आतंक की राजनीति और राजनीति का आतंक

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पहलगाम की आतंकी घटना के बाद देश के पूंजीवादी दायरों से लगातार यह बात आ रही है कि इस पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। सब लोगों को आपसी मतभेद भुलाकर एक साथ खड़ा होना चाहिए और सरकार का साथ देना चाहिए। सरकारी पक्ष से तो यह भी कहा जा रहा है कि इस पर सरकार से जो भी सवाल बनते हों वे बाद में पूछे जाने चाहिए, इस समय नहीं। 
    
वर्तमान सरकारी पक्ष के दुर्भाग्य से अतीत में उनका खुद का व्यवहार ऐसा नहीं रहा है। उन्होंने और इस समय उनके भोंपू बने पूंजीवादी प्रचारतंत्र ने 2008 के मुंबई आतंकी हमले के समय उस समय की सरकार से खूब सवाल पूछे थे। तब के गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो गेट वे आव इण्डिया पर जाकर प्रेस वार्ता ही कर डाली थी। सवालों के जरिये इन्होंने तब देश के गृहमंत्री और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का इस्तीफा ले लिया था। 
    
2008 और 2025 का फर्क ही यह बताने के लिए पर्याप्त है कि ‘आतंकी घटना पर राजनीति नहीं होनी चाहिए’ का जुमला स्वयं एक खास तरह की राजनीति से पैदा होता है जो नागरिकों और विपक्ष से मांग करती है कि वे सरकार पर सवाल न खड़ा करें। वे सरकार से जवाबदेही न मांगें। यह प्रकारांतर से सरकार को जवाबदेही से मुक्त करने की मांग है। यह एक अधिनायकवादी या फासीवादी मांग है जो सरकार और राज्यसत्ता को असीमित अधिकार दे देती है और उसी अनुपात में नागरिकों को अधिकार विहीन बना देती है। 2008 व 2025 के बीच के फर्क का सारतत्व यही है। 
    
राजनीति शास्त्र का एक अदना सा विद्यार्थी भी यह जानता है कि आतंकवाद एक खास किस्म की राजनीति है जो अपने राजनीतिक लक्ष्यों को आतंक के जरिए हासिल करने का प्रयास करती है। आतंकवाद कोई गैर राजनीतिक चीज नहीं है बल्कि यह विशुद्ध राजनीतिक है। इसीलिए ‘आतंकवाद पर राजनीति नहीं होनी चाहिए’ का जुमला या तो एकदम बेमानी है या फिर हद दर्जे की कुटिल राजनीति। 
    
आज जिन कार्रवाईयों को आतंकवाद की श्रेणी में रखा जाता है उनकी शुरूवात उन्नीसवीं सदी में हुई। यहां आशय व्यक्तिगत आतंकवाद से है जिन्हें किसी संगठन के सदस्य अकेले या छोटे-छोटे समूहों में अंजाम देते हैं। रूस में क्रांतिकारी नरोदवादी आंदोलन तथा उत्तरी आयरलैण्ड में आयरिश रिपब्लिकन आर्मी ने इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया। पहले का उद्देश्य था रूस में जारशाही तथा सामंतवाद को खत्म कर जनता का राज कायम करना तो दूसरे का उद्देश्य था इंग्लैण्ड के कब्जे से खुद को आजाद करना। स्पष्ट है कि दोनों का लक्ष्य राजनीतिक था। 
    
क्रांतिकारी संगठनों द्वारा इस तरह के आतंकवाद में आम जनों को निशाना नहीं बनाया जाता था। उनका निशाना हमेशा सरकार और सत्ता के लोग होते थे- पुलिस व सेना के अफसर, नौकरशाही के अफसर या फिर मंत्री, प्रधानमंत्री, गवर्नर, राजा, इत्यादि। रूस में तो नरोदवादियों ने एक जार की हत्या करने में सफलता हासिल कर ली थी। इनके द्वारा अंजाम दी जाने वाली घटनाओं में यदि आम जन मारे जाते थे तो दुर्घटनावश। 
    
