रस्मी आयोजन को वास्तविक संघर्ष में बदलने की जरूरत

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20 मई की आम हड़ताल

20 मई 2025 को केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फेडरेशनों ने देशव्यापी आम हड़ताल का आह्वान किया है। मजदूर विरोधी 4 श्रम संहिताओं और मजदूर हितों से जुड़े अन्य मुद्दों को लेकर यह आम हड़ताल बुलायी गयी है। संघ-भाजपा से जुड़ी बीएमएस इस हड़ताल से दूर है। सीटू, एटक, इंटक, एच एम एस, एल पी एफ, एक्टू, टी यू सी आई सरीखे केन्द्रीय मजदूर संगठनों ने इस हड़ताल का आह्वान किया है। अन्य तमाम स्वतंत्र यूनियनों, बैंक-बीमा-रेलवे की यूनियनों-राज्य कर्मचारियों के संगठनों आदि ने हड़ताल का समर्थन किया है। 
    
देश में बढ़ रहे फासीवादी हमले का देश का मजदूर वर्ग सर्वाधिक शिकार हुआ है। उसके शोषण को लगातार बढ़ाने के लिए एक के बाद एक हमले बोले जा रहे हैं। मजदूर विरोधी 4 श्रम संहितायें मजदूर वर्ग पर शासकों की ओर से बोला गया सबसे संगठित हमला हैं। इसीलिए इस हमले के खिलाफ सबसे तीखे प्रतिरोध की आवश्यकता वक्त की मांग है। वक्त की मांग है कि मजदूर वर्ग किसानों के देशव्यापी लम्बे संघर्ष से प्रेरणा ले और अपने संघर्ष के दम पर श्रम संहिताओं के मसले पर फासीवादी शासकों को पीछे हटने को मजबूर कर दे। 
    
प्रश्न यह उठता है कि क्या मजदूर वर्ग में वह काबिलियत, वह ताकत है कि वह निरंकुश शासकों को धूल चटा सके। निश्चित तौर पर मजदूर वर्ग आज भारतीय आबादी का सबसे बड़ा वर्ग है। सबसे बड़ा वर्ग होने के साथ ही वह सबसे क्रांतिकारी वर्ग है। वह किसी भी मुद्दे पर सबसे तीखे-क्रांतिकारी  व निर्णायक तरीके से शासकों को चुनौती दे सकता है। वह बाकी वर्गों-तबकों को भी संघर्ष में खींच कर ला सकता है। 
    
तब फिर ऐसा क्या है कि जो काम किसान अपने आंदोलन के जरिए कर सकते हैं वो आज भारत का मजदूर वर्ग नहीं कर पा रहा है। शासक वर्ग हमले पर हमला बोले जा रहा है और मजदूर वर्ग उसका कोई ठोस प्रत्युत्तर नहीं दे पा रहा है। 
    
इसकी सर्वप्रमुख वजह है मजदूर वर्ग में अपनी क्रांतिकारी विचारधारा से लैस हो देशव्यापी एकजुटता का अभाव। ऐसा नहीं है कि देश में मजदूरों के बड़े या देशव्यापी संगठन नहीं हैं। वे हैं पर वे संघर्ष की, खास तौर पर क्रांतिकारी संघर्ष की राह काफी पहले छोड़ चुके हैं। वे पूंजीवादी व्यवस्था को खत्म कर समाजवाद कायम करने के संघर्ष को छोड़ चुके हैं। वे पूंजीवादी व्यवस्था के दायरे में ही मजदूरों को कुछ राहत दिलाने-कुछ आर्थिक मुद्दे उठाने और उन पर संघर्ष की खानापूरी में लीन हो चुके हैं। इसीलिए वे साल दर साल मजदूरों के मुद्दों पर रस्मी हड़ताल आयोजित करते हैं और शासकों पर न के बराबर या बेहद कम दबाव कायम कर पाते हैं। उनमें किसानों की तरह दिल्ली बार्डर पर डेरा डाल लेने या ऐसे संघर्ष का माद्दा खत्म हो चुका है जो सत्ता को झुका सके। वे तो सालाना हड़ताल को भी रस्म अदायगी के कार्यक्रम में बदलने पर उतारू हैं। निजी क्षेत्र के कारखानों में हड़ताल कराने से बचना, उद्योगों में हड़ताल से बचना, केवल सरकारी क्षेत्र के कर्मचारियों के कुछ रस्मी आयोजन आदि इसके प्रमाण हैं। 
    
