ट्रम्प का विज्ञान विरोधी प्रलाप

/trump-kaa-science-virodhi-pralaap

बीते दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने व्हाइट हाउस में ऑटिज्म पर आयोजित एक प्रेस कांफ्रेंस में अपना घोर विज्ञान विरोधी वक्तव्य दिया। ऑटिज्म पैदाइशी एक ऐसी अवस्था है जिसमें तंत्रिका तंत्र में कुछ बदलावों के चलते व्यक्ति को सामाजिक संवाद, दूसरों से बातचीत, सीखने और व्यवहार करने में चुनौती का सामना करना पड़ता है। यह आजीवन कायम रहने वाली स्थिति है जिसका इलाज संभव नहीं है। 
    
ऑटिज्म के कारणों का अभी पूरी तरह पता नहीं है। हालांकि इसे जीनोम के बदलाव से जोड़ा जाता है। इसी तरह टीकाकरण विरोधी लोग गर्भावस्था में मां को लगने वाले टीकों, दर्द निवारक दवाओं व बच्चे को टीके से ऑटिज्म को जोड़ते रहे हैं। वैज्ञानिक शोधों में अभी तक इन दवाओं-टीकों का ऑटिज्म से कोई सम्बन्ध स्थापित नहीं हुआ है। पर आधुनिक चिकित्सा विज्ञान विरोधी कूपमण्डूक व दक्षिणपंथी धार्मिक कट्टरपंथी इस तरीके के तर्क आज भी देते फिरते हैं। ट्रम्प भी अपने सम्बोधन में उपरोक्त कूपमण्डूक बातों का समर्थन करते नजर आये। 
    
अपने वक्तव्य में ऑटिज्म के व्यापक प्रसार को समस्या के रूप में पेश करते हुए इसके लिए टीकों व दर्दनिवारक दवाओं को दोषी ठहराया व गर्भावस्था में ससटामिनोफेन या टाइलेनाल सरीखी दर्द-ज्वर नाशक दवाओं को न लेने की अपील की। इस तरह ऑटिज्म के बहाने ट्रम्प ने बच्चों के टीकाकरण अभियान पर विभ्रम की स्थिति पैदा कर दी। ट्रम्प के साथ इस प्रेस वार्ता में स्वास्थ्य एवं मानव सेवा (एचएचएस) सचिव राबर्ट एफ कैनेडी जूनियर व अन्य अधिकारी मौजूद थे। 
    
ट्रम्प के इस मूर्खतापूर्ण प्रलाप के पीछे एक सोची समझी सोच व नीति कार्य कर रही है। इस प्रचार से ट्रम्प अमेरिकी समाज में यह स्थापित करना चाहते हैं कि ऑटिज्म के शिकार बच्चों के लिए उनके माता-पिता द्वारा ली गयी दवायें व टीके जिम्मेदार हैं। यानी ऑटिज्म के लिए दरअसल मां-बाप दोषी हैं। ऐसे में यदि मां-बाप जानबूझकर ऑटिज्म वाले बच्चे पैदा कर रहे हैं तो ऐसे बच्चों की सहायता का खर्च सरकार क्यों उठाये। इसी के साथ ट्रम्प जानते हैं कि अगर उनके इस प्रलाप से एक छोटी आबादी भी टीका नहीं लगवाती तो राज्य टीका लगाने के खर्च को कम कर सकता है। गौरतलब है कि ट्रम्प ने स्वास्थ्य समेत कई कल्याणकारी मदों में खर्च कटौती से लेकर लोगों को नौकरी से निकालने का काम युद्ध स्तर पर शुरू किया हुआ है। 
    