क्रांतिकारी संगठनों द्वारा अंजाम दी जाने वाली इन घटनाओं का न केवल स्पष्ट राजनीतिक उद्देश्य होता था बल्कि उसके पीछे एक राजनीतिक सोच भी होती थी। यह सोच मानती थी कि आतंकी घटनाओं से आतंकित होकर या तो शोषक-उत्पीड़क पीछे हट जायेंगे या फिर इनके प्रभाव में आम जनता शोषकों-उत्पीड़कों के खिलाफ उठ खड़ी होगी। कुछ लोगों की बेहिसाब बहादुरी तथा उसके सामने शोषितों-उत्पीड़कों की कमजोरी आम जनता को उठ खड़े होने के लिए प्रेरित करेगी। 
    
रूस में जब मजदूर आंदोलन खड़़ा हुआ तथा उसका नेतृत्व करने वाली रूसी सामाजिक जनवादी मजदूर पार्टी बनी तो उसने साफ तौर पर घोषित किया कि वह एक रणकौशल के तौर पर आतंकवाद को अस्वीकार करती है। शोषकों-उत्पीड़कों के खिलाफ आम जनता के खड़े होने के लिए शोषण-उत्पीड़न की तमाम स्थितियां ही प्रेरक के तौर पर पर्याप्त हैं। जरूरत है आम जनता को उन पर उद्वेलित कर गोलबंद करने की। आतंकवादी कार्रवाईयां आम जनता की सक्रियता को कुछ बहादुर लोगों की कार्रवाइयों से प्रस्थापित कर उसे हतोत्साहित करती हैं। वह केवल ताली बजाने वाली दर्शक में रूपान्तरित हो जाती है। यह क्रांतिकारी संगठनों की ऊर्जा का अपव्यय भी है जो जन गोलबंदी में लगने के बदले आतंकवादी कार्रवाइयों की योजना और अंजाम में लगती है। जहां तक शोषकों-उत्पीड़कों के डर कर पीछे हटने की बात है, ऐसा नहीं होता। राज्य सत्ता में तमाम लोग पहले वालों की जगह लेने को तैयार होते हैं। 
    
रूस की मजदूर पार्टी द्वारा व्यक्तिगत आतंकवाद को एक रणकौशल के रूप में अस्वीकार कर दिये जाने के बाद भी उसे सिद्धान्त रूप में नहीं नकारा गया। यानी आतंकवाद अपने आप में गलत या खराब है अथवा अनैतिक है, यह नहीं कहा गया। इसका मतलब यह था कि क्रांति की पूरी प्रक्रिया में कभी आतंक का इस्तेमाल किया जा सकता था। खासकर क्रांति के समय और उसके बाद शोषकों-उत्पीड़कों को दबा कर रखने के लिए तो यह जरूरी हथियार था जो नयी क्रांतिकारी सत्ता द्वारा इस्तेमाल किया जाता था। महान फ्रांसीसी क्रांति के दौरान 1793-94 के ‘आतंक का राज्य’ का उदाहरण सबके सामने था जिसके जरिये ही सामंतवाद विरोधी पूंजीवादी क्रांति अपनी परिणति तक पहुंची थी। यदि ‘आतंक का राज्य’ नहीं होता तो महान फ्रांसीसी क्रांति वह सब हासिल नहीं कर पाती जो उसने किया। 
    
