केन्द्रीय बजट में मुल्ला नसीरूद्दीन

Published
Mon, 02/16/2026 - 06:00
/central-budget-mein-mullaa-nasiruddin

मुल्ला नसीरूद्दीन का एक किस्सा है। एक दिन मुल्ला नसीरूद्दीन अपने गधे को लेकर एक सराय में पहुंचा। वहां उसने लोगों के बीच गधे के सामने कुरान रखी और उसके पन्ने पलटने लगा। जब लोगों ने पूछा कि वह क्या कर रहा है तो उसने बताया कि वह गधा बुखारा के अमीर (शासक) का है और उसने मुल्ला नसीरूद्दीन को उस गधे को दीन (धर्म) सिखाने की जिम्मेदारी दी है। गधा कुरान पढ़ना लगभग खत्म कर रहा है और जल्दी ही वे शरीयत पर आयेंगे। उसने लोगों को यह भी बताया कि यदि वह गधे को बीस साल में दीन नहीं सिखा पाया तो अमीर उसका सिर कलम करवा देगा। यह सुनकर लोगों ने अफसोस जताया कि फिर तो उसे अपना सिर कलम करवाने के लिए तैयार हो जाना चाहिए। भला किसी ने गधे को दीन सीखते देखा है। उस पर मुल्ला नसीरूद्दीन कहता है कि चिंता की कोई बात नहीं क्योंकि बीस सालों में तीनों में से कोई न कोई एक जरूर मर जायेगा- या तो गधा, या अमीर या फिर मुल्ला नसीरूद्दीन। और तब मुल्ला नसीरूद्दीन के सिर कलम होने की नौबत ही नहीं आयेगी। इतना सुनते ही वहां मौजूद सारे लोग कहकहे लगाने लगते हैं। 
    
पता नहीं प्रधानमंत्री मोदी और उनकी वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मुल्ला नसीरूद्दीन का यह किस्सा सुना है या नहीं पर उन्होंने इससे मिलती-जुलती चीज इस साल के केन्द्रीय बजट में जरूर की। उन्होंने इस समय भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने मौजूद तमाम चुनौतियों पर बात करने के बदले सारा ध्यान 2047 में भारत के विकसित होने पर लगाया। यानी इस समय की समस्याओं को भूल जाओ और 2047 में भारत के विकसित भारत बन जाने का इंतजार करो। मोदी और सीतारमण अच्छी तरह जानते हैं कि बीस साल बाद लोगों को 2026-27 के बजट की धुंधली सी भी याद नहीं रहेगी। यदि इक्का-दुक्का अर्थशास्त्रियों को यह याद रहता भी है तो तब तक दोनों में से कोई एक या दोनों निपट चुके होंगे। सिर कलम होने की नौबत नहीं आयेगी। 
    
किसी साल का केन्द्रीय बजट बीस साला योजना का बजट नहीं होता। ज्यादा से ज्यादा यही होता है कि लम्बी योजना में साल भर के वित्तीय खर्च का ब्यौरा दिया जाता है। ऐसे में यदि अर्थव्यवस्था के सामने तत्काल मौजूद गंभीर समस्याओं पर बात करने और उस संदर्भ में वित्तीय प्रावधान करने के बदले बीस साला परियोजना की हवाई चर्चा की जाती है तो वह बस जुमलेबाजी हो जाती है। इस सरकार ने चुनावी रैलियों से आगे बढ़कर अब केन्द्रीय बजट को भी जुमलेबाजी का अड्डा बना दिया है। 
    
भारत की अर्थव्यवस्था इस समय गंभीर समस्याओं का सामना कर रही है। भारत सरकार चाहे जो भी फर्जी आंकड़े पेश करे पर हकीकत यही है कि अर्थव्यवस्था में वृद्धि दर ढाई-तीन प्रतिशत से ज्यादा नहीं है। दक्षिणपंथी अर्थशास्त्री और मोदी के भूतपूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविन्द सुब्रमणियम का भी यही मानना है और जे एन यू वाले वामपंथी अर्थशास्त्री अरुण कुमार का भी। खासकर लघु और मध्यम उद्यमों की हालत बहुत खराब है। छोटी-मझोली खेती भयंकर संकट में है। बेरोजगारी की समस्या अधिकाधिक गंभीर होती जा रही है। वास्तविक तनख्वाहें गिरती जा रही हैं और इसीलिए क्रय शक्ति भी। लोगों पर कर्ज लदता जा रहा है। दूसरी ओर इन समस्याओं से अछूता पूंजीपति वर्ग फल-फूल रहा है। उसका मुनाफा और पूंजी बढ़ रहे हैं। फलस्वरूप असमानता और भुखमरी बढ़ रहे हैं। 
    
