काकोरी के शहीद

काकोरी के शहीदों को याद करें,
उनकी बलिदानी राहों को समझें।
आज भी उनकी कहानी जिंदा है,
उनके बलिदान की नहीं कहीं निंदा है।

स्वतंत्रता के लिए वे लड़े थे,
अपनी जानों की कसमें खाए थे।
आज भी उनकी यादें हमें सताती हैं,
उनके साहस और बलिदान की गाथा
हमको आज भी प्रेरणा दे जाती है।

उनकी चाहत थी सिर्फ देश की सेवा,
उनकी महानता हमें हमेशा
गर्व महसूस कराती है।
काकोरी के शहीदों को हम सलाम करें,
उनकी बलिदानी राहों को हम समझें।

जिसने दी अपनी जान देश के लिए,
उनके नाम हमें हमेशा स्मरण रहे।
उनके बलिदान व्यर्थ ना जाने दें
वह शहादत वाले दिन
17 और 19 दिसंबर हमें हमेशा याद रहें
कि जालिम शासकों ने किस तरह हमारे पुरखों को
फांसी पर लटकाया
किस तरह हमें आजादी के लिए
और तड़पाया गया

अशफाक उल्ला खां, रामप्रसाद बिस्मिल, रोशन  सिंह और राजेंद्र नाथ लाहिड़ी जब साथ में लड़े
हिंदू-मुसलमान, जात-पात का ना भेद रहा,
आजादी के लिए अंग्रेजों से
अपना पैसा वापस लिया।
काकोरी कांड की वह बातें
हमें आज भी अपने हक के लिए
लड़ना सिखाती हैं,

बिस्मिल जी की वह पंक्ति
हमें आज भी आजादी के लिए
प्रेरणा दे जाती है।
कि, 
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, 
देखना है जोर कितना बाजू-ए-कातिल में है 

-गर्वित तिवारी, बीएससी प्रथम वर्ष, 
डठच्ळ कालेज हल्द्वानी, (उत्तराखंड)

आलेख

/amerika-ka-iran-par-operation-d-day-hatasha-ka-parinam

अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

/education-and-emplyoment-dasha-aur-durdasha

भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

/cocoroach-saradar-and-samajvadi-janataantrik-morcha

उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

/titali-effect-kuch-itihaas-se-kucha-vartaman-mein

तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

/sadho-thagawa-nagariya-lootal-ho

वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?