‘‘विश्व गुरू’’ के मंसूबे के आगे खड़ी फौलादी दीवार

भारत अपने इतिहास के एक खतरनाक मोड़ पर खड़ा है। हिन्दू फासीवाद का खतरा एक ऐसी वास्तविकता बन गया है जिससे आंख चुराना संभव नहीं है। हिन्दू फासीवाद ने भारत की चुनाव प्रणाली का इस्तेमाल अपनी प्रगति के लिए सीढ़ियों की तरह किया है। सत्ता में काबिज होने के बाद उसके मंसूबे ये हैं कि बस किसी दिन वह भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित कर भारतीय पूंजीवादी संसदीय व्यवस्था व लोकतंत्र को समाप्त कर दें। एक पार्टी व एक तानाशाह का शासन जितनी हिन्दू फासीवादियों की चाहत है उतनी ही चाहत भारत के एकाधिकारी घरानों टाटा-अम्बानी-अडाणी की भी हर दिन के साथ बनती जा रही है। इन्हें लगता है कि यदि एक पार्टी का शासन कायम हो जाये तो इनके मुनाफे उस से भी तेज गति से बढ़ेंगे जिस तेज गति से हाल के समय में चीन के साम्राज्यवादियों के बढ़े हैं। असल में इनकी चाहत दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बनने की है। इसको ये अपने शब्दों में ‘‘विश्व गुरू’’ कहते हैं। 
    
‘‘विश्व गुरू’’ मतलब दुनिया की सबसे बड़ी ताकतवर साम्राज्यवादी शक्ति। 
    
साम्राज्यवाद क्या होता है इसे हम अपने औपनिवेशिक अतीत से अच्छी तरह से जानते हैं। हमने ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के शासन काल में अनेकोनेक जलियांवाला बाग हत्याकाण्ड देखे हैं। हमारे हजारों-हजार पूर्वज ब्रिटिश साम्राज्यवाद द्वारा निर्ममतापूर्वक कत्ल कर दिये गये। इनमें किसान, मजदूर, आदिवासी आदि सभी शामिल थे। और जब हमने अकूत बलिदानों से आजादी हासिल की तो हमें खण्डित आजादी मिली। देश दो हिस्सों में बंट गया। और आजादी के समय देश रक्त से सन गया। लाखों लोग मारे गये और लाखों को ऐसे जख्म मिले जो उनके जीते जी कभी न भर सके। 
    
भारत खुदा न खास्ता कभी विश्व गुरू बन गया तो क्या वह ब्रिटिश या अमेरिकी या फ्रांसीसी या जापानी साम्राज्यवाद से भिन्न होगा। वह देश और दुनिया दोनों के लिए इन्हीं साम्राज्यवादियों की तरह कलंक होगा। नई साम्राज्यवादी शक्ति के रूप में उभरे चीनी साम्राज्यवादी शासकों के हाथ अपने देश के मजदूरों-मेहनतकशों व धार्मिक व राष्ट्रीय अल्पसंख्यकों के खून से सने हुए हैं। क्यों उसकी बढ़ती सैन्य शक्ति भविष्य में वैसे ही गुल नहीं खिलायेगी जैसे गुल अमेरिकी साम्राज्यवादियों ने पूरी दुनिया में खिलाये हैं। भारत का विश्व गुरू बनना भारत के ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के मजदूरों-मेहनतकशों के खिलाफ जायेगा। शांति, अहिंसा, मानवता की बातों को विश्व गुरू अपने बूटों तले रौंदेगा। 
    
भारत एक साम्राज्यवादी शक्ति भविष्य में बन सकता है या नहीं, यह सवाल एक अलग विषय है परन्तु भारत के वर्तमान शासकों का जोर चले तो वे यह काम तत्काल ही चाहते हैं। और इसकी पहली शर्त के रूप में वे भारत के मौजूदा लोकतंत्र को एकतंत्र में बदलना चाहते हैं। ‘एक देश-एक विधान’ जैसे नारे इसी मंशा को व्यक्त करते हैं। 
    
वर्तमान आम चुनाव भारत के पूंजीवादी राजनैतिक इतिहास के अब तक के सभी आम चुनावों से इस मामले में विशिष्ट बन जाता है कि यह देश के सामाजिक जीवन में बहुत गहरा असर डालने वाला है। हिन्दू फासीवादियों की निर्णायक जीत इनके हौंसले बुलंद करेगी। हार या छोटी-मोटी जीत इन्हें सामाजिक आइना दिखलायेगी। इनकी जीत जितनी बड़़ी सामाजिक उथल-पुथल पैदा करेगी तो इनकी हार समाज में हिंसा के एक नये दौर को जन्म देगी। और ऐसा तब तक होता ही रहेगा जब तक इनका सामाजिक अस्तित्व रहेगा। इन अर्थों में इनकी चुनावी जीत व हार से भारत के वर्तमान समाज में इनके द्वारा पेश की गयी फासीवादी चुनौती जस की तस बनी रहेगी।     
    
