आयुष्मान भारत योजना : एक उत्पीड़नकारी योजना

वोट बैंक की खातिर आयुष्मान योजना जैसी योजनाएं लाकर उनसे जनता के कल्याण का दिखावा किया जाता है

भारत सरकार की आयुष्मान योजना (प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना) 2017 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री काल में लागू की गई। इसके तहत घोषित किया गया कि एक परिवार को अपने रोगी का इलाज कराने के लिए सालाना पांच लाख रुपये मिलेंगे। जिसके तहत केंद्र सरकार ने सरकारी अस्पतालों, हायर सेंटरों सहित निजी अस्पतालों को इलाज कराने के तौर पर चिन्हित किया है। जिसमें भर्ती होकर इलाज के दौरान आने वाला अस्पताल का खर्च, कुछ जांचें व कुछ दवाओं का खर्च वहन किया जाता है। अस्पताल में इलाज के दौरान कुछ जांचें, दवाएं इत्यादि रोगी को स्वयं बाजार से खरीदनी होती हैं।
    
सरकारी अस्पतालों, जिला अस्पतालों में जांच की सुविधाएं काफी कम हैं। डाक्टर, टेक्नीशियन इत्यादि पर्याप्त नहीं हैं। यही हाल मेडिकल कालेजों का है। बड़े हायर सेंटरों में ही तमाम तरह की जांच की सुविधाएं हैं। जिला अस्पतालों, मेडिकल कालेजों में यह सुविधा नहीं होने से बड़े हायर सेंटरों में काफी संख्या में लोग इलाज कराने आते हैं। इससे वहां पर इलाज कराने में काफी मारामारी रहती है।
    
ऋषिकेश AIIMS और संजय गांधी पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइंस लखनऊ ऐसे ही हायर सेण्टर हैं जहां उत्तराखण्ड-उ.प्र. के गम्भीर रोगी इलाज को पहुंचते हैं। लेकिन इन अस्पतालों में आयुष्मान योजना के तहत इलाज कराने के दौरान मरीजों के अनुभव काफी पीड़ादायी व कष्टकारी रहे हैं।
    
AIIMS ऋषिकेश में रोगी को भर्ती कराने के पश्चात आयुष्मान कार्ड के तहत इलाज करने के लिए डाक्टर से इलाज का अनुमानित बजट बनवाना होता है। बजट बनाने के बाद इलाज करने के लिए अस्पताल के अंदर बने आयुष्मान योजना के केंद्र में जाकर में अप्लाई करना होता है। आयुष्मान केंद्र में अप्लाई करने के लिए रात के कुछ घण्टे छोड़कर आयुष्मान सेंटर पर लंबी-लंबी लाइनों में घंटों खड़े रहना पड़ता है। उसके बाद 24 से 48, 72 घंटे या उससे भी ज्यादा समय बाद एप्रूवल आकर पैसा आपके खाते में आता है। किसी का इससे ज्यादा वक्त भी लग सकता है। 
    
रोगी के खाते में पैसा आने के बाद आपका इलाज शुरू होगा। इलाज में लगने वाले उपकरण, दवाओं के लिए आपको अस्पताल के अंदर बने मेडिकल स्टोर में जाकर दवा लेने से पहले आयुष्मान केंद्र में जाकर अस्पताल के अंदर से दवाओं के लिए बनाए गए पर्चे को लंबी लाइन में खड़े होकर पर्चा स्कैन कराना होता है। पर्चा स्कैन कराने के पश्चात मेडिकल स्टोर में टोकन लेना होता है। टोकन लेने के बाद आपका नंबर आने में तीन से 5-6 घंटे तक का वक्त लग सकता है। इतनी देर इंतजार करने के बाद पता चलता है कि मेडिकल स्टोर पर यह दवा खत्म है और आपको बाजार से दवा खरीदनी होगी। मेडिकल स्टोर से दवा लेने के बाद जो आपने दवा ली उस बिल का सत्यापन कराने के लिए अलग से आयुष्मान के केंद्र पर जाना होता है। जिसमें आपको फिर लाइनों से ही वास्ता पड़ता है। इस तरह आपके पर्चे में डाक्टर द्वारा लिखी गई दवा चाहे वह 50 रुपये से लेकर हजार रुपये कितने की भी हो, आपको इन सारी प्रक्रियाओं से गुजरना होता है। अंत में आप अपने समय का हिसाब लगाएं तो पाते हैं कि सुबह आपने 9 बजे दवा लेने की प्रक्रिया शुरू की थी। दोपहर के 12-1 बजे तक का समय दवा लेने में ही निकल गया। फिर आपको जो दवा नहीं मिली वह बाहर से लेने जाना होता है। 
    
