कोलंबिया भूकम्प की चपेट में

Published
Sun, 08/16/2026 - 15:50
/colombiyaa-earthqake-ki-chapet-mein

10 जून को कोलंबिया में आये 7.4 तीव्रता के भूकम्प ने समूचे कोलंबिया को एक झटके में गमगीन कर दिया। भूकम्प के दौरान दर्जनों इमारतें और उनमें रहने वाले लोग रेत के महल की तरह भरभरा कर गिरते व जमींदोज होते देखे गये। हजारों लोगों के मारे जाने, लाखों लोगों के बेघर होने का अनुमान है। देश के कई प्रमुख आबादी वाले क्षेत्र कैली, क्विब्डो, मानिजेल्स परेरा बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। 
    
इससे लगभग डेढ़ माह पूर्व वेनेजुएला ने भी भूकम्प की ऐसी ही त्रासदी झेली थी जिसमें 6 हजार से अधिक लोग मारे गये थे। 
    
अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने बताया कि भूकम्प मुख्य रूप से स्ट्राइक स्लिप फाल्टिंग की वजह से आया। यानी पृथ्वी की पपड़ी के 2 ब्लाक एक-दूसरे के समानान्तर क्षैतिज रूप से खिसक रहे थे। इससे पैदा हुआ कंपन काफी तेजी से बड़े क्षेत्र में फैल गया। 
    
भूकम्प के चलते कई शहरों के मुर्दाघरों के भरने, संचार तंत्र ध्वस्त होने, विद्युत आपूर्ति बाधित होने की खबरें आ रही हैं। खाने-पीने की चीजों का भी अभाव पैदा हो चुका है। 
    
इन परिस्थितियों में सरकार ने आपातकाल घोषित कर व देश को सेना के हवाले कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली है। वहीं राहत कार्य में पीड़ित आम जन ही सर्वाधिक एक-दूसरे की मदद कर रहे हैं। नयी दक्षिणपंथी सरकार जनता से घड़ियाली सहानुभूति भी दिखाने का नाटक करने की जरूरत नहीं समझ रही है। सत्ता प्रमुख कैमरे ने चुनावी रैली की तरह मुस्कुराते हुए देश का दौरा कर आपातकाल की घोषणा कर दी व देश को सेना-पुलिस के हवाले कर दिया। 
    
दूसरी ओर अमेरिकी साम्राज्यवादी कोलंबिया की इस आपदा को अपने लिए अवसर के रूप में देख रहे हैं। राहत के नाम पर उन्होंने कोलंबिया में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ानी शुरू कर दी है। 
    
कैमरे की सरकार की कटौती योजनायें कोलंबिया के दुख-दर्द को और बढ़ा रही है। वाशिंगटन के इशारे पर बनी घोर पूंजीपरस्त इस सरकार को जनता की तकलीफों से कोई लेना-देना नहीं है। पूर्व की तथाकथित वामपंथी पेट्रो सरकार की दिखावटी राहत योजनाओं से नई सरकार ने पूरी तरह पल्ला झाड़ना शुरू कर दिया है। इससे नई सरकार के प्रति जनाक्रोश तेजी से बढ़ने की ओर जायेगा।
    
कोलंबिया में भूकम्प को प्राकृतिक आपदा कहना सही नहीं होगा। आज के आधुनिक विज्ञान के युग में भले ही भूकम्पों को रोका नहीं जा सकता पर उसका पूर्वानुमान व जान-माल को बड़े पैमाने पर विस्थापित कर हानि को कम किया जा सकता है? साथ ही भूकम्प जोन में बनने वाले मकानों को भूकम्प से बचाने के मद्देनजर निर्मित किया जा सकता है। 
    
इन सब बातों का ध्यान दिया जाये तो कोलंबिया के भूकम्प के लिए और उससे उपजे नुकसान के लिए पूंजीवादी सरकारें व हस्तक्षेपकारी अमेरिकी साम्राज्यवादी जिम्मेदार हैं। 
    
अमेरिकी साम्राज्यवादी लातिन अमेरिका को अपना प्रभाव क्षेत्र मान उसे लूटने का कोई मौका नहीं छोड़ते पर जब बात भूकम्प की एलर्ट देने या राहत कामों की होती है तो ये खुद द्वारा तबाह देश को उसके हाल पर छोड़ देते हैं।  

आलेख

/cocoroach-saradar-and-samajvadi-janataantrik-morcha

उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

/titali-effect-kuch-itihaas-se-kucha-vartaman-mein

तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

/sadho-thagawa-nagariya-lootal-ho

वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?

/west-asia-ke-sankat-ka-vaishawik-prabhaav

अमेरिकी साम्राज्यवादी अब ऐसी स्थिति में नहीं रह गये हैं कि वे नाटो देशों को सीधे आदेश जारी करें। इसे ब्रिक्स, शंघाई सहकार संगठन जैसे क्षेत्रीय गठबंधनों का सामना करना पड़ रहा है। ये सारे गठबंधन अमेरिकी वर्चस्व वाली दुनिया को एक हद तक चुनौती दे रहे हैं। 

/west-asia-mein-badalata-shakti-santulan-samajhautaa-gyapan-ke-baad-ki-sthiti

अमरीकी साम्राज्यवादी और इजरायली शासक सोचते थे कि ईरान के शीर्ष नेतृत्व का सफाया करने के बाद ईरानी जनता अपनी सत्ता के विरुद्ध उठ खड़ी होगी और इसका फायदा उठाते हुए अमरीकी साम्राज्यवादी अपनी किसी कठपुतली को सत्ता में स्थापित कर देंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ईरानी अवाम अपनी सत्ता के समर्थन में मजबूती से खड़ी हो गई। यहां से अमरीकी साम्राज्यवादियों को समझ में आ गया कि वे ईरान पर कब्जा नहीं कर सकते।