बजट इनमें से किसी भी समस्या को जरा भी संबोधित करने का प्रयास नहीं करता। इसके ठीक विपरीत इसकी दिशा समस्याओं को और विकराल बनाने की है। जन राहत के सारे ही मदों में बजट की दिशा कटौती की ओर है। कई मामलों में तो इस साल के बजट प्रावधान पिछले साल के प्रावधान से भी कम हैं, यदि महंगाई को ध्यान में रखा जाये। वैसे सरकार ने कटौती का एक और तरीका निकाल रखा है। बजट में प्रावधान कर दिया जाता है पर असल में खर्च नहीं किया जाता। कई सारे मदों में पिछले साल के बजट प्रावधानों से बहुत कम खर्च किया गया। यह किसी लापरवाही का नतीजा नहीं होता। यह जान-बूझकर किया जाता है। केन्द्रीय कोष से बजट आवंटित ही नहीं किया जाता। छात्रवृत्तियों की बहुत थोड़ी रकम तक में यह किया जाता है जिसका सीधा असर गरीब दलित-पिछड़े और अल्पसंख्यक पृष्ठभूमि के छात्रों पर पड़ता है। 
    
पिछले बारह सालों से यह सरकार साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण और जुमलेबाजी पर चल रही है। यह जुमलेबाजी बजट जैसे रोजी-रोटी के जीवन-मरण के सवालों तक जा पहुंची है। इस ध्रुवीकरण और जुमलेबाजी की आड़ में देश के बड़े पूंजीपतियों की तिजोरियां भरी जा रही हैं और बदले में वे इस सरकार को टिकाये रखने की हरचन्द कोशिश कर रहे हैं। फिलहाल दोनों अपनी-अपनी कोशिशों में कामयाब हैं पर ये कोशिशें देश की अर्थव्यवस्था और लोगों की जिन्दगी को अधिकाधिक तबाही में धकेल रही हैं।    

आलेख

/capital-dwara-shram-par-kiya-gaya-sabase-bhishan-hamala

मजदूर-कर्मचारी की परिभाषा में विभ्रम पैदा करने एवं प्रशिक्षुओं व कम आय वाले सुपरवाइजरों को मजदूर न माने जाने; साथ ही, फिक्स्ड टर्म एम्प्लायमेंट (FTE) के तहत नये अधिकार विहीन मजदूरों की भर्ती का सीधा असर ट्रेड यूनियनों के आधार पर पड़ेगा, जो कि अब बेहद सीमित हो जायेगा। इस तरह यह संहिता सचेतन ट्रेड यूनियनों के आधार पर हमला करती है। 

/barbad-gulistan-karane-ko-bas-ek-hi-ullu-kaafi-hai

सजायाफ्ता लंपट ने ईरान पर हमला कर सारी दुनिया की जनता के लिए स्पष्ट कर दिया कि देशों की संप्रभुता शासकों के लिए सुविधा की चीज है और यह कि आज शासक और मजदूर-मेहनतकश जनता अलग-अलग दुनिया में जी रहे हैं। 

/amerika-izrayal-ka-iran-ke-viruddha-yuddh

अमरीकी और इजरायली शासकों ने यह सोचकर नेतृत्व को खत्म करने की कार्रवाई की थी कि शीर्ष नेतृत्व के न रहने पर ईरानी सत्ता ढह जायेगी। इसके बाद, व्यापक जनता ईरानी सत्ता के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए सड़क पर उतर आयेगी और अमरीकी व इजरायली सेनायें ईरान की सत्ता पर कब्जा करके अपने किसी कठपुतले को सत्ता में बैठा देंगी।

/capitalism-naitikataa-aur-paakhand

जब शीर्ष ऐसा है तो नीचे कल्पना की जा सकती है। और आज पूंजीवादी प्रचारतंत्र के सारे स्व-प्रतिबंध के बावजूद अनुयाईयों के कुकर्मों की दास्तां बाहर आ जाती है। कभी-कभी कोई सेंगर जेल भी चला जाता है। पर ज्यादातर वैसे ही छुट्टे सांड की तरह घूमते रहते हैं। 

/baukhalaye-president-trump-ke-state-of-union-speech-kaa-saar

ट्रम्प के इस स्टेट आफ यूनियन भाषण का कुछ डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने बहिष्कार किया। कुछ सर्वोच्च न्यायालय के सदस्यों ने इसमें भाग नहीं लिया। लेकिन ट्रम्प करीब दो घण्टे के अपने भाषण में अपने बारे में शेखी बघारते रहे और तमाम गलतियों और कमियों के लिए विरोधी पार्टी के राष्ट्रपतियों को जिम्मेदार ठहराते रहे। इस भाषण को झूठ का पुलिंदा कहना ज्यादा सही होगा।