दूसरे दिन दवा लेने के लिए इन सारी प्रक्रियाओं से गुजरने से पहले आयुष्मान केंद्र में जाकर आपको एक कागज मिलता है। इसमें आपके आयुष्मान कार्ड की फोटो स्टेट होती है और एक अलग से कागज मिलता है जिसमें आपको लाइन में खड़े होकर केवल उस दिन की तारीख और स्टांप आयुष्मान केंद्र की लगानी होती है। फिर आप दवा लेने के लिए इन सारी प्रक्रियाओं से गुजरते हैं। आयुष्मान से भर्ती मरीज अपने दस्तावेज व सारी प्रक्रियाओं को नियमबद्ध तरीके से नहीं कर पाये तो डिस्चार्ज होते समय लोगों को परेशानी उठानी पड़ती है। इस कारण उनको 2-3 दिन से लेकर 1 सप्ताह तक इन कामों को करने में वक्त लग जाता है।
    
SGPGI लखनऊ में आपने आयुष्मान कार्ड से अपने रिश्तेदारों का इलाज करवाना है तो उसके लिए आपको डाक्टर से इलाज के लिए मिले पर्चे में भरे अनुमानित बजट के बाद आयुष्मान केंद्र में जाकर नम्बर लगाने के बाद आयुष्मान कार्ड, राशन कार्ड, आधार कार्ड, जांच रिपोर्ट, अस्पताल में भर्ती के पेपर, मरीज का फोटो व अगूंठे का निशान इत्यादि चीजों को जमा करना होता है। उसके बाद आपके सारे दस्तावेजों को आयुष्मान पोर्टल के जरिए जिस राज्य के आप निवासी हैं उस राज्य के हेल्थ अथॉरिटी को भेजा जाता है। हेल्थ अथॉरिटी से एप्रूवल यानी कि इलाज के लिए स्वीकारोक्ति आने में 24 घंटे से लेकर किसी रोगी के लिए 10 से 15 दिन तक का भी समय लग सकता है। इतने दिन तक आपके रोगी को बिना इलाज के अस्पताल में भर्ती रहना होता है। अस्पताल में भर्ती होने के बाद ही आयुष्मान कार्ड से इलाज के लिए आप अप्लाई कर सकते हैं। एप्रूवल आने के बाद आयुष्मान सेंटर के कर्मचारी आपकी पीड़ीई बनाते हैं। पीड़ीई बनाने के बाद उस आयुष्मान केंद्र के अधिकारी के हस्ताक्षर करने के बाद पैसा रोगी के खाते में आता है और तब आपका इलाज शुरू हो पाता है। यानी आपने अपने रोगी का इलाज करना है तो कई दिन आपके यूं ही गुजर जाएंगे और इलाज नहीं मिलेगा।
    
इसी तरह PGI लखनऊ में सुल्तानपुर से आए एक मरीज जो कि 10 दिन तक अस्पताल में भर्ती रहे। लेकिन आयुष्मान योजना से इलाज कराने को लेकर राज्य हेल्थ अथारिटी से उनका एप्रूवल नहीं आया। वह 10 दिन के बाद अस्पताल का चार्ज देकर बिना अपना इलाज कराए घर को चले गये। इस तरह के हालात तमाम रोगियों के होते हैं।
    
