ग्रीस : काम के घंटे बढ़ाये जाने के विरोध में प्रदर्शन

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ग्रीस के श्रम मंत्रालय ने मजदूरों के काम के घंटे प्रति दिन 13 किये जाने के सम्बन्ध में एक नियम पारित करने का तय किया है। इस नियम के अनुसार अब मजदूर एक ही नियोक्ता के अधीन 13 घंटे प्रति दिन काम कर सकेंगे। अभी तक मजदूर एक से ज्यादा नियोक्ता के अधीन 13 घंटे काम कर सकता था। 3 जुलाई को ग्रीस की जनरल कनफेडरेशन आफ ग्रीक वर्कर्स सहित अन्य मजदूर संगठनों ने इसके खिलाफ ग्रीस में विरोध प्रदर्शन किया। 
    
ग्रीस के मजदूर संगठनों का कहना है कि मजदूरों के काम करने की समय सीमा, उनके आराम के घंटे और छुट्टियों को तय करने का अधिकार सरकार का नहीं है बल्कि ये सब समाज में बातचीत और सामूहिक सौदेबाजी से तय होने चाहिए। उत्पादकता बढ़ाने के लिए काम के घंटे बढ़ाने का विचार कोई बढ़िया नहीं है। जर्मनी जैसे देशों का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि जर्मनी की उत्पादकता ज्यादा है लेकिन वहां काम के घंटे कम हैं। 
    
मजदूर संगठनों के इस वक्तव्य की पुष्टि पोलैण्ड भी करता है जहां काम के घंटे यूरोपीय यूनियन में सबसे ज्यादा 1840 घंटे प्रति वर्ष (42.5 घंटे प्रति सप्ताह) हैं लेकिन उसकी उत्पादकता यूरोपीय यूनियन से 25 प्रतिशत कम है जहां काम के घंटे औसतन 37 घंटे प्रति सप्ताह हैं। 
    
ग्रीस के श्रम मंत्री ने काम के घंटे 13 प्रतिदिन किये जाने के समर्थन में एक उदाहरण देते हुए कहा कि अगर कोई मजदूर दो नियोक्ताओं के अंतर्गत 13 घंटे प्रतिदिन काम करता है तो उसे 104 यूरो मिलेंगे लेकिन एक ही नियोक्ता के अंतर्गत उसे 119 यूरो मिलेंगे। 13 घंटे प्रति दिन काम करने के एवज में वे मजदूर को ओवरटाइम पर 40 प्रतिशत बोनस मिलने की बात कहते हैं। इस नये नियम के अनुसार 4 महीनों की अवधि में 48 घंटे प्रति सप्ताह और साल भर में 150 घंटे से ज्यादा ओवरटाइम न होने की बात कही गयी है। 
    
ग्रीस के मजदूर संगठनों का कहना है कि दरअसल ग्रीस का पूंजीपति वर्ग काम के घंटों में बदलाव की मांग लम्बे समय से कर रहा है। इसके लिए वह बहाना बनाता है कि उसके यहां जगह खाली रहती हैं जिसके कारण जितना उत्पादन होना चाहिए उतना नहीं हो पाता है। अतः उसे लम्बे समय तक मजदूरों से काम करने की छूट चाहिए।
    
लेकिन साथ ही सच्चाई यह भी है कि ग्रीस के मजदूर वर्ग की तनख्वाह यूरोप के अन्य देशों की तुलना में आधी हो चुकी है। ग्रीस में बेरोजगारी की दर इस समय 8.3 प्रतिशत तक हो चुकी है।   
    
आज हर देश में मजदूरों के काम के घंटे बढ़ाने की कोशिशें पूंजीपति वर्ग कर रहा है। एक समय में मजदूर वर्ग ने संघर्ष कर अपने काम के घंटे कम करवाये थे। मई दिवस का ऐतिहासिक दिन मजदूरों के काम के घंटे आठ करने से ही जुड़ा है। लेकिन आज जब दुनिया में मजदूर वर्ग के संगठित संघर्ष कमजोर पड़े हैं तो ऐसे में पूंजीपति वर्ग फिर से मजदूरों को सुबह से लेकर रात तक काम में झोंकना चाहता है। इसके लिए उसने एक तरफ बढ़ती महंगाई के सापेक्ष वेतन कम करके मजदूरों को इस तरफ ढकेला कि वे ओवरटाइम के नाम पर ज्यादा से ज्यादा घंटे काम करें। ताकि वे अपने परिवार का पालन पोषण कर सकें। लेकिन यूरोप में पूंजीपति वर्ग को मजदूर वर्ग के काम के घंटे बढ़ाते समय उनके आक्रोश का सामना करना पड़ रहा है। 

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