अपने देश में बीसवीं सदी की शुरूआत में ब्रिटिश राज के खिलाफ रूसी और आयरिश तर्ज पर ही एक क्रांतिकारी आतंकवादी आंदोलन पैदा हुआ जिसने ब्रिटिश अफसरों को निशाना बनाया। लगभग चौथाई सदी तक अलग-अलग धाराओं में चलने के बाद इसकी एक प्रमुख धारा ने भगत सिंह के नेतृत्व में व्यक्तिगत आतंकवाद का रास्ता छोड़ने तथा जन गोलबंदी का रास्ता अपनाने का फैसला किया। भगत सिंह ने बाद में कहा कि वे अपने शुरूआती क्रांतिकारी दिनों के अलावा कभी आतंकवादी नहीं रहे। भारत के क्रांतिकारी आतंकवादी आंदोलन में भगत सिंह का योगदान ही यही था कि उन्होंने क्रांतिकारी आंदोलन का लक्ष्य ब्रिटिश गुलामी से मुक्ति को आगे बढ़ाकर मजदूरों-किसानों का राज और साम्यवाद तक विस्तारित कर दिया और इसको हासिल करने के रास्ते के तौर पर व्यक्तिगत आतंकवाद के बदले मजदूरों-किसानों की जन-गोलबंदी कर दिया। भगत सिंह स्वयं व्यवहार में इस ओर बढ़ ही रहे थे कि अंग्रेजी राज द्वारा फांसी पर चढ़ा दिये गये।
    
आज आम लोगों द्वारा आतंकवाद को जिस रूप में देखा जाता है वह मुख्यतः बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध की परिघटना है यानी आतंकवादियों द्वारा आम जनता को निशाना बनाया जाना। आतंकवाद का मूल चरित्र वही रहता है यानी आतंक के जरिए अपना राजनीतिक लक्ष्य हासिल करना। पर अब राज्य सत्ता के लोगों के बदले आम जनता को निशाना बनाया जाने लगता है जिससे समाज में दहशत कायम हो और राज्यसत्ता पर दबाव बने। राज्यसत्ता के बदले आम जनता को निशाना बनाना हमेशा ज्यादा आसान होता है। खासकर जब राज्यसत्ता ने अपने कारकूनों की रक्षा के लिए क्रमशः कड़े से कड़े सुरक्षा इंतजाम कर लिए तो उनको निशाना बनाना बहुत कठिन हो गया। ऐसे में आतंकवादी संगठनों ने आसान रास्ता चुना और आम जनता को निशाना बनाना शुरू किया। 
    
इसी के साथ एक दूसरी परिघटना भी सामने आई। वह यह थी कि सत्ता विरोधी संगठनों के साथ स्वयं राज्यसत्ता ने भी व्यक्तिगत आतंकवाद का इस्तेमाल करना शुरू किया। यह अपने देश के भीतर और दूसरे देशों में सब जगह किया गया। संयुक्त राज्य अमेरिका की राज्यसत्ता इसमें सबसे आगे रही। 
    
दूसरे विश्व युद्ध के बाद ‘शीत युद्ध’ के जमाने से ही अमरीकी राज्यसत्ता ने व्यक्तिगत आतंकवाद का सहारा लिया। देश के भीतर मार्टिन लूथर किंग जूनियर तथा मैलकम एक्स की हत्या इसी का परिणाम थी। राष्ट्रपति केनैडी तथा उनके भाई राबर्ट केनैडी की हत्या को भी इसी श्रेणी में रखा जा सकता है। देश के बाहर तो अमेरिकी राज्यसत्ता ने न जाने कितने जाने-माने लोगों की हत्या की या कराई। पैट्रिस लुमुंबा से लेकर अलेन्दे तक इनकी लम्बी कतार है। फिदेल कास्त्रो की हत्या की तो न जाने कितनी कोशिशें हुईं। 
    
1980 तक अमरीकी साम्राज्यवादियों द्वारा की जाने वाली इन आतंकी कार्रवाईयों को फुटकर आतंकवाद की श्रेणी में रखा जा सकता है। पर उसके बाद उनका थोक का आतंकवाद शुरू हुआ। उन्होंने 1980 के दशक में अफगानिस्तान में सोवियत संघ से निपटने के लिए जिहादी आतंकवादियों की एक पूरी फौज खड़ी की। आज सारी दुनिया में जो भांति-भांति के इस्लामी जिहादी आतंकी हैं उनका मूल स्रोत वह फौज ही है। सभी की जड़ों को वहां तलाशा जा सकता है। आज भी अमेरिकी साम्राज्यवादी इसमें लगे हुए हैं। आई एस आई एस इन्हीं का खड़ा किया हुआ था। 
    