मोदी सरकार आयुष्मान योजना का प्रचार-प्रसार बड़े-बड़े दावे देकर करती है। सरकार इसे विश्व की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना करार देती है। सरकार का दावा है जिसके तहत करोड़ों लोगों के आयुष्मान कार्ड बनाए गए हैं और करोड़ों लोगों ने इस योजना से लाभ लिया है।
    
आयुष्मान योजना का इस तरह प्रचार-प्रसार सरकार द्वारा किया जाता है। लेकिन कोई अपने परिजनों, मित्रों का इलाज आयुष्मान से कराने जाता है तो यह सब बड़ी-बड़ी लफ्फाजी और झूठ नजर आता है। और योजना की हकीकत सामने आ जाती है। आयुष्मान योजना से इलाज कराने वाले देश के गरीब, मजदूर-मेहनतकश हैं। इनके पास इतना पैसा नहीं होता है कि वह महंगे निजी अस्पतालों में इलाज करा सकें। वह यहां परेशान होने के लिए आजाद हैं। जिन पर कोई ध्यान नहीं दिया जाता है।
    
आजादी के बाद सरकारों ने स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधा को सबके लिए निःशुल्क करने के बजाय देश में दो तरह की स्वास्थ्य प्रणाली को अपनाया। एक ओर जहां सरकारी अस्पताल बनाये गये। वहीं दूसरी तरफ पूंजीपतियों को निजी अस्पताल भी खोलने की छूट दी। 1991 में निजीकरण, उदारीकरण, वैश्वीकरण की नई आर्थिक नीतियों को अपनाने के बाद राज्य व केंद्र सरकारों ने अस्पतालों, स्वास्थ्य से लेकर तमाम तरह की योजनाओं से पल्ला झाड़ना शुरू कर दिया। सरकारी अस्पतालों की हालत दयनीय बना दी गई। निजी अस्पताल बड़े पैमाने पर खुलते चले गए। आयुष्मान योजना के बाद जहां सरकार ने निजी अस्पताल में भी लोगों से आयुष्मान योजना के तहत इलाज कराने की छूट दी। इससे इन अस्पतालों को फलने-फूलने का ही मौका मिला। इसके बजाय सरकार देश के सरकारी अस्पतालों, मेडिकल कालेज की संख्या बढ़ाकर उनमें संसाधनों, डाक्टरों, नर्सों, जांच मशीनें, लैब टेक्नीशियनों, स्टाफ इत्यादि की समुचित व्यवस्था करती तो इस तरह के हालात ना पैदा होते।
    
लेकिन सरकार की मंशा देश की स्वास्थ्य प्रणाली को सरकारी हाथों में लेकर जनता के लिए सुविधाजनक बनाने की नहीं रही है। वह देश के बड़े पूंजीपतियों को स्वास्थ्य व अस्पतालों से मोटा मुनाफा लूटने की छूट देना चाहती है। ताकि पूंजीपति जनता के जीवन, स्वास्थ्य से भी खिलवाड़ कर मुनाफा कमा सकें। वोट बैंक की खातिर आयुष्मान योजना जैसी योजनाएं लाकर उनसे जनता के कल्याण का दिखावा किया जाता है। साथ ही जानबूझकर इस ‘मुफ्त इलाज’ की प्रक्रियायें इतनी लम्बी व बोझिल बना दी जाती हैं कि मरीज इन प्रक्रियाओं के उत्पीड़न से ही परेशान हो जाये। अतः इन खैराती योजनाओं की जगह सबके लिए निःशुल्क स्वास्थ्य के अधिकार की मांग को लेकर व्यापक जन संघर्ष बढ़ाने की जरूरत है।

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