28 फरवरी को जैसे ही अमेरिकी साम्राज्यवादियों और उनके पिट्ठू इजरायल ने ईरान पर मनमाने तरीके से हमला बोला, वैसे ही दुनिया भर में इस अन्यायपूर्ण युद्ध के खिलाफ जनता के सड़कों पर उतरने की शुरूआत हो गयी। हत्यारे ट्रम्प-नेतन्याहू सत्ता के मद में इस कदर चूर हैं कि इस युद्ध को छेड़ने के लिए उन्होंने किसी कायदे के बहाने की भी शरण नहीं ली। वे कभी एक बात तो कभी दूसरी बात युद्ध के लक्ष्य के बतौर घोषित करने लगे। उनकी बेशर्मी व बेहयाई की हद तब सबके सामने आ गयी जब पहले दिन ही उन्होंने ईरान में एक स्कूल पर बमबारी कर 160 से अधिक स्कूली बच्चियों को मौत के घाट उतार डाला। उनकी इन करतूतों ने दुनिया भर की मजदूर-मेहनतकश जनता को इनके खिलाफ सड़कों पर उतरने को मजबूर कर दिया।
दुनिया भर में युद्ध विरोधी प्रदर्शनों की लहर 28 फरवरी से लगातार जारी है। खुद अमेरिका के तमाम शहरों में जनता ने सड़कों पर उतरकर अमेरिकी हमले के विरोध में व पीड़ित ईरान के समर्थन में प्रदर्शन किये। 28 फरवरी को ही सैकड़ों लोगों ने वाशिंगटन डी सी में व्हाइट हाउस के सामने प्रदर्शन कर अमेरिकी हमलों को रोकने की मांग की। न्यूयार्क, अटलांटा, बाल्टीमोर, बोस्टन, शिकागो, सिनसिनाटी, डेनेवर, लास वेगास, लास एंजिल्स, मियामी, मिनियापोलिस, सैन फ्रांसिस्को, फिलाडेल्फिया समेत तमाम अमेरिकी शहरों में युद्ध विरोधी प्रदर्शन आयोजित हुए। इन प्रदर्शनों में वामपंथी समूहों, पर्यावरणवादी, नस्लवाद विरोधी संगठन, फिलिस्तीन समर्थक संगठन, मानवाधिकार संगठन आदि शामिल हुए।
4 मार्च को वाशिंगटन डी सी में हार्ट सीनेट आफिस बिल्डिंग में ईरान पर सीनेट सशस्त्र सेवा समिति की सुनवाई को एक पूर्व सैनिक ब्रायन मैकगिनिस ने ‘‘अमेरिका अपने बेटे और बेटियों को इजरायल के लिए युद्ध में नहीं भेजना चाहता।’’ नारे लगाकर बाधित कर दिया। न्यूयार्क में 28 फरवरी को टाइम्स स्क्वायर पर ‘‘ईरान की आजादी रैली’’ में हजारों लोग एकत्र हुए। मैनहट्टन में ‘युद्ध बंद करो’ रैली आयोजित हुई।
ईरान में खामेनेई की हत्या व स्कूली बच्चियों की हत्या के विरोध में 1 मार्च को भारी जनसैलाब युद्ध विरोधी प्रदर्शनों के तहत सड़कों पर उतर आया। ईरान के ज्यादातर शहरों में युद्ध विरोधी प्रदर्शन हुए। रमजान के महीने के अंतिम शुक्रवार को फिलिस्तीन के समर्थन में प्रदर्शनों की परम्परा रही है। 13 मार्च को हुए प्रदर्शनों में लाखों लोगों ने हिस्सा लिया। इस प्रदर्शन पर भी इजरायल ने हमला किया जिसमें एक प्रदर्शनकारी की मौत व कई के घायल होने की खबर है।
यूरोप के यूके, स्पेन, जर्मनी समेत ज्यादातर देशों में युद्ध विरोधी प्रदर्शनों की खबरें आ रही हैं। 7 मार्च को लंदन में हुए प्रदर्शन में 50 हजार से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया। ढेरों शहरों में अमेरिकी दूतावास के समक्ष प्रदर्शन हुए।
इजरायल में तेल अबीब में युद्ध विरोधी प्रदर्शनों को इजरायली पुलिस से झड़प का सामना करना पड़ा। मध्य पूर्व के लगभग ज्यादातर देशों में युद्ध विरोधी प्रदर्शन हुए। अफ्रीका महाद्वीप में दक्षिण अफ्रीका में अमेरिकी वाणिज्य दूतावास के बाहर लोगों ने खामेनेई की तस्वीरों व ईरानी झण्डे के साथ प्रदर्शन किया। ट्यूनेशिया में भी बड़े पैमाने पर युद्ध विरोधी प्रदर्शन हुए।
भारत में 1 मार्च को शिया मुसलमानों ने बिहार, दिल्ली, छत्तीसगढ़, जम्मू और कश्मीर, झारखण्ड, कर्नाटक, लद्दाख, म.प्र., पंजाब, तमिलनाडु, तेलगांना, उ.प्र. में युद्ध विरोधी प्रदर्शन आयोजित किये। इसके अतिरिक्त वामपंथी व क्रांतिकारी संगठनों ने भी देश के सभी प्रमुख शहरों में युद्ध विरोधी प्रदर्शन आयोजित किये।
मैक्सिको में प्रदर्शनकारी बेंजामिन नेतन्याहू के पुतले को पीटते हुए प्रदर्शन करते नजर आये। इंडोनेशिया में अमेरिकी दूतावास के सम्मुख युद्ध विरोधी प्रदर्शन किया गया व इंडोनेशिया सरकार से अमेरिका द्वारा गठित ‘बोर्ड आफ पीस’ से बाहर आने की मांग की गयी।
पाकिस्तान में युद्ध विरोधी देशव्यापी प्रदर्शन आयोजित हुए। इन प्रदर्शनों में लगभग 30 लोगों के मारे जाने व सैकड़ों के घायल होने की खबर है। कराची में प्रदर्शनकारियों ने अमेरिकी वाणिज्य दूतावास पर धावा बोलने का प्रयास किया। उन्होंने दूतावास की बाहरी दीवार तोड़ दी। यहां मरीन सिक्योरिटी गार्ड्स द्वारा की गयी गोलीबारी में 15-16 लोग मारे गये। लाहौर, इस्लामाबाद में भी अमेरिकी दूतावास पर प्रदर्शन हुए। गिलगित बाल्टिस्तान में शिया प्रदर्शनकारियों ने संयुक्त राष्ट्र पर्यवेक्षक समूह के कार्यालय में आग लगा दी। यहां हुई झड़प में 13 प्रदर्शनकारी मारे गये।
बांग्लादेश, ग्रीस, इराक, मोरक्को, दक्षिण कोरिया, तुर्की आदि अन्य तमाम देशों में भी युद्ध विरोधी प्रदर्शन हुए। वैश्विक स्तर पर हुए इन प्रदर्शनों ने साबित कर दिया कि शासक भले ही किसी भी पाले में हों दुनिया भर की जनता ट्रम्प-नेतन्याहू के युद्ध अभियान के विरोध में है।