‘‘अरबन नक्सल’’

/arban-naksal

हमारे देश के प्रधानमंत्री आये दिन ‘अरबन नक्सल’ (शहरी नक्सली) शब्द का प्रयोग करते हैं। उनके अनुसार प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस और उसके नेता राहुल गांधी ‘अरबन नक्सल’ के प्रभाव में हैं। प्रधानमंत्री के बार-बार खासकर चुनावी सभाओं में इन शब्दों के प्रयोग से किसी को भी यह भान होगा कि यह कोई बुराई है या कोई खतरनाक बात है। क्या वाकई ऐसा है?
    
प्रधानमंत्री भले ही कुछ कहते हों परन्तु जब कुछ वर्ष पहले सूचना के अधिकार (आर टी आई) के तहत गृह मंत्रालय से इसके बारे में सवाल पूछा गया तो उसने जवाब दिया कि उसके पास ‘अरबन नक्सलस’ अथवा उनकी गतिविधियों के बारे में कोई जानकारी नहीं है। यह कैसी बात हुयी कि प्रधानमंत्री जिस बात की चर्चा बार-बार कर रहे हैं उसके बारे में गृह मंत्रालय को कोई जानकारी नहीं है। यानी इस बात का दूसरा अर्थ निकलता है कि असल में ‘अरबन नक्सल’ नामक कोई समस्या या खतरा भारत में है ही नहीं। या उल्टा कि प्रधानमंत्री तो जानते हैं परन्तु गृह मंत्रालय यानी देश के गृह मंत्री इस विषय में कुछ नहीं जानते हैं। फिर कोई बढ़कर यह भी कह सकता है कि कोई एक सच नहीं बोल रहा है। 
    
‘अरबन नक्सल’ के बारे में जब भाजपा के सांसद मनोज तिवारी से पूछा गया था तो उनका जवाब था कि अरविंद केजरीवाल ‘‘अरबन नक्सल’’ का सबसे बड़ा उदाहरण है। यानी विपक्ष का हर नेता भाजपा की निगाह में या तो ‘अरबन नक्सल’ है या उसके प्रभाव में है। और फिर हनुमान भक्त अरविंद केजरीवाल जो कि शहीद भगतसिंह और बाबा साहेब अम्बेडकर को भी ‘‘मानते’’ हैं, उनका नक्सलवाद से कैसे सम्बन्ध बनता है यह तो मनोज तिवारी भी शायद साबित न कर पायें। और फिर ये दोनों एक ही थैले के चट्टे-बट्टे हैं। 
    
असल में ‘अरबन नक्सल’ एक गढ़ा हुआ शब्द युग्म है। इस शब्द को लातिन अमेरिका में एक समय प्रचलित ‘अरबन गुरिल्ला’ धारणा की तर्ज पर गढ़ा गया है। पांच-छः दशक पूर्व लातिन अमेरिका में मेहनतकशों की मुक्ति के लिए चीन और क्यूबा की क्रांति से प्रभावित लोगों ने अमेरिका की कठपुतली बने शासकों के खिलाफ गुरिल्ला संघर्ष छेड़ा हुआ था। संघर्ष का केन्द्र मुख्यतः देहात में था। उनके शहरी समर्थकों को ‘अर्बन गुरिल्ला’ के रूप में प्रसारित किया गया। शासकों ने इनके दमन के नाम पर मजदूरों-मेहनतकशों का भीषण दमन किया। 
    
चे ग्वेरा लातिन अमेरिका सहित पूरी दुनिया में वामपंथी क्रांतिकारियों के लोकप्रिय नायक के रूप में उभरे थे। चे ग्वेरा की तस्वीर लगी टी शर्ट पहने हुए कई युवा आज भी भारत की सड़कों में दिख जाते हैं। भारत में चे ग्वेरा जैसी विशाल लोकप्रियता यदि किसी ने पायी है तो वे शहीदे-आजम भगतसिंह हैं।
    
‘अरबन नक्सल’ या ‘अरबन गुरिल्ला’ से ऐसे लोगों की छवि उभरती है जो सिर से पैर तक हथियारों से लैस हैं। और राज्य की सेना-पुलिस-खुफिया विभाग की नाक में अपनी सैन्य गतिविधियों से दम किये हुए हैं। भारत में ऐसी कोई गतिविधि किसी बड़े-छोटे शहर में कहीं हो रही होती है तो गृह मंत्रालय तब तो उसको दर्ज करता, तब तो उसकी व्याख्या करता यानी ‘अरबन नक्सल’ का वाकई कोई वजूद भारत में नहीं है। फिर यह सब क्या है? प्रधानमंत्री मोदी ‘अरबन नक्सल’ का नाम बार-बार क्यों ले रहे हैं? वे किसे डरा रहे हैं या किसे अपने पीछे गोलबंद करने की कोशिश कर रहे हैं? या स्वयं मोदी साहब को ही डर सता रहा है कि कोई उन्हें सत्ता से बेदखल कर सकता है। 
    