अमरीकी साम्राज्यवादी और उनकी राज्यसत्ता तो एक उदाहरण भर हैं। इन्हीं की तर्ज पर दूसरे देशों की राज्यसत्ता भी आतंकवादियों को थोक या फुटकर के भाव पाल पोष रही है। इनका इस्तेमाल देश के भीतर या बाहर सब जगह किया जाता है। इस्राइल और ईरान वैसे तो दुश्मन हैं पर दोनों इस मामले में काफी आगे हैं, खासकर इस्राइल। आज हमास और हिजबुल्ला को ईरान का समर्थन है पर एक समय इन्हें खड़ा करने का श्रेय इस्राइल और अमेरिका को ही दिया जाता है। इसी तरह भारत और पाकिस्तान दोनों देशों की सरकारों द्वारा एक-दूसरे पर आतंकवादी संगठनों को पालने-पोषने का आरोप लगाया जाता है। कुछ समय पहले बलूचिस्तान में आतंकवादी घटना के मामले में पाकिस्तान सरकार ने औपचारिक तौर पर भारत सरकार पर आरोप लगाया था और अब पहलगाम मामले में भारत सरकार द्वारा पाकिस्तान सरकार पर आरोप लगाया जा रहा है। एक आरोप को सही और दूसरे को गलत मानने का कोई कारण नहीं है, बशर्ते कोई अंधराष्ट्रभक्त न हो। 
    
अंत में स्वयं सरकारों द्वारा की जाने वाली आतंकी कार्रवाईयों पर बात किये बिना बात अधूरी रहेगी। इसे राज्यसत्ता का आतंक कहा जा सकता है। यह सरकारों द्वारा फुटकर या थोक आतंकवादियों को पालने-पोषने से अलग है जो गुपचुप किया जाता है। राज्यसत्ता का आतंक खुली चीज होता है जिसे सबकी आंखों के सामने सुरक्षा बलों द्वारा अंजाम दिया जाता है। कश्मीर में पिछले पैंतीस सालों से यही हो रहा है। बलूचिस्तान में पिछले सालों में यही होता रहा है। म्यांमार में रोहिंग्या इलाके में यही हो रहा है। राज्यसत्ता चूंकि स्वयं को बल प्रयोग करने की वैधानिक संस्था मानती है, इसलिए वह अपने आतंक को जायज और जरूरी बताती है। पर यही तो ब्रिटिश हुकूमत भी आजादी के पहले करती थी जिस वजह से उसने जलियांवाला बाग हत्याकांड को भी जायज ठहराया था। 
    
यदि लोगों पर असर के हिसाब से देखा जाये तो राज्यसत्ता का आतंक सबसे बड़ा होता है। थोक या फुटकर आतंकवाद के शिकार तो सैकड़ों-हजारों में ही होते हैं पर राज्यसत्ता के आतंक के शिकार लाखों-करोड़ों में होते हैं। पर यह आतंक की राजनीति ही है कि आतंकवाद के सिलसिले में सारी बात व्यक्तिगत आतंकवाद की होती है, राज्यसत्ता के आतंकवाद की नहीं। उसे तो बस राज्यसत्ता की वैधानिक कार्रवाई मान लिया जाता है और इस तरह जायज ठहरा दिया जाता है। 
    
