बीते दिनों दुनिया की दो प्रमुख साम्राज्यवादी ताकतों अमेरिका व चीन के प्रमुखों का तीन दिवसीय शिखर सम्मेलन अमेरिका में सम्पन्न हुआ। इस शिखर सम्मेलन के लिए कहा गया कि इसमें दिखावे का बोलबाला रहा। यानी दोनों देशों के प्रमुख इस बात का दिखावा करते रहे कि वे आपसी मतभेदों को बातचीत से हल कर लेंगे। साथ में तस्वीर खिंचाने व बातचीत के दिखावे के इतर हकीकत यही रही कि ट्रम्प और शी जिनपिंग की इस वार्ता ने साबित कर दिया कि इनके बीच सहमति कम और टकराव ज्यादा है। और असहमतियां भी दरअसल टकराव के चलते ही क्षणभंगुर ही हैं।
चीनी साम्राज्यवादी आज अमेरिकी साम्राज्यवाद के वैश्विक वर्चस्व को चुनौती देने वाली सर्वप्रमुख ताकत हैं। इनके बीच बीते दिनों छिड़े व्यापार युद्ध ने इनके टकराव को सबके सामने ला दिया था। बाद में दोनों देश अपने होने वाले नुकसान का आकलन कर इस व्यापार युद्ध को कुछ समय तक टालने पर सहमत हुए थे। इस वार्ता में भी यह एक प्रमुख मुद्दा था। जब इस मसले पर किसी खास सहमति तक तत्काल पहुंचना संभव नहीं दिखा तो इस व्यापार युद्ध विराम को दो माह के लिए विस्तारित कर दिया गया।
जहां तक टकराव का प्रश्न है तो दोनों देश इस स्थिति में भी नहीं थे कि कोई संयुक्त वक्तव्य जारी कर पाते। दोनों देशों ने वार्ता के बाद अलग-अलग वक्तव्य जारी किये। यानी ज्यादातर मामलों में ये दोनों साम्राज्यवादी अलग-अलग रुख लिये हुए हैं। व्यापार युद्ध, दुर्लभ मृदा धातुओं का उत्पादन, ए आई, ताईवान, परमाणु हथियार, निवेश, तेल व्यापार आदि विविध मसलों पर इनके बीच स्पष्ट टकराव देखा गया।
जहां तक इस वार्ता की सफलतायें प्रचारित की गयीं तो दोनों शासकों ने यह याद किया कि द्वितीय विश्व युद्ध के जमाने में वे जापान के खिलाफ एक साथ खड़े थे। दोनों राष्ट्रपतियों ने आगामी महीनों में चीन में एपेक बैठक व मियामी में जी-20 सम्मेलन में भाग लेने पर सहमति जताई। दोनों देशों ने परमाणु हथियार क्षमता सीमित करने की जरूरत पर जोर दिया। साथ ही अंतर्राष्ट्रीय जलमार्गों में व्यापार शुल्क लगाने का विरोध किया। चीन ने अमेरिका से कोयला खरीदने का वायदा किया।
सहमतियों के प्रकार देखते हुए कहा जा सकता है कि वे दरअसल सहमति से अधिक दिखावा ही थीं। दोनों साम्राज्यवादी विश्व प्रभुत्व की कलह में इस कदर उलझे हैं कि हर मुद्दे पर एक-दूसरे से टकराव की स्थिति में हैं। ऐसे में कोई भी ताकत दुनिया में चल रहे युद्धों-टकराव आदि के लिए खुद को जिम्मेदार नहीं ठहराना चाहती। इसलिए वे एक-दूसरे से वार्ता के लिए प्रस्तुत दिखा यह दिखावा करती हैं कि वे तो शांति चाहती हैं। वे तो नियम आधारित व्यवस्था चाहती हैं।
आज चूंकि अमेरिकी साम्राज्यवादी अपने वर्चस्व को चाह कर भी नहीं बचा पा रहे हैं। इसलिए वे हैरान-परेशान हो कभी युद्ध तो कभी टैरिफ बढ़ाने जैसे कदम उठा रहे हैं। वहीं चीनी साम्राज्यवादी पर्दे के पीछे से अमेरिका को चुनौती दे अपनी छवि को शांतिप्रिय प्रस्तुत करने में जुटे हैं। इस तरह अमेरिकी साम्राज्यवादी अपनी हरकतों से खुद के ही प्रभाव को और घटाने की ओर ले जा रहे हैं।
पर चीनी साम्राज्यवादी भी अमेरिकी साम्राज्यवाद से कहीं से कम क्रूर-निर्मम व दुनिया की जनता के कम दुश्मन नहीं हैं। वक्त के साथ इनके भी जहरीले खूनी पंजे दुनिया को नजर आने लगेंगे। फिलहाल तो वे अपनी बेल्ट व रोड परियोजना व मालों के निर्यात से अमेरिकी साम्राज्यवाद को कमजोर करने में जुटे हैं।