काकोरी के शहीद

काकोरी के शहीदों को याद करें,
उनकी बलिदानी राहों को समझें।
आज भी उनकी कहानी जिंदा है,
उनके बलिदान की नहीं कहीं निंदा है।

स्वतंत्रता के लिए वे लड़े थे,
अपनी जानों की कसमें खाए थे।
आज भी उनकी यादें हमें सताती हैं,
उनके साहस और बलिदान की गाथा
हमको आज भी प्रेरणा दे जाती है।

उनकी चाहत थी सिर्फ देश की सेवा,
उनकी महानता हमें हमेशा
गर्व महसूस कराती है।
काकोरी के शहीदों को हम सलाम करें,
उनकी बलिदानी राहों को हम समझें।

जिसने दी अपनी जान देश के लिए,
उनके नाम हमें हमेशा स्मरण रहे।
उनके बलिदान व्यर्थ ना जाने दें
वह शहादत वाले दिन
17 और 19 दिसंबर हमें हमेशा याद रहें
कि जालिम शासकों ने किस तरह हमारे पुरखों को
फांसी पर लटकाया
किस तरह हमें आजादी के लिए
और तड़पाया गया

अशफाक उल्ला खां, रामप्रसाद बिस्मिल, रोशन  सिंह और राजेंद्र नाथ लाहिड़ी जब साथ में लड़े
हिंदू-मुसलमान, जात-पात का ना भेद रहा,
आजादी के लिए अंग्रेजों से
अपना पैसा वापस लिया।
काकोरी कांड की वह बातें
हमें आज भी अपने हक के लिए
लड़ना सिखाती हैं,

बिस्मिल जी की वह पंक्ति
हमें आज भी आजादी के लिए
प्रेरणा दे जाती है।
कि, 
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, 
देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में है 

-गर्वित तिवारी, बीएससी प्रथम वर्ष, 
डठच्ळ कालेज हल्द्वानी, (उत्तराखंड)

आलेख

/emerjency-tab-aur-ab

पिछले दस-बारह सालों में हिन्दू फासीवादियों ने इस अनौपचारिक आपातकाल की शैली को काफी विकसित किया है। कहां किस छेद का इस्तेमाल करना है, इसमें उन्होंने महारत हासिल की है। इनके इस कृत्य में न्यायपालिका की सहभागिता से यह काम और आसान हो गया है। मतदाता सूची का विशेष गहन पुनर्रीक्षण इस सबका विशिष्ट उदाहरण है।

/piketi-ka-global-justice-project-samraajyavad-ki-pairokari

जैसा कि इंटरव्यू के शीर्षक से स्पष्ट है कि पिकेटी एक ऐसी दुनिया का ख्वाब परोसते हैं जिसमें बगैर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये ज्यादातर लोग खुशहाल बन सकते हैं। इस सुन्दर दुनिया को हासिल करने के लिए वे किसी वर्ग संघर्ष बढ़ाने या क्रांति की वकालत नहीं करते। बल्कि वे कुछ नुस्खे सुझाते हैं जिस पर चल कर मौजूदा पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया को ही खुशनुमा बनाया जा सकता है। 

/amerika-dwaara-iran-par-naya-hamala-isake-doorgami-result

अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।

/amerika-aur-china-thyuusidaidsa-phaans

शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी शासक भी दुनिया को यह जताने में लगे हुए हैं कि उनका अमेरिका से टकराने का कोई इरादा नहीं है। वे सबके साथ साझेदारी की बात कर सकते हैं। यानी अमेरिका व चीन साथ-साथ सारी दुनिया में छा सकते हैं।

/cocaroach-janta-party-hindu-fascist-v-sahi-raah

जेनरेशन जेड की युवा पीढ़ी को संघी ताकतें समझा रही हैं कि वे काॅकरोच जनता पार्टी के बहकावे में न आयें। वे मोदी के साथ खड़े रहें। वहीं काॅकरोच जनता पार्टी युवाओं के आक्रोश-दर्द को मुद्दा बना उन्हें बुराई मुक्त पूंजीवाद का ख्वाब परोस रही हैं। ऐसे में युवाओं को सही रास्ता तलाशना होगा। सही रास्ता इन दोनों रास्तों से अलग शहीदे आजम भगत सिंह का रास्ता है