मौजूदा कुछ वर्षों में श्रीलंका, बांग्लादेश और फिर अभी नेपाल में यह देखने में आया है कि जनता का आक्रोश अपने जनप्रतिनिधियों पर बहुत तीव्र ढंग से अभिव्यक्त हुआ है। नेताओं के आवासों को जलाया जाता है, यहां तक कि उन पर व्यक्तिगत हमले भी इन जन-प्रदर्शनों में हुए हैं। शासन सत्ता के प्रतीक जैसे संसद, राष्ट्रपति भवन व अन्य सार्वजनिक भवनों को भी आक्रोशित जनसमूह लूटपाट व आगजनी का निशाना बनाता है। यह सब कुछ अनायास नहीं है। यह सब दिखाता है कि जनता के जीवन-स्तर और जनता के तथाकथित प्रतिनिधियों के जीवन-स्तर में मौजूद भारी अंतर से अंदर ही अंदर आम मजदूर-मेहनतकश और छात्र-नौजवान किस हद तक कुपित हैं।
उपरोक्त संदर्भ में ही भारत में आम मजदूरों और सांसदों के वर्तमान वेतन के बीच अंतर पर एक नजर डालना मौजूं रहेगा। इसी वर्ष मार्च माह में एक बार पुनः सांसदों ने अपनी तनख्वाहों में बढ़ोत्तरी की थी। यह बढ़ोत्तरी 24 प्रतिशत की थी। अब सांसदों का मासिक वेतन 1 लाख रुपये से बढ़कर 1.24 लाख रुपये हो चुका है। आप सोचेंगे कि यह तो कुछ खास नहीं है। जरा रुकिये! बात यहीं पूरी नहीं होती है। एक आम मजदूर अपने मामूली वेतन से जिन बहुत सारे संसाधनों की व्यवस्था करता है, वह सारे संसाधन हमारे माननीयों को मुफ्त मिलते हैं या उनके लिए भत्तों की व्यवस्था है, जिससे उनका यह वेतन लगभग 10 गुना बढ़ जाता है। मसलन प्रत्येक सांसद को प्रतिदिन का 2,500 रुपये भत्ता भी मिलता है, जो कि लगभग 75 हजार रुपये महीना हो जाता है। 70 हजार रुपये हर सांसद को प्रति माह अपने क्षेत्र के लिए मिलता है। 60 हजार रुपये अपने कार्यालय के रख-रखाव के लिए भी सांसदों को मिलता है। हर सांसद को नई दिल्ली के प्रमुख स्थान पर शानदार आवास मिलता है और यदि आवास आवंटित न हो पाया हो तो 2 लाख रुपये आवास भत्ता मिलता है, जिससे इस आवास के मासिक किराये का अनुमान हो जाता है। प्रत्येक सांसद प्रति माह 34 मुफ्त घरेलू हवाई यात्रायें कर सकता है, जिसका अनुमानित मासिक मूल्य 3 से 4 लाख बैठेगा। इसके अलावा उसे 50 हजार यूनिट मुफ्त बिजली और 4 हजार किलो लीटर पानी भी उपलब्ध होता है जिसका मोटा-मोटी खर्च लगभग 3 लाख रुपये तक पहुंच जायेगा। साथ ही सांसदों को केन्द्रीय सरकारी स्वास्थ्य योजना (सी.जी.एच.एस.) के तहत बिना किसी मूल्य या समयावधि सीमा के मुफ्त इलाज की सुविधा उपलब्ध है। उपरोक्त सारा खर्च जोड़ लिया जाये तो यह सामान्य स्थिति में भी 13-14 लाख प्रति माह तक पहुंच जायेगा। प्रत्येक सांसद को सेवानिवृत्ति के बाद 31 हजार रुपये प्रति माह की बेसिक पेंशन की भी व्यवस्था है, इस पर बाकी भत्ते अलग से मिलते हैं। जिसका सबसे हास्यास्पद पहलू यह है कि जो 5 वर्ष से जितने ज्यादा वर्ष सांसद रहेगा, उसको उसकी बेसिक पेंशन 2500 रुपये प्रति अतिरिक्त वर्ष जोड़कर मिलती है। गौरतलब है कि यहां नेताओं की उस काली कमाई की बात ही नहीं की जा रही है, जिसके सामने ऊपर की सारी राशि मात्र चिल्लर के समान है।