यह एक सच्चाई है कि भारत का वर्तमान दुनिया में ‘‘विश्व गुरू’’ बनने का रास्ता फासीवादी रास्ते से होकर ही जाता है। ‘‘विश्व गुरू’’ या विकसित भारत बनाने का भारत के शासकों के अंधे लक्ष्य का मतलब भारत के मजदूरों, किसानों व अन्य मेहनतकशों का चरम-निर्मम शोषण व भारत के प्राकृतिक संसाधनों का तेजी से दोहन है। भारत के मजदूर, किसानों के शोषण व प्राकृतिक संसाधनों के दोहन की बुनियाद पर ही भारत विश्व गुरू बन सकता है। और ऐसा करने के लिए भारत के शासकों को किसी न किसी किस्म की खुली, आतंकी तानाशाही कायम करनी पड़ेगी। फिलवक्त भारत के धूर्त-क्रूर शासकों को हिन्दू फासीवाद सबसे आसान व तेज साधन दिखायी देता है। हिन्दू फासीवादियों से भारत के एकाधिकारी घरानों का गठजोड़ भी इसी बात की तस्दीक करता है। 
    
यह इतिहास की एक निर्मम सच्चाई है कि जिन भी देशों का साम्राज्यवादी शक्ति के रूप में विकास हुआ है उन्होंने न केवल विदेशों में बल्कि अपने देश के भीतर भी तीव्र शोषण व दमन का रास्ता अपनाया है। अमेरिकी साम्राज्यवादियों ने न केवल दुनिया भर में खून की बरसात की है बल्कि खुद अमेरिका के भीतर भी शोषण व दमन की अनवरत व्यवस्था कायम की है। अमेरिकी लोकतंत्र असल में अमीरों का लोकतंत्र है जबकि मजदूरों-मेहनतकशों के लिए वह हमेशा ही दमन, आतंक का खुला-छिपा रूप धारण किये रहा है। इसी बात की पड़ताल ब्रिटेन, फ्रांस, जापान आदि के इतिहास में आसानी से की जा सकती है। इन सब देशों में शासकों के हाथ मेहनतकशों के खून से रंगे हुए हैं। भला कौन इस बात को भूल सकता है कि 1871 में ‘‘पेरिस कम्यून’’ का खात्मा करने के लिए फ्रांस के पूंजीपतियों ने करीब एक लाख मजदूरों का निर्ममता से कत्ल कर दिया था। 
    
यहां एक सच्चाई को भारत के इतिहास के संदर्भ में भी भारत के मजदूरों-मेहनतकशों को नहीं भूलना होगा कि ब्रिटिश भारत में ही नहीं बल्कि आजाद भारत में भी मजदूरों, किसानों व अन्य मेहनतकशों के साथ आदिवासियों, दलितों, धार्मिक अल्पसंख्यकों के सैकड़ों हत्याकाण्ड रचे गये हैं। कौन सा औद्योगिक शहर ऐसा है जहां मजदूरों का रक्त सड़कों पर नहीं बहा है। ऐसा कौन सा जुझारू आंदोलन रहा है जिसका दमन करने के लिए भारत के शासकों ने चाहे वह कोई भी रहे हों, कोई कसर छोड़ी हो। लेकिन अब तक जो हुआ उससे कई-कई गुना रक्तपात भारत में हिन्दू फासीवादियों के राज में होगा। और पिछले दस सालों ने स्पष्ट तौर पर दिखा दिया है ये कहां तक जा सकते हैं। फासीवाद का मतलब होगा भारत के मजदूरों-मेहनतकशों ही नहीं बल्कि हर भारतीय के जनवादी अधिकारों का खात्मा। राजनैतिक पार्टी, ट्रेड यूनियन, संगठन, संस्था बनाने पर पूर्ण प्रतिबंध। सभा, जुलूस, प्रदर्शन, अभिव्यक्ति के साधनों (पत्र-पत्रिका-सोशल मीडिया) पर प्रतिबंध। आवाज उठाने पर काले पानी से भी बदतर सजायें फासीवाद का मतलब जनवाद का पूर्ण खात्मा। 
    
उपरोक्त तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है। वह हमारे देश के मजदूरों-मेहनतकशों के संघर्षों के इतिहास से तैयार हुआ है। भारत के मेहनतकशों, शोषित-उत्पीड़ितों के संघर्षों का इतिहास उतना ही पुराना है जितना भारत का इतिहास है। हमारे पूर्वजों ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद को कदम-कदम पर चुनौती दी थी। भारत की जमीन में हमारे शहीदों का रक्त मिला हुआ है। और यह सिलसिला आज के दिन तक चला आ रहा है। 
    
मार्च का दूसरा पखवाड़़ा तो भारत की कई विभूतियों को याद करने का अवसर देता है। इनमें शहीदे-आजम भगतसिंह शामिल हैं तो मजदूरों-किसानों की आवाज को बुलंद करने वाले गणेश शंकर विद्यार्थी भी हैं जो साम्प्रदायिक उन्मादियों से लड़ते हुए शहीद हुए तो इसमें महान कवि अवतार सिंह पाश भी बनते हैं जो भारतीय शासकों ही नहीं बल्कि खालिस्तानियों की आंख की किरकिरी बने हुए थे। पाश ठीक उसी दिन (23 मार्च, 1988) शहीद हुए जिस दिन भगतसिंह शहीद (23 मार्च, 1931) हुए थे। 
    
भगतसिंह, गणेश शंकर विद्यार्थी, पाश की विरासत भारत को ‘‘विश्व गुरू’’ बनाने की चाहत रखने वालों के सामने एक फौलादी दीवार बनकर खड़ी है।  

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