यहीं से आतंकवाद को लेकर की जाने वाली राजनीति पर आया जा सकता है। आज आतंकवाद का हौव्वा सरकारों का एक सबसे बड़ा हथियार है जिसके जरिए देश के भीतर और बाहर तमाम जायज-नाजायज गतिविधियां अंजाम दी जा रही हैं। जैसा कि पहले कहा गया है, दुनिया भर के इस्लामी जिहादी आतंकवादियों को खड़ा करने का श्रेय अमरीकी साम्राज्यवादियों को है। पर आज वे इन्हीं के हौव्वे का इस्तेमाल कर अपनी ढेर सारी नापाक गतिविधियां अंजाम दे रहे हैं। इस हौव्वे को खड़ाकर उन्होंने स्वयं अमेरिकी नागरिकों के ढेरों नागरिक अधिकार छीन लिये। उन्हें सरकारी निगरानी में जीने को मजबूर कर दिया। इस हौव्वे के जरिये उन्होंने ढेरों देशों पर हमले किये हैं तथा उन्हें तबाह किया है। आज दुनिया भर में उनके साम्राज्यवादी हमले अक्सर इसकी आड़ में किये जा रहे हैं। 
    
यही उनका लठैत इस्राइल भी कर रहा है। वह पश्चिम एशिया में अपनी सारी नाजायज गतिविधियां इस्लामी आतंकवाद विरोध के नाम पर कर रहा है। वह यह अमरीकी साम्राज्यवादियों की शह और मदद से कर रहा है। 
    
दुनिया के अन्य देशों की सरकारें भी इनकी देखा-देखी यही कर रही हैं। भारत सरकार भी पिछले तीन-चार दशक से यही कर रही है। भारत में यह सिलसिला 1980 के दशक से सिख आतंकवाद से शुरू हुआ था जो 1990 के दशक से इस्लामी आतंकवाद पर स्थानांतरित हो गया। 1980 के दशक में देश के सारे सिख देशद्रोही थे, अब सारे मुसलमान देशद्रोही हैं। तब आतंकवादियों की कार्यस्थली पंजाब था, अब कश्मीर है। हां, आतंकवादियों का समर्थक तब भी पाकिस्तान सरकार थी, अब भी पाकिस्तान सरकार है। देश के भीतर तब भी सत्ता पक्ष अपनी अंदरूनी राजनीति के लिए इसे इस्तेमाल करता था, अब भी कर रहा है। और यह करते हुए वह जोर-शोर से नारा लगाता है कि आतंकवाद पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। 
    
यह राजनीति का आतंक है जिसके जरिये सारी जनता को एक खास दिशा में हांका जा रहा है। इसके द्वारा न केवल कुछ नेताओं और पार्टियों द्वारा अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं पूरी की जा रही हैं बल्कि समूचे पूंजीपति वर्ग के हित में कुछ चीजों को हासिल किया जा रहा है। आतंकवाद के हौव्वे से डरी-सहमी जनता अपनी सुरक्षा की खातिर अपनी निजता को खुद ही त्यागने को तैयार है। वह खुद ही अपने जनवादी अधिकारों को छोड़ने को तैयार है। ऐसे में पूंजीपति वर्ग द्वारा उसका और ज्यादा शोषण आसान हो जाता है। इस शोषण का विरोध करने पर राज्यसत्ता द्वारा उत्पीड़न और आसान हो जाता है। 
    
इससे भी आगे आतंकवाद के हौव्वे से डरे-सहमे लोग सरकार के सामने खड़े होने के बदले उसके पीछे सिमटते हैं। सरकार उनकी उत्पीड़क के बदले माई-बाप नजर आने लगती है। नेता काईयां, स्वार्थी और धोखेबाज के बदले उद्धारक नजर आने लगते हैं। राज्ससत्ता और नेताओं-पार्टियों को और क्या चाहिए? पूंजीपति वर्ग के लिए इससे अच्छी चीज क्या होगी?
    
इस सबसे मुक्ति का एक ही रास्ता है। वह यह है कि इस बात को भली-भांति समझा जाये कि आतंकवाद एक राजनीति है। और फिर मुक्तिबोध की तरह पूछा जाये कि पार्टनर तुम्हारी राजनीति क्या है?  

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