
बीते दिनों बंगलुरू स्थित एक फर्म में ए आई इंजीनियर अतुल सुभाष द्वारा पारिवारिक विवाद के चलते आत्महत्या का मामला भारतीय मीडिया में छाया रहा। अतुल सुभाष ने अपने 24 पेज के आत्महत्या नोट में आत्महत्या के लिए अपनी पत्नी निकिता सिंघानिया और जौनपुर फैमिली कोर्ट की जज को दोषी ठहराया है।
5 वर्ष पूर्व अतुल सुभाष व निकिता की शादी हुयी थी। शादी से उन्हें एक पुत्र भी हुआ। बीते 3 वर्षों से जौनपुर की फैमिली कोर्ट में दोनों का पारिवारिक विवाद चल रहा था। अतुल के मुताबिक निकिता उससे समझौते के साथ तलाक के लिए 3 करोड़ रु. मांग रही थी जबकि फैमिली कोर्ट की जज ने मामले को निपटाने के लिए 5 लाख रु. की घूस मांगी थी। अन्यथा जिंदगी भर अदालत के चक्कर काटने की धमकी दी थी। ये सारे खुलासे अतुल ने अपने आत्महत्या नोट में किये हैं। अतुल के अनुसार उसकी पत्नी ने उस पर 9 केस यौन अनुचित व्यवहार, घरेलू हिंसा, दहेज उत्पीड़न, पैसे के लिए उत्पीड़न आदि के डाले थे।
इन आरोपों का निकिता ने खण्डन किया है। फिलहाल आत्महत्या को उकसाने का केस उस पर दर्ज कर लिया गया है। निकिता भी दिल्ली की एक फर्म में कंसल्टेंट इंजीनियर है।
अतुल-निकिता के इस पारिवारिक विवाद में यद्यपि दोनों पक्ष अपने-अपने दावों को सही ठहरा रहे हैं। पर अतुल की आत्महत्या के बाद से ज्यादातर मीडिया कवरेज निकिता को दोषी ठहराने में जुटी रही है।
टी वी चैनलों-वेबसाइटों पर प्रसारित अतुल के प्रति सहानुभूतिपूर्ण व निकिता के प्रति आक्रोश से भरी खबरों का असर यह हुआ कि सोशल मीडिया पर जगह-जगह से पुरुष वर्चस्व वाला स्त्री विरोधी आक्रोश फूट पड़ा है। कोई निकिता की गिरफ्तारी की मांग कर रहा है तो कोई दहेज कानून के दुरुपयोग का हवाला देकर उसमें बदलाव की। कोई-कोई सिरफिरे तो महिलाओं को नौकरी करने देने से रोकने का झण्डा उठाते दिख रहे हैं। तो कोई तथाकथित महिला सशक्तिकरण को अतुल की मौत का दोषी ठहरा रहे हैं। अश्लील और भद्दे कमेंटों की तो बाढ़ आयी हुयी है।
अतुल की आत्महत्या के बहाने महिलाओं की आजादी, नौकरी आदि के विरोधी महिलाओं के पक्ष में झुके सभी कानूनों का इसलिए खात्मा चाह रहे हैं क्योंकि उनका दुरूपयोग हो रहा है। वे यह हकीकत नहीं देखना चाहते कि घरेलू हिंसा पर कानून बनने पर भी ज्यादातर घरों में महिलायें इसकी शिकार हैं। कि आज भी हर वर्ष घरेलू उत्पीड़न-दहेज उत्पीड़न से तंग आकर हजारों महिलायें आत्महत्या कर रही हैं। कि दजेह पर कठोर कानून के बावजूद आज भी ढेरों औरतें मार दी जा रही हैं या फिर दहेज के चलते ढेरों की शादी नहीं हो पा रही है। कि कानून बने होने के बावजूद उनमें सजा होने की दर बहुत कम है।
देश की सत्ता में जबसे संघी ताकतें बैठी हैं तब से देश में महिला विरोधी हिंसा में बढ़ोत्तरी हुयी है। महिला विरोधी संघी ताकतें महिलाओं को घरों में कैद कर बच्चा पालने, पति की सेवा करने वाले नौकर में बदल देना चाहती हैं। महिलाओं का आत्मनिर्भर होना, पुरुष के बराबर समाज-राजनीति-परिवार में भूमिका निभाना इन्हें पसंद नहीं। उनकी सोच में समाज में पहले से वर्चस्वशाली पुरुष प्रधानता सोच को मजबूत बना रही है।
जहां तक कानूनों का दुरुपयोग का सवाल है तो निश्चय ही कुछ मामलों में इनका दुरुपयोग वकीलों की शह पर होता है। पर चूंकि मामले को बढ़ा चढ़ा कर पेश करे बगैर अदालतें महिलाओं की बात सुनती नहीं, इसलिए ऐसा अधिकतर होता है। अतः इनका हवाला देकर कानून बदलवाने की जगह कानून को ठीक से लागू करने की मांग करना और पुरुष प्रधानता के खात्मे की मांग करना जरूरी है।