‘किस्मत मेहरबान गदा पहलवान’

यह कहावत अमित शाह के बेहद ‘लायक’ पुत्र जय शाह पर एकदम सटीक बैठती है। इस कहावत में आपको ‘किस्मत’ की जगह पर ‘‘बाप’’ पढ़ना पड़ेगा। और बाप भी ऐसा-वैसा नहीं बल्कि अमित शाह जैसा बाप। 
    
जय शाह ‘किस्मत’ की वजह से पहले बीसीसीआई के सचिव बने। सचिव बनते ही जय शाह की दौलत को पांव लग गए। अब उन पर ‘किस्मत’ की और मेहरबानी हुई, और वे इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल (आईसीसी) के अध्यक्ष बन गए। ‘किस्मत’ का ऐसा दबदबा रहा कि अध्यक्ष पद के लिए उनके सामने कोई खड़ा तक नहीं हो पाया। अध्यक्ष बनते ही जय शाह ने कहा ‘‘मैं बहुत खुश हूं’’। ‘किस्मत मेहरबान रहेगी (रही) तो महाशय आप ऐसे ही खुश रहेंगे। 
    
जय शाह की खुशी से आप समझ सकते हैं कि परिवारवाद को रात-दिन गाली देने वालों को भी असली खुशी परिवार की मेहरबानी से ही मिलती है। वैसे सबको पता है कि ‘किस्मत’ की वजह से जय शाह पहले बीसीसीआई के सचिव और अब आईसीसी के अध्यक्ष बने हैं अन्यथा उनका क्रिकेट से उतना ही लेना-देना है जितना आजादी की लड़ाई से हिंदुत्ववादियों का था। क्रिकेट के खेल में यदि इतना पैसा ना होता तो बाप कभी अपने बेटे को उस तरफ मुंह भी न करने देता।

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उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

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तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

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वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?