दूसरी वजह मजदूर वर्ग का अपनी क्रांतिकारी विचारधारा से लैस न होना, अपनी ताकत का अहसास व अपने क्रांतिकारी लक्ष्य से परिचित न होना है। केन्द्रीय फेडरेशनों ने जो दिखावे के बतौर क्रांति का नाम भी लेती हैं, उन्होंने मजदूर वर्ग को क्रांतिकारी सिद्धान्तों-विचारधारा-राजनीति पर खड़ा करने का काम खुद के पतित होने के साथ ही त्याग दिया है। इसके चलते इनके झण्डे तले लामबंद मजदूर भी अपनी नौकरी बचाने, कुछ आर्थिक मुद्दे साधने की कवायद में जुटता गया है। ऐसे में मजदूर वर्ग की क्रांतिकारी संभावनाओं, क्रांति में उसकी नेतृत्वकारी भूमिका, समाज में उथल-पुथल पैदा करने की अपनी क्षमता व क्रांति की विचारधारा इन सबसे वह दूर हो चुका है। और आज रस्मी संघर्ष से भी किनाराकशी करने लगा है। इसके लिए निश्चय ही मजदूर नहीं उनका पतित हो चुका नेतृत्व दोषी है। 
    
इन हालातों में वक्त की मांग है कि मजदूर वर्ग अपनी उपरोक्त दोनों कमियों को दूर कर शासक वर्ग के सम्मुख क्रांतिकारी चुनौती पेश करे। अन्यथा शासकों का शोषण-उत्पीड़न उसका जीवन दूभर करता चला जायेगा। 
    
20 मई की आम हड़ताल के मौके पर जरूरत है कि केन्द्रीय ट्रेड यूनियन फेडरेशनों के रस्मी आह्वान को वास्तविक संघर्ष में बदला जाये। मजदूरों को हर शहर-हर फैक्टरी-गांव देहात-दफ्तरों-दुकानों सब जगह लामबंद किया जाये और सड़कों पर उतरा जाये। केन्द्रीय फेडरेशनों के चरित्र का भण्डाफोड़ करते हुए उन्हें क्रांतिकारी राजनीति और देशव्यापी एकजुटता की ओर बढ़ाया जाये। कहने की बात नहीं कि क्रांतिकारी पार्टी व मजदूरों का क्रांतिकारी ट्रेड यूनियन सेण्टर बना कर ही मजदूरों को संघर्ष की ओर बढ़ाया जा सकता है। जो भी क्रांतिकारी ताकतें क्रांतिकारी संघर्ष में लगी हैं उन्हें मजदूर वर्ग पर, उसकी संघर्ष की क्षमता पर भरोसा कर इस दिशा में पूरा जोर लगाना चाहिए। मजदूर वर्ग को उसकी विचारधारा पर खड़ा करने व वर्ग के बतौर उसे एकजुट करने में अपनी सारी मेधा लगानी चाहिए। जगह-जगह फूट रहे मजदूरों के स्वतः स्फूर्त संघर्ष इस उम्मीद को जगाते हैं कि मजदूर लम्बी खामोशी के बाद शासकों को शीघ्र ही अपना प्रत्युत्तर पेश करेंगे। 
    
20 मई की आम हड़ताल को शासकों को प्रत्युत्तर का शुरूआती दिन बनाने के लिए पूरे प्रयास किये जाने चाहिए। 

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