गौर से देखा जाए तो ‘अरबन नक्सल’ का एक संभावित अर्थ तो वह निकलता है जो नौकरशाहों की भर्ती के लिए ली जाने वाली परीक्षा (यू पी एस सी या पी सी एस वगैरह) देने वालों को विभिन्न कोचिंग वालों द्वारा पढ़ाया जाता है। इसके अनुसार ‘अरबन नक्सल’ वे हैं जो नक्सलवाद का शहरों में रहकर सक्रिय समर्थन करते हैं। ये नक्सलवाद की विचारधारा का शहरों में प्रचार-प्रसार करने से लेकर उसकी हर तौर-तरीके से सहायता करते हैं। मशहूर ‘भीमा कोरेगांव प्रकरण’ में कई प्रसिद्ध विद्वान, कलाकार, कवि, वकील, पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ताओं को कथित तौर पर ‘अरबन नक्सल’ के उदाहरण के रूप में पेश किया जाता है। सालों से एन आई ए इस केस की जांच कर रही है परन्तु आज तक कुछ नहीं साबित हो पाया है। सालों-साल इन जनपक्षधर लोगों को बिला वजह कष्ट उठाना पड़ा है जबकि संघ-भाजपा से जुड़े मुख्य साजिशकर्ता सब किये-धरने के बाद आराम से अपना जीवन जी रहे हैं। यानी भीमाकोरेगांव एक ऐसी घटना व प्रतीक के रूप में उभरा जहां सत्ता में बैठे हिन्दू फासीवादियों के खिलाफ वामपंथी, दलित चिंतक व कार्यकर्ता संघर्ष कर रहे थे। 
    
दूसरा संभावित अर्थ प्रधानमंत्री मोदी की उन आक्रामक बातों से निकलता है जिसका इस्तेमाल वे अक्सर विपक्षी पार्टियों व अन्यों के संदर्भ में करते हैं। यहां उनके अंदर से एक ऐसे तानाशाह की बू आती है जो अपने किसी विरोधी को तनिक भी बर्दाश्त नहीं कर सकता है। एक ऐसा तानाशाह जो चाहता है कि कोई विरोध, प्रदर्शन, धरना, आंदोलन देश में कहीं न हो। और जो कोई ऐसा करता है वह ‘अरबन नक्सल’ है उसमें राहुल गांधी, केजरीवाल, हेमंत सोरेन जैसे विपक्षी नेताओं से लेकर योगेन्द्र यादव जैसे ‘‘आंदोलन जीवी’’ आदि सब शामिल हो जाते हैं। वही लातिन अमेरिकी माडल। 
    
मोदी साहब वस्तुतः जो चाहते हैं वह यह कि कोई भी आम लोगों के बारे में बात न करें। न कोई उनकी कोई मांग उठाये। क्योंकि वे ही सबसे बड़े गरीब नवाज हैं। उनके शब्दों में, ‘उन्होंने गरीबी देखी है’, ‘बचपन में चाय बेची है’, वगैरह-वगैरह। यहां मोदी साहब अपने आपको एक ऐसे व्यक्ति और अपने शासन को ऐसे शासन के रूप में पेश करते हैं जहां वे स्वयं गरीबों के सबसे बड़़े रहनुमा हैं और उनके शासन में हर गरीब के आंसू पोंछे जा चुके हैं। गरीबी, बेरोजगार, भुखमरी, असमानता, महंगाई यानी गरीबों की हर समस्या का या तो अंत कर दिया गया है या बस अंत होने ही वाला है। 
    
विपक्षी नेताओं की अपनी-अपनी मजबूरियां और जरूरतें हैं। वे यदि अपना जनाधार बनाना चाहते हैं या बचाये रखना चाहते हैं तो उन्हें भारत के गरीबों, शोषित-उत्पीड़ितों का पैरवीकार बनने की कोशिश (या प्रहसन) करनी ही पड़ेगी। इसके लिए उन्हें गर्मागर्म वामपंथी नारे, फिकरे उछालने ही पड़ेंगे। वामपंथी लफ्फाजी तब कुछ कारगर होगी जब वे कुछ ऐसा करते दिखें जिससे वे मजदूरों-मेहनतकशों से जुड़ते हुए दिखें। राहुल गांधी यूं ही कभी कुली, कभी मोची, कभी कुम्हार, कभी ड्राइवर, कभी खेत मजदूरों के साथ उठते-बैठते, खाते-पीते नहीं दिखायी देते हैं। ये सब (पक्षी-विपक्षी) बहुरूपिये हैं। मोदी साहब नहीं चाहते हैं कि कोई और इस कला में उनका मुकाबला करें अथवा उन्हें चुनौती दे। हर तानाशाह अपने को ‘‘एको अहं द्वितीयो नास्ति, न भूतो न भविष्यति’’ ही समझता है। ऐसे में मोदी साहब जैसे स्वघोषित गरीब नवाज के लिए हर कोई विरोधी ‘अरबन नक्सल’ ही है। 
    
