विविध

संघ की हिंदू फासीवादी राजनीति का प्रयोग स्थल : पुरोला

पुरोला, पिछले साल राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहा था। ऐसा तब हुआ जब, मई माह में संघ परिवार ने फर्जी ‘‘लव जिहाद’’ के मुद्दे के इर्द गिर्द पुरोला में ‘‘मुसलमान मुक्त उत्तरा

3 छात्रों की मौत या हत्या?

दिल्ली के ओल्ड राजेन्द्र नगर में यूपीएससी की तैयारी करने वाले 3 छात्रों की मौत ने एक साथ कई सवाल खड़े कर दिये हैं। ओल्ड राजेन्द्र नगर यूपीएससी की तैयारी कराने वाले कोचिंग

जूठन

भारतीय समाज में वैसे तो अनाज को ईश्वर का दर्जा मिला हुआ है। अनाज को लेकर समाज में दो तरह के विचार मौजूद हैं, पहला यह कि अनाज को बर्बाद करना पाप है और दूसरा कि बचा हुआ अना

भाजपा और आर एस एस : अंतर्विरोध और एकता

पिछले कुछ समय से संघ मुखिया के बयान खासकर मोदी को निशाने पर लेने वाले रहे हैं। विशेषकर ऐसा चुनाव के बाद तब हुआ जब मोदी-शाह की जोड़ी अपने 400 पार के नारे से काफी दूर रह गई

15 अगस्त : आजादी के मायने तलाशने की जरूरत

भारत के पूंजीपति ही नहीं बल्कि विदेशी पूंजीपति भी मोदी जैसे हिन्दू फासीवादी के राज में खूब फूले-फले हैं। अम्बानी, अडाणी, टाटा, मित्तल जैसों की बढ़ती दौलत का स्वाभाविक परिणाम भारत के मजदूरों, किसानों के दरिद्रीकरण और कंगालीकरण के रूप में सामने आया है। एक ओर सम्पत्ति के अनन्य स्रोत पर बैठे अम्बानी-अडाणी हैं और दूसरी ओर गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई की मार झेलते करोड़ों मजदूर-किसान हैं।

आपका नजरिया - 18वीं लोकसभा, मोदी 3.0, उम्मीद और संभावनाएं

लोकसभा चुनाव 2024 के परिणाम में भाजपा को बहुमत से कम जब 240 सीटें मिलीं तो मोदी की सरकार बनाने में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के घटक दलों खासकर जेडीयू प्रमुख नीत

नेहरूवादी, अंबेडकरवादी और समाजवादी

यह आज के पतित पूंजीवादी समाज का ही परिचायक है कि उसके सचेत तत्व यानी पूंजीवादी बुद्धिजीवी छान-बीन या समालोचना की सारी क्षमता खो चुके हैं। उन्हें लगता है कि उनके नायक की कोई भी समालोचना विरोधियों को हथियार प्रदान कर देगी। इसलिए वे केवल तारीफ और प्रोत्साहन में व्यस्त हैं। वे एक नायक के बदले दूसरा नायक खड़ा करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। 

रुद्रपुर : मजदूर महापंचायत का सफल आयोजन

रुद्रपुर (उत्तराखंड)/ पूर्व घोषित कार्यक्रम के तहत दिनांक 7 जुलाई को श्रमिक संयुक्त मोर्चा ऊधमसिंह नगर के आह्वान पर भारी बारिश के बीच स्थानीय रामलीला मैद

हिन्दू राष्ट्र की प्रतिक्रिया में सिख राष्ट्र

यहां यह बात स्पष्ट है कि भाषावार प्रांतों के गठन की मांग जहां जनता की जनवादी मांग थी वहीं धर्म के आधार पर राष्ट्र गठन की मांग एक प्रतिक्रियावादी व जनता के बीच विभाजन पैदा करने वाली मांग है। बात चाहे धर्म के आधार पर भारत-पाक विभाजन की हो या फिर हिन्दू राष्ट्र या सिख राष्ट्र की, ये सभी मेहनतकश जनता के बीच विभाजन पैदा करने के साथ कट्टरपंथ को बढ़ावा देती हैं।

श्रम संहितायें लागू करने की तेज होती सरकारी कवायद

मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल में मजदूर विरोधी 4 श्रम संहितायें लागू करने की कवायद तेज हो गयी है। इन संहिताओं को देश की संसद 2019 व 2020 में ही पारित कर चुकी है पर मजदूर व

आलेख

/amerika-ka-iran-par-operation-d-day-hatasha-ka-parinam

अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

/education-and-emplyoment-dasha-aur-durdasha

भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

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उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

/titali-effect-kuch-itihaas-se-kucha-vartaman-mein

तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

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वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?