मजदूरों की सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर हमला

Published
Thu, 04/16/2026 - 15:50
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सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020

सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 (The Code on  Social Security, 2020) असंगठित क्षेत्र के मजदूरों तथा गिग व प्लेटफार्म वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से जोड़ने की कोरी बातें करते हुये असल में मजदूरों को पहले से हासिल सामाजिक सुरक्षाओं पर भी हमले बोलती है। इस संहिता के लागू होने के साथ अब कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923; कर्मचारी राज्य बीमा निगम अधिनियम, 1948; कर्मचारी भविष्य निधि और विविध प्रावधान अधिनियम, 1952; मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961; रोजगार एक्सचेंज (रिक्तियों की अनिवार्य अधिसूचना) अधिनियम, 1959; ग्रेचुइटी भुगतान अधिनियम, 1972; सिने मजदूर कल्याण उपकर अधिनियम 1981; भवन और अन्य निर्माण मजदूर कल्याण उपकर अधिनियम, 1996 एवं असंगठित मजदूर सामाजिक सुरक्षा अधिनियम, 2008 का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त हो गया है।
    
कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) और कर्मचारी राज्य बीमा निगम  (ESIC) मजदूरों को हासिल दो महत्वपूर्ण सामाजिक सुरक्षा योजनायें हैं। ESIC जहां गंभीर बीमारी अथवा दुर्घटना की स्थिति में मजदूरों को एक सुरक्षा प्रदान करता है, वहीं EPF में जमा धनराशि मुश्किल वक्त में उसके काम आती है। लेकिन, सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 में इन दोनों पर ही हमला बोल दिया गया है।
    
इसमें कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) में मालिक और मजदूर का योगदान 12 प्रतिशत से घटाकर 10 प्रतिशत कर दिया गया है। साथ ही, संबंधित सरकार को यह अधिकार प्रदान कर दिया गया है कि वह चाहे तो इसे और अधिक घटा सकती है। इसके अलावा संहिता की धारा 1 (5) के तहत यह भी प्रावधान कर दिया गया है कि यदि किसी संस्थान के मजदूरों अथवा कर्मचारियों का बहुमत म्च्थ् योजना से बाहर आना चाहता है तो संस्थान को इसकी इजाजत होगी। 
    
इसी तरह इस संहिता में कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ESIC) में मालिक के योगदान को 4.75 प्रतिशत से घटाकर 3.25 प्रतिशत और मजदूर के योगदान को 1.75 प्रतिशत से घटाकर 0.75 प्रतिशत कर दिया गया है। साथ ही, यहां भी यदि किसी संस्थान के मजदूरों अथवा कर्मचारियों का बहुमत ESIC योजना से बाहर आना चाहता है तो संस्थान को इसकी इजाजत होगी।
    
EPF और ESIC जैसी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में ये बदलाव एकदम मजदूर विरोधी हैं जो कि दूरगामी तौर पर इन योजनाओं को कमजोर बनाते हैं। जहां तक बात किसी संस्थान के इन योजनाओं से बाहर आने के लिये वहां के मजदूरों अथवा कर्मचारियों के बहुमत की सहमति की है तो ठेके अथवा फिक्स्ड टर्म एम्प्लायमेंट (FTE) की अस्थायी नौकरी पर तलवार लटका कर मालिक अथवा प्रबंधन जब चाहेगा इसे आसानी से हासिल कर लेगा। 
    
मोदी सरकार द्वारा म्च्थ् से धनराशि की निकासी के नियमों में बदलाव करके उस पर भी  पहरे बैठा दिये हैं। अब कोई मजदूर म्च्थ् से पूर्ण निकासी एक साल तक बेरोजगार रहने पर ही कर सकता है। दरअसल मोदी सरकार की गिद्ध दृष्टि EPF और ESIC के भारी भरकम संचित कोष पर गड़ी हुई है।
    
पुराने कानूनों के तहत जहां पूंजीपति द्वारा भविष्य निधि की राशि न जमा करने अथवा गड़बड़-घोटाला करने पर उन्हें जेल की सजा का भी प्रावधान था, वहीं सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 में इसे हटाकर महज जुर्माने तक सीमित कर दिया गया है। हालांकि, ऐसे मामलों में पहले भी किसी पूंजीपति को जेल की सजा नहीं होती रही है, लेकिन अब इस प्रावधान को ही हटा लिये जाने पर पूंजीपतियों द्वारा ऐसे गड़बड़-घोटाले कहीं अधिक बढ़ेंगे।
    
इन 4 श्रम संहिताओं के लागू होने के बाद संगठित क्षेत्र सिकुड़ेगा, परिणामस्वरूप मजदूरों की भारी आबादी असंगठित क्षेत्र में धकेल दी जायेगी। ऐसे में यह संहिता मजदूरों की आंखों में धूल झोंकते हुये एक राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड के गठन की बात करती है। संहिता के अनुसार यह बोर्ड असंगठित क्षेत्र के मजदूरों एवं गिग व प्लेटफार्म मजदूरों के लिये योजनायें बनायेगा और उन्हें राहत व सुरक्षा प्रदान करेगा। लेकिन, बोर्ड क्या योजनायें बनायेगा और असंगठित क्षेत्र के मजदूर एवं गिग व प्लेटफार्म मजदूर कैसे इसका लाभ उठाएंगे? कैसे उनका पंजीकरण होगा? इत्यादि ठोस सवालों पर संहिता मौन है! 
    
गिग मजदूर ऐसे मजदूर हैं जो कि पार्ट टाइम या घंटों के हिसाब से किसी अस्थायी रोजगार में लगे होते हैं। इनमें कम्प्यूटर पर जॉब वर्क करने वालों से लेकर पत्रकार और प्रोफेसर तक शामिल हैं। ये आनलाइन और आफलाइन दोनों तरह से काम करते हैं। जबकि प्लेटफार्म मजदूर अर्थात ओला, उबेर जैसी टैक्सी सेवा देने वाली कंपनियों के ड्राइवर; स्वीगी, जोमेटो जैसी फ़ूड चेन कंपनियों के तहत बाइक से आर्डर घर अथवा आफिस पहुंचाने वाले... इत्यादि, सीधे आनलाइन प्लेटफार्म का इस्तेमाल करते हैं।उदारीकरण के दौर के ये नये मजदूर किसी भी किस्म की सामाजिक सुरक्षा से वंचित हैं।
    
यह संहिता हमारे देश के अति अमीरों में बढ़ते एक चरम परोपजीवी प्रचलन को कानूनी मान्यता प्रदान करते हुये ‘‘कमीशन प्राप्त मां’’ (Commisioning Mother) का भी जिक्र करती है, कि ऐसी मां को भी 12 हफ्ते का मातृत्व लाभ मिलेगा। ‘‘कमिशनिंग मदर’’ आधुनिक पूंजीवादी समाज की एक नई परिघटना है जिसमें किसी महिला की कोख को किराये पर लेकर प्रयोगशाला में विकसित भू्रण उसमें आरोपित कर दिया जाता है। जाहिर सी बात है कि कोख किराये पर लेने वाले अमीर लोग होते हैं और अपनी कोख किराये पर देने वाली कोई गरीब मजदूर महिला होती है।
    
इस संहिता के तहत सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ लेने के लिये अपना आधार नंबर देना अनिवार्य कर दिया गया है, जो कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का सीधा उल्लंघन है। गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 के अपने फैसले में निजता के अधिकार को नागरिकों का मौलिक अधिकार घोषित किया गया है, और केवल सरकारी सब्सिडी को लेने के लिये आधार की अनिवार्यता की बात कही थी।

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