गड़े मुर्दे उखाड़ना

मोदी एण्ड कम्पनी के तेवर देखने लायक हैं। इस बार उनके निशाने पर अरुंधति राय आयीं। उन पर 14 साल पहले एक सेमिनार में दिये गये भाषण पर दिल्ली के उपराज्यपाल ने यूएपीए लगाने की मंजूरी दी। 
    
14 साल पहले दिये गये भाषण पर यूएपीए लगाने का क्या मतलब है। हर किसी को खुलेआम अपने विचार व्यक्त करने का अधिकार भारत का संविधान देता है। राय ने जो कहा वह सही अथवा गलत किसी को लग सकता है। और जिसे गलत लगता है वह राय के विचारों की सरेआम आलोचना कर सकते हैं। अंरुधति राय न तो किसी गैर कानूनी गतिविधि में लिप्त हैं और न आतंकवादी हैं। उनका जीवन एक खुली किताब है। 
    
अरुंधति राय पर यूएपीए लगाने की वजह सिर्फ इतनी है कि उनकी जुबान पर बस किसी तरह ताला लगवाया जाए। अरुंधति राय हिन्दू फासीवादियों की मुखर आलोचक हैं। वे एकाधिकारी पूंजी के शिकार बने आदिवासियों से लेकर पर्यावरण पर किये गये घावों को पूरी बेबाकी से उजागर करती हैं। यह दीगर बात है कि अरुंधित राय का अपना जीवन खाते-पीते लोगों का जीवन है। उनकी लेखनी उनकी आय का एक जरिया है। 

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अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

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भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

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उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

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तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

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वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?