हमारे जनप्रतिनिधियों के स्वर्ग से निकलकर जरा अब झोपड़पट्टियों में रह रहे मजदूरों की जिंदगियों में झांका जाय। भारत रोजगार रिपोर्ट (इंडिया एम्प्लायमेंट रिपोर्ट)-2024 यह उद्घाटित करती है कि भारत में औसत मजदूर का वास्तविक वेतन (मुद्रास्फीति द्वारा समायोजित वेतन) पिछले वर्ष की तुलना में बढ़ने की बजाय गिर गया है। 2001 को आधार वर्ष मानते हुए वित्तीय वर्ष 2024-25 में महंगाई 3.63 गुना बढ़ गई है। इस आधार पर एक नियमित कामगार की वास्तविक मासिक आय 10,925 से घटकर 10,790 रुपये हो गई। वहीं अस्थाई कामगार (कैजुअल वर्कर) की वास्तविक मासिक आय 4,712 रुपये से घटकर 4,671 हो चुकी है। स्वरोजगार करने वालों की वास्तविक मासिक आय में मामूली वृद्धि हुई जो 6,843 से अब 7,060 रुपये हो गई है। वैसे तो प्रति व्यक्ति आय का आंकड़ा गरीबी की तस्वीर दिखाने से ज्यादा छुपाने का ही काम करता है, फिर भी अगर यहां प्रति व्यक्ति आय का भी संदर्भ ले लिया जाय, जो कि इस समय लगभग 14,333 रुपये प्रति माह है, तब भी यह पता चलता है कि केवल एक बार सांसद बने हमारे माननीय की कम से कम वाली मासिक पेंशन भी इससे कई गुना से ज्यादा है।
जैसा कि बताया गया कि मार्च, 2025 में सांसदों की यह वेतन वृद्धि 24 प्रतिशत की थी। यहां यह भी बताते चलें कि राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन (नेशनल फ्लोर लेवल मिनिमम वेज) 2017 से 2025 की शुरूआत तक 176 रुपये प्रति दिन से बढ़कर मात्र 178 रुपये प्रति दिन तक ही पहुंच पाई है। यह हालात तब हैं जबकि खाद्य वस्तुओं का मुद्रास्फीति सूचकांक 2024 में 9.04 प्रतिशत था। स्पष्ट है कि खाने-पीने की चीजों की महंगाई के सामने वेतन वृद्धि अपनी जगह पर अटकी हुई है। यही कारण है कि सरकारी संस्थाएं भी यह बोलने को मजबूर हैं कि मजदूरों का वास्तविक वेतन बढ़ने की बजाय घट रहा है। अब यह बात उनको क्या बताई जाय जो 2047 में भारत के एक विकसित राष्ट्र बनने के सुनहरे ख्वाब के टूट जाने के भय से अपनी नींद से जागना ही नहीं चाहते। परन्तु इन आंकड़ों से परे हर मजदूर यह जानता है कि उसके आर्थिक हालात बेहतर होने के बजाय बदतर होते जा रहे हैं।
अब वापस वहीं लौटते हैं, जहां से बात शुरू हुई थी। स्पष्ट है कि उठते जन आक्रोशों में जनता द्वारा जन प्रतिनिधियों के स्वर्ग लोकों को जलाया जाना दरअसल इसी बढ़ती हुई गैर बराबरी का प्रस्फुटन है। सालों-साल हाड़-तोड़ मेहनत करने के बाद भी मजदूर अपने जीवन को सुरक्षित नहीं कर पाता है, वहीं उसके प्रतिनिधि ऐश की जिंदगी जी रहे हैं। परीक्षाओं की तैयारी में लगे छात्र-नौजवान काबिलियत के बावजूद भी बेरोजगारी का दंश झेलने का मजबूर हैं, दूसरी तरफ नेताओं की नाकाबिल औलादें विदेशों में पढ़ रही हैं, सार्वजनिक संस्थाओं के ऊंचे पदों में बैठकर मोटी कमाई कर रही हैं (हमारे गृहमंत्री के सुपुत्र की ‘काबिलियत’ का तो हर किसी को पता ही है।) कुछ नहीं तो वे प्राइवेट कंपनियों में मोटी तनख्वाहों वाली नौकरियां कर रहे हैं, जहां मुख्यतः वे अपने मां-बापों की राजनीतिक साख का इस्तेमाल कर कंपनियों के लिए बिचौलियों और दलालों की ही भूमिका निभा रहे होते हैं। इस सारे माहौल में मेहनतकशों और उनके बेटे-बेटियों का गुस्सा बढ़ता ही जा रहा है। अपने देश के पड़ोस में चारों तरफ हम यह नजारा देख रहे हैं। भारत में भी यह नजारा ज्यादा दूर नहीं है।