भारतीय राजनीति में ‘नक्सल’ शब्द क्रांतिकारियों का भी एक प्रतीक है। अपने आप में इस शब्द का वैसे कुछ अर्थ नहीं है। नक्सल शब्द नक्सलबाड़ी से निकला है। और नक्सलबाड़ी प.बंगाल के एक गांव (अब जो कि कस्बा बन गया है) का नाम है जहां साठ के दशक में किसानों ने क्रूर-धूर्त जमींदारों के खिलाफ खुला विद्रोह कर दिया था। आजाद भारत में किसानों व मजदूरों को काले अंग्रेजों से मुक्ति की युक्ति जब नहीं सूझ रही थी तब नक्सलबाड़ी एक उम्मीद के सितारे के रूप में उभरा था। बाद में इस विद्रोह का क्रूर दमन किया गया परन्तु फिर भी नक्सलवादी आज तक नहीं मिटाये जा सके हैं। वे राजकीय आतंक का जवाब उसी भाषा में देते हैं। हिंसा-प्रतिहिंसा के इस सिलसिले में पिछले छः दशकों में हजारों-हजार लोग मारे जा चुके हैं। नक्सलवादियों का सफाया हो सके इसके लिए कांग्रेस या भाजपा सरकारों ने वह सब कुछ किया जो ये कर सकते थे। 
    
‘अरबन नक्सल’ इस रूप में किसी के लिए अपने विरोधी को परेशान करने का उपाय तो किसी के लिए मजदूरों-मेहनतकशों के समर्थक का प्रतीक अनजाने ही बनते जा रहा है। गृह मंत्रालय की दृष्टि में जिसका कहीं अस्तित्व नहीं है उसका अस्तित्व राजनीति में दिनों दिन गहराता जा रहा है। 

आलेख

/capital-dwara-shram-par-kiya-gaya-sabase-bhishan-hamala

मजदूर-कर्मचारी की परिभाषा में विभ्रम पैदा करने एवं प्रशिक्षुओं व कम आय वाले सुपरवाइजरों को मजदूर न माने जाने; साथ ही, फिक्स्ड टर्म एम्प्लायमेंट (FTE) के तहत नये अधिकार विहीन मजदूरों की भर्ती का सीधा असर ट्रेड यूनियनों के आधार पर पड़ेगा, जो कि अब बेहद सीमित हो जायेगा। इस तरह यह संहिता सचेतन ट्रेड यूनियनों के आधार पर हमला करती है। 

/barbad-gulistan-karane-ko-bas-ek-hi-ullu-kaafi-hai

सजायाफ्ता लंपट ने ईरान पर हमला कर सारी दुनिया की जनता के लिए स्पष्ट कर दिया कि देशों की संप्रभुता शासकों के लिए सुविधा की चीज है और यह कि आज शासक और मजदूर-मेहनतकश जनता अलग-अलग दुनिया में जी रहे हैं। 

/amerika-izrayal-ka-iran-ke-viruddha-yuddh

अमरीकी और इजरायली शासकों ने यह सोचकर नेतृत्व को खत्म करने की कार्रवाई की थी कि शीर्ष नेतृत्व के न रहने पर ईरानी सत्ता ढह जायेगी। इसके बाद, व्यापक जनता ईरानी सत्ता के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए सड़क पर उतर आयेगी और अमरीकी व इजरायली सेनायें ईरान की सत्ता पर कब्जा करके अपने किसी कठपुतले को सत्ता में बैठा देंगी।

/capitalism-naitikataa-aur-paakhand

जब शीर्ष ऐसा है तो नीचे कल्पना की जा सकती है। और आज पूंजीवादी प्रचारतंत्र के सारे स्व-प्रतिबंध के बावजूद अनुयाईयों के कुकर्मों की दास्तां बाहर आ जाती है। कभी-कभी कोई सेंगर जेल भी चला जाता है। पर ज्यादातर वैसे ही छुट्टे सांड की तरह घूमते रहते हैं। 

/baukhalaye-president-trump-ke-state-of-union-speech-kaa-saar

ट्रम्प के इस स्टेट आफ यूनियन भाषण का कुछ डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने बहिष्कार किया। कुछ सर्वोच्च न्यायालय के सदस्यों ने इसमें भाग नहीं लिया। लेकिन ट्रम्प करीब दो घण्टे के अपने भाषण में अपने बारे में शेखी बघारते रहे और तमाम गलतियों और कमियों के लिए विरोधी पार्टी के राष्ट्रपतियों को जिम्मेदार ठहराते रहे। इस भाषण को झूठ का पुलिंदा कहना ज्यादा सही होगा।