लॉकडाउन सरीखे फैसले अचानक घोषित कर सरकार ने जनता को भारी

रुख से उनके परदा हटता जाये है

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‘संस्कारी पार्टी’ के संस्कार रिस-रिस कर बाहर आ रहे हैं। कुछ मामले पूरी नग्नता से दिखने लगे हैं। कुछ पर परदा या सस्पेंस बना हुआ है। ताजा मामला महाराष्ट्र की महिला आयोग की

नीतिश कुमार और राज्यसभा

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बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने जैसे ही राज्यसभा चुनाव के लिए पर्चा दाखिल किया वैसे ही बिहार की राजनीति एक बार फिर चर्चा में आ गयी। कयास लगाये जाने लगे कि भाजपा ने बा

56 इंच का सीना पर रीढ़ की हड्डी गायब

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बीते दिनों एक के बाद एक कई ऐसी खबरें आयीं जिससे सबको यह महसूस होने लगा कि भारत के 56 इंची सीना वाले नेता की रीढ़ की हड्डी गायब हो गयी है। ईरान पर अमेरिकी-इजरायल हमले से पह

खेल और खेला

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पिछले दिनों प्रधानमंत्री मोदी द्वारा बताया गया कि पश्चिम बंगाल में भारत के राष्ट्रपति का अपमान किया गया। उन्होंने तल्ख शब्दों में राष्ट्रपति के कथित अपमान की निन्दा की। प

आलेख

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अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

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भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

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उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

/titali-effect-kuch-itihaas-se-kucha-vartaman-mein

तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

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वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?