ट्रम्प का यह अवैज्ञानिक प्रलाप तब और खतरनाक हो जाता है जब अमेरिकी दक्षिणपंथियों- फासीवादियों का एक समूह उनके इर्द-गिर्द मौजूद है। यह समूह हिटलर की सुजननिकी को व्यवहार में उतारना चाहता है। सुजननिकी के मतानुसार सभी अपंग, अविकसित, विकृत लोगों से प्रजनन का अधिकार छीन लेना चाहिए, जरूरत पड़े तो उन्हें बधिया करने या मार डालने से नहीं हिचकना चाहिए ताकि केवल स्वस्थ लोग ही स्वस्थ बच्चे पैदा कर सकें। हिटलर द्वारा यहूदी लोगों के साथ-साथ अपंग-अविकसित लोगों को मार डालने व वैज्ञानिक प्रयोग हेतु उनका इस्तेमाल करने की छूट दी गयी थी। वक्त के साथ आधुनिक वैज्ञानिक शोधों ने सुजननवादी विचारधारा को गलत साबित कर दिया था पर दक्षिणपंथी हलकों में इसका बोलबाला किसी न किसी रूप में बना रहा। आज दक्षिणपंथी-फासीवादी ताकतों के उभार के दौर में इसे फिर से समाज में फैलाया जा रहा है। 
    
इसी तरह की सोच से प्रेरित डेविड गेयर व उनके पिता मार्क ने ऑटिज्म के चमत्कारी इलाज के नाम पर सैकड़ों ऑटिज्म के बच्चों को ल्यूप्रान नामक इंजेक्शन देकर उन पर प्रयोग 2000 के दशक में किया। यह प्रयोग उन्होंने यह जानते हुए भी किया कि इससे बच्चे बधिया हो सकते हैं। बाद में मार्क गेयर का मेडिकल लाइसेंस रद्द कर दिया गया व डेविड गेयर पर जुर्माना लगाया गया। पर मौजूदा स्वास्थ्य सेवा सचिव कैनेडी ने डेविड गेयर को ‘वरिष्ठ डेटा विश्लेषक’ बना दिया। हालांकि ऑटिज्म प्रभावित लोगों के डेटा के विश्लेषण के काम को रोक दिया गया पर यह खतरा बना रहा कि इस डेटा की मदद से ऑटिज्म प्रभावित लोगों पर नये प्रयोग कभी भी किये जा सकते हैं। 
    
अमेरिकी समाज में सुजननवादी सोच के लोगों की संख्या व ताकत लगातार बढ़ रही है। फॉक्स न्यूज के एंकर ने हाल में ही बयान दिया कि बीमार बेघर लोगों को ‘‘घातक इंजेक्शन’’ दे देने चाहिए। ट्रम्प सरकार के काल में प्रकारान्तर से अप्रवासियों को चिन्हित कर उन्हें यातना शिविरों-जेलों में डालने का अभियान पहले ही चल रहा है। बाइडेन काल में भी सुजननवादी सोच पैर पसार रही थी। कोविड की एक लहर के दौरान स्वास्थ्य सेवा निदेशक रोशेल वालेंस्की ने घोषणा की थी कि यह खबर ‘‘उत्साहजनक खबर’’ है कि कोविड-19 मुख्य रूप से उन लोगों को मारता है जो ‘‘शुरूआत से अस्वस्थ’’ हैं। इसी तरह 2023 में एंथनी फौसी ने बेशर्मी से घोषणा करते हुए खुशी जाहिर की कि कोविड से वृद्ध, बीमार व विकलांग लोग हाशिए पर चले जायेंगे। 
    
इस तरह मौजूदा अमेरिकी सरकार एक ओर कल्याणकारी मदों में कटौती कर रही है तो दूसरी ओर कूपमण्डूक अवैज्ञानिक धारणाओं को समाज में फैला रही है। वह समाज को उस दिशा में ले जा रही है जहां लोग वृद्धों-बीमारों अपंग लोगों को ‘समस्या’ मानने लग जायें और राज्य इन्हें हिटलर के नक्शेकदम पर चलते हुए प्रयोगों का विषय बना दे। समाज में हिटलर के सुजननवादी विचार फिर से जोर पकड़ रहे हैं। ट्रम्प की इन हरकतों पर विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी भी चुप्पी सा धे हुए है क्योंकि अमेरिकी पूंजीपति वर्ग ही आज दक्षिणपंथी विचारों को पालने-पोसने-फैलाने में अपने हित देख रहा है।   

आलेख

/amerika-ka-iran-par-operation-d-day-hatasha-ka-parinam

अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

/education-and-emplyoment-dasha-aur-durdasha

भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

/cocoroach-saradar-and-samajvadi-janataantrik-morcha

उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

/titali-effect-kuch-itihaas-se-kucha-vartaman-mein

तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

/sadho-thagawa-nagariya-lootal-ho

वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?