‘सामाजिक न्याय’ के झण्डे में छेद ही छेद
इस वक्त ‘सामाजिक न्याय’ का मुद्दा गरमाने के लिए नीतिश कुमार, एम.के.स्टालिन से लेकर राहुल गांधी ने कमर कसी हुयी है। ‘सामाजिक न्याय’ को सुनिश्चित कराने के लिए जातिगत जनगणना की मांग की जा रही है।
इस वक्त ‘सामाजिक न्याय’ का मुद्दा गरमाने के लिए नीतिश कुमार, एम.के.स्टालिन से लेकर राहुल गांधी ने कमर कसी हुयी है। ‘सामाजिक न्याय’ को सुनिश्चित कराने के लिए जातिगत जनगणना की मांग की जा रही है।
6 अप्रैल को दिल्ली की विशेष अदालत (अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम सह सत्र जिला न्यायालय) ने 15 साल पहले आंध्र प्रदेश के जी मुदुगुल मंडल के वाकापल्ली में कोंधु जनजाति की 11 मह
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अपने हिंदू राष्ट्र बनाने के एजेंडे के तहत देश की महिलाओं को नियंत्रित और संचालित करने की कोशिश करता रहा है। कभी यह निर्देशित करता है कि हिंदू महिलाओं को वीर पुत्र पैदा करने
हरिद्वार में सिडकुल के पास चौक पर एक लड़की चाय का स्टाल लगाती है। लड़की से बात करने पर उसने बताया कि चाय का स्टाल मैं और मेरे पति चलाते हैं। हम लोग बिहार के रहने वाले हैं। उससे पूछा कि बिहार से यहां
जहां वर्तमान समय में धर्म और धार्मिक स्थलों का निर्माण या उसका प्रचार खत्म या स्वैच्छिक हो जाना चाहिए था वहां आज इन धार्मिक स्थलों का निर्माण और धर्म का प्रचार सरकारों के रहमोकरम से अधिक से अधिक हो
उत्तर प्रदेश के बलिया शहर में ही दिन दहाड़े एक छात्र नेता की पीट-पीट कर हत्या कर दी गयी। दिनांक 11 अप्रैल को बलिया के टी.डी.
आजकल क्रोनी कैपिटलिज्म यानी याराना पूंजीवाद की काफी चर्चा है। मोदी-अडाणी के रिश्तों के संबंध में हर कोई (संघियों को छोड़कर) इसका इस्तेमाल कर रहा है। विपक्षी पार्टियों ने इस पर और जोर देने के लिए ‘मो
कुक काउण्टी बास्तीय जेल, कोठरी नं. 29 शिकागो, 20 अगस्त, 1886
मेरी प्रिय पत्नी,
हर वर्ष ‘मई दिवस’ दुनिया भर के मजदूरों को उनके संघर्षों की महान विरासत की याद दिलाता है। उन्हें याद दिलाता है कि कैसे मजदूरों ने अपने संघर्षों की बदौलत इस निर्मम पूंजीवादी दुनिया से ‘आठ घण्टे काम क
(13 अप्रैल 1978 का पंतनगर का गोलीकांड इस बात का गवाह है कि कैसे भारत के सार्वजनिक उपक्रमों में भी मजदूरों का निर्मम दमन-उत्पीड़न किया जाता था। कि आजाद भारत के शासक क्रूरता में ब्रिटिश हत्यारों से कह
अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।
भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और
उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।